क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 31 अगस्त 1952 को हटा और पंजाब का अगला क़ानून उसी दिन लागू हो गया
1871 के जिस क़ानून ने पूरी बिरादरियों को जन्म से अपराधी मान लिया था, उसकी अधिसूचनाएँ 31 अगस्त 1952 को ख़त्म हुईं और इन समुदायों को 'विमुक्त' नाम मिला। चौहत्तर साल बाद उस ढाँचे का कितना हिस्सा दूसरे नाम से चल रहा है, यह पंजाब के 1952 के आदतन अपराधी क़ानून में और सुप्रीम कोर्ट की गिनाई तेरह राज्यों की सूची में दर्ज है।

पंजाब के राज्यपाल ने 16 अगस्त 1952 को एक विधेयक पर दस्तख़त किए। वह तीन दिन बाद असाधारण राजपत्र में छपा, और उसकी पहली ही धारा के तीसरे खंड में लिखा था कि यह क़ानून 31 अगस्त 1952 से लागू होगा।
उसी 31 अगस्त को संसद के क्रिमिनल ट्राइब्स लॉज़ (रिपील) एक्ट, 1952 से क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1924 और देश में कहीं भी चल रहा उससे मिलता-जुलता हर क़ानून ख़त्म हो रहा था।
पंजाब का नया क़ानून उसी दिन साँस लेने लगा जिस दिन पुराना मरा।
1871 में बने जिस क़ानून ने पूरी-पूरी बिरादरियों को जन्म से अपराधी मान लिया था, उसकी अधिसूचनाएँ हटने की इसी तारीख़ से इन समुदायों को अपना आज का नाम मिला: विमुक्त। इस 31 अगस्त को उसके चौहत्तर साल पूरे हुए, और उस ढाँचे का बचा क्या है, इसका जवाब इन्हीं क़ानूनों के पाठ में पड़ा है।
1871 का क़ानून और गवर्नर जनरल की कौंसिल में पढ़ी गई रिपोर्ट
क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को गवर्नर जनरल की मंज़ूरी 12 अक्टूबर 1871 को मिली। यह 1871 का अधिनियम संख्या 27 था, और उसका शीर्षक मक़सद छिपाता नहीं: "An Act for the Registration of Criminal Tribes and Eunuchs"। प्रस्तावना में काम तीन शब्दों में है, "registration, surveillance and control"। धारा 1 और धारा 20 पूरे ब्रिटिश भारत पर लागू थीं; बाक़ी क़ानून सिर्फ़ उत्तर-पश्चिमी प्रांत, पंजाब और अवध पर।
विधेयक पर बहस के वक़्त कौंसिल के क़ानून सदस्य टी. वी. स्टीफ़ेंस ने ठगी और डकैती दमन कार्रवाई के अधीक्षक की एक रिपोर्ट पढ़कर सुनाई, जिसका अंश अयंगर समिति ने 1951 में छपी अपनी रिपोर्ट में ज्यों का त्यों दोहराया है। वह रिपोर्ट पंजाब के शाहजहाँपुर गाँव के मीणों के बारे में है, और उसमें अपराध का सबूत इस शक्ल में आता है: उनके मकान पक्की चिनाई के हैं, कुछ पर ऊपरी मंज़िल है और नीचे तहख़ाने के रास्ते; उन्होंने अपने ख़र्च से पाँच कुएँ खुदवाए हैं; उनके पास मवेशी हैं, और औरतों के गहने तथा मर्दों की पगड़ियाँ अच्छी हैं।
असली दलील इसी अनुच्छेद में बैठी है। अधीक्षक लिखते हैं कि जो ज़मीन ये जोतते हैं और जिसका लगान ये भरते हैं, वह इनकी आबादी के "a fourth part only" का पेट भर सकती है। बाक़ी तीन-चौथाई कहाँ से आ रहा है, इसका एक ही जवाब मान लिया गया।
क़ानून की धारा 2 में कसौटी यह रखी गई कि कोई जाति, गिरोह या वर्ग "addicted to the systematic commission of non-bailable offences" है या नहीं। धारा 4 सीधे ठिकाने पर आ टिकती है: अगर समुदाय का कोई स्थायी निवास नहीं है, तो स्थानीय सरकार की रिपोर्ट में लिखना ज़रूरी है कि उसका पेशा असली है या "a pretence for the purpose of facilitating the commission of crimes", और यह भी कि उसे बसाया कहाँ जाएगा और वहाँ वह कमाएगा कैसे। स्थायी गाँव, ज़मीन और पता इस तरह सभ्य जीवन की परिभाषा में क़ानूनी शर्त बनकर दाख़िल हुए।
कौंसिल में ख़तरा भी दर्ज हुआ। अयंगर समिति ने 1871 की कार्यवाही का वह अंश उद्धृत किया है जिसमें क़ानून सदस्य ने माना कि ऐसे उपाय में निर्दोष को दोषी से अलग रख पाना मुश्किल है और सत्ता अनुपयुक्त हाथों में जा सकती है, पर जोड़ा कि मक़सद इस जोखिम के लायक़ है।
रजिस्टर, हाज़िरी और पास: क़ानून रोज़ाना कैसे चलता था
क़ानून का पहिया धारा 5 की अधिसूचना से घूमता था। स्थानीय सरकार राजपत्र में घोषणा छापती और धारा 6 अदालत का दरवाज़ा बंद कर देती: कोई न्यायालय इसकी वैधता पर सवाल नहीं करेगा, और वही अधिसूचना इस बात का "conclusive proof" होगी कि क़ानून उस समुदाय पर लागू है। फिर मजिस्ट्रेट रजिस्टर बनवाता, नोटिस छपता कि सब हाज़िर होकर ब्योरा दें, और हाज़िर न होना या ग़लत जानकारी देना भारतीय दंड संहिता की धाराओं 174, 176 और 177 के तहत जुर्म बन जाता।
नाम रजिस्टर में रहेगा या कटेगा, यह धारा 12 पूरी तरह मजिस्ट्रेट की मर्ज़ी पर छोड़ती है, "as he may see fit"। रोज़मर्रा की ज़िंदगी धारा 18 के नियमों में लिखी गई: दर्ज लोग किन हदों के भीतर रहेंगे; उन हदों से बाहर जाने का पास किन शर्तों पर मिलेगा; उस पास में लिखा जाएगा कि वह कहाँ जा सकता है, किन अफ़सरों के सामने पेश होता रहेगा और कितने वक़्त ग़ैरहाज़िर रह सकता है; और हाज़िरी किस तरह ली जाएगी। इसी धारा का बारहवाँ उपखंड बस्ती में काम के घंटे, मज़दूरी की दर और उनकी मेहनत से बचे "surplus proceeds" के निपटारे तक पहुँचता है।

नियम तोड़ने पर धारा 19 में छह महीने तक की सख़्त क़ैद, जुर्माना, या कोड़े थे, और दूसरी बार एक साल तक। धारा 20 के तहत तय हद के बाहर बिना पास मिले व्यक्ति को कोई भी पुलिसवाला या गाँव का चौकीदार बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकता था। धारा 21 ने गाँव के मुखिया, चौकीदार और ज़मीन के हर मालिक पर यह फ़र्ज़ डाला कि दर्ज व्यक्ति के गाँव से जाने की सूचना थाने में दें।
यह ढाँचा स्थिर नहीं रहा। 1897 के संशोधन ने स्थानीय सरकारों को चार से अठारह बरस के बच्चों को माँ-बाप से अलग करके सुधारक बस्तियों में रखने का अधिकार दिया। 1911 का क़ानून 1871 वाले की जगह आया और शर्तें ढीली कर गया: अब अधिसूचना से पहले समुदाय को बसाने और रोज़ी का इंतज़ाम करने की ज़रूरत नहीं रही, और बच्चों को अलग करने की न्यूनतम उम्र चार से छह हुई। 1924 में यही सब समेटकर क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1924 बना, और 1952 में वही हटा।
सोनकच्छ और देवलखेड़ा में यह रोज़मर्रा कैसा दिखता था, अयंगर समिति की उप-समिति ने 1950 में जाकर देखा। भोपाल राज्य की इन दोनों बस्तियों में क्रमशः 79 और 122 कंजर कच्चे मकानों में रहते थे; न स्कूल, न पानी का इंतज़ाम, और नज़दीकी दवाख़ाना पाँच और दो मील दूर। मर्द और औरत दोनों पंद्रह की उम्र पूरी करते ही अपने आप रजिस्टर में दर्ज हो जाते थे, और हाज़िरी दिन में चार बार देनी पड़ती थी: शाम छह बजे, आधी रात, सुबह चार और सुबह छह। छोटे बच्चों वाली औरतों को भी रात में हेड कांस्टेबल की झोंपड़ी तक जाना पड़ता था।
यह हाज़िरी कितनी भरोसेमंद थी, इसका जवाब समिति को उज्जैन के पुलिस उप-महानिरीक्षक ने गवाही में दिया। उन्हें राजगढ़ रियासत का एक मामला याद था जिसमें एक कंजर, जिसे असल में गोली मार दी गई थी, थाने के रजिस्टर में हाज़िर लिखा गया।
अयंगर समिति का दौरा और उसकी गिनती
गृह मंत्रालय ने 28 सितंबर 1949 के संकल्प संख्या 22/1/49-पुलिस-I से यह समिति बनाई। संकल्प की भाषा साफ़ थी: केंद्रीय विधानमंडल में लगातार माँग उठ रही है कि 1924 का क़ानून हटे, क्योंकि लोगों के वर्गों को इस तरह छाँटने वाले उसके प्रावधान "आज़ाद भारत की गरिमा के अनुकूल नहीं" हैं। क़रीब तीन सौ प्रश्नावलियाँ भेजी गईं, दो सौ गवाह जाँचे गए, 34 बैठकें हुईं जिनमें 28 गवाही के लिए थीं, और सदस्यों ने पाँच बस्तियाँ तथा चौदह कॉलोनियाँ देखीं।
रिपोर्ट का सबसे काम का पन्ना वह तालिका है जो राज्यों से मँगाए गए आँकड़ों पर बनी। जिन राज्यों में क़ानून तब भी चल रहा था, वहाँ अधिसूचित आबादी 22,68,348 थी और उसमें से रजिस्टर में दर्ज लोग 77,159। भाग 'क' के राज्यों में अनुपात और साफ़ है: 18,37,845 की आबादी पर 42,946 दर्ज, यानी 2.34 फ़ीसदी। समिति ने इसी पर अपनी सबसे सीधी बात लिखी कि अधिसूचना पूरे समुदाय को छाँट देती है जबकि दर्ज सिर्फ़ दो-तीन फ़ीसदी लोग हैं, और असल अपराधियों का हिस्सा इससे भी कम होगा। अकेले उत्तर प्रदेश की अधिसूचित आबादी 16,68,845 थी, जो 1941 की जनगणना पर टिकी थी।
दो राज्य पहले ही निकल चुके थे: मद्रास 1947 में और बंबई 13 अगस्त 1949 से, जहाँ हटने से ठीक पहले अधिसूचित आबादी 5,95,440 और 6,23,809 थी।
समिति ने विदेश मंत्रालय के ज़रिए दूसरे देशों से भी पूछा और पैराग्राफ़ 337 में लिखा कि किसी देश में इस जैसी कोई विधायी व्यवस्था नहीं मिली। उसने कहा कि अपराध वंशानुगत नहीं होता, कि 1924 के क़ानून की धारा 3 संविधान की भावना के ख़िलाफ़ है, और बस्तियों में नियम बनाकर काम कराना बेगार के बराबर है, जो अनुच्छेद 23 के विरुद्ध है।
उसी रिपोर्ट में वह हिस्सा भी है जो बाद के लेखन में कम दोहराया जाता है। सिफ़ारिश 39 कहती है कि नए क़ानून में आदतन अपराधियों के बच्चों को माँ-बाप से अलग करके आवासीय स्कूलों में रखने का आम प्रावधान हो, और कुछ श्रेणियों के बच्चे हर हाल में अलग किए जाएँ। सिफ़ारिश 35 कहती है कि पाँच साल में तीन बार दोषी ठहराए गए जो लोग बस्तियों में हैं, उन्हें कार्यपालिका के आदेश से तीन साल और रोका जा सकता है। जिस समिति ने क़ानून हटाने की सिफ़ारिश की, उसी ने ये दोनों बातें लिखीं।
31 अगस्त 1952 की तारीख़ और पंजाब का आदतन अपराधी अधिनियम
संसद ने क्रिमिनल ट्राइब्स लॉज़ (रिपील) एक्ट, 1952 पारित किया, जो 1952 का अधिनियम संख्या 24 है। उसकी धारा 2 की इबारत पंजाब के अपने क़ानून के 'उद्देश्य एवं कारण' में ज्यों की त्यों दर्ज है: क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1924 और किसी भी राज्य या उसके हिस्से में लागू उससे मिलता-जुलता हर क़ानून "31 अगस्त 1952 के दिन" निरस्त हो जाएगा। इदाते आयोग की 2017 की रिपोर्ट यही प्रावधान उद्धृत करती है और जोड़ती है कि क़ानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश पर लागू हुआ। रेन्के आयोग की 2008 की रिपोर्ट और मंत्रालय का 25 फ़रवरी 2022 का पृष्ठभूमि दस्तावेज़ भी यही तारीख़ और यही अधिनियम संख्या देते हैं।
पंजाब आदतन अपराधी (नियंत्रण एवं सुधार) अधिनियम, 1952 का विधेयक 19 जुलाई 1952 को असाधारण राजपत्र के पृष्ठ 646 पर छपा था। धारा 1(3) उसे 31 अगस्त 1952 से लागू करती है।

असली जोड़ धारा 22 में है। वह कहती है कि 1924 के क़ानून के निरस्त होने के बावजूद, जो व्यक्ति उसके तहत दर्ज था और इस क़ानून की परिभाषा में आदतन अपराधी है, वह इस क़ानून के तहत दर्ज "माना जाएगा"; पुराने क़ानून की धाराओं 10, 11 और 16 के आदेश नए क़ानून की धाराओं 10, 11 और 14 के तहत पारित माने जाएँगे; और उस वक़्त मौजूद सब बस्तियाँ इस क़ानून के तहत स्थापित मानी जाएँगी। धारा 25 जोड़ती है कि 1924 के नियम भी तब तक चलते रहेंगे जब तक वे नए क़ानून से टकराएँ नहीं।
पुरानी कसौटी भी लौट आई। नए क़ानून की धारा 11(2) में, किसी दर्ज व्यक्ति को किसी इलाक़े तक सीमित करने या कहीं बसाने से पहले सरकार को चार बातें देखनी हैं, और उनमें दूसरी यह है कि वह कोई वैध पेशा करता है या नहीं, और वह पेशा "a real occupation or merely a pretence for the purpose of facilitating the commission of crimes" है। यह 1871 की धारा 4 का वाक्य है, इक्यासी साल बाद, समुदाय की जगह व्यक्ति पर लगा हुआ।
बाक़ी मशीन भी जस की तस उतरी। धारा 9 में ज़िला मजिस्ट्रेट या उनका नामित अफ़सर किसी भी वक़्त उँगलियों के निशान, तस्वीर और पैरों के निशान लेने का आदेश दे सकता है। धारा 13 में हाज़िरी है। धारा 14 में औद्योगिक, कृषि और सुधारक बस्तियाँ तथा स्कूल हैं, जिनमें पाँच साल तक रखा जा सकता है। धारा 16 के नियम-बनाने वाले खंडों में पास की शर्तें, गाँव के मुखिया-चौकीदार को सूचना, बस्ती में काम के घंटे और मज़दूरी, और वही "surplus proceeds" वाला वाक्य है। और धारा 23 अदालत का दरवाज़ा फिर बंद कर देती है: कोई न्यायालय इस क़ानून के तहत जारी किसी अधिसूचना या आदेश के प्राधिकारी की सक्षमता पर सवाल नहीं करेगा।
'विमुक्त' शब्द कालेलकर आयोग से आया
नाम इस तारीख़ के महीनों बाद तय हुआ। पहला पिछड़ा वर्ग आयोग 29 जनवरी 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में बना, और उसकी रिपोर्ट का पैराग्राफ़ 48 दो-टूक है: इन्हें न 'जनजाति' कहा जाए, न इनके नाम के साथ 'अपराधी' या 'भूतपूर्व अपराधी' जोड़ा जाए; इन्हें 'विमुक्त समुदाय' कहिए। यही शब्द चला, और आज की सरकारी शब्दावली में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू तीनों इसी क़तार में आते हैं।
उसी रिपोर्ट का पैराग्राफ़ 41 सरकारी काग़ज़ों की गिनती दोहराता है: 127 समूह, जिनकी आबादी 1949 में 22.68 लाख और 1951 में 24.64 लाख दर्ज हुई। पहला आँकड़ा अयंगर समिति की तालिका के 22,68,348 से मेल खाता है, यानी आयोग उसी गिनती पर खड़ा था।
आयोग की अपनी सिफ़ारिश आज पढ़ने में अटपटी लगती है। उसने कहा कि इन समूहों को छोटी-छोटी टुकड़ियों में क़स्बों और गाँवों में बाँट दिया जाए, ताकि वे दूसरे लोगों के संपर्क में आएँ और समाज में घुल-मिल सकें। नाम बदलने की सलाह और बिखेर देने की सलाह एक ही पन्ने पर हैं।
तेरह राज्यों के आदतन अपराधी क़ानून और 3 अक्टूबर 2024 का फ़ैसला
अयंगर समिति ने एक केंद्रीय क़ानून माँगा था, जो जाति, धर्म या जन्म का भेद किए बिना सब आदतन अपराधियों पर लागू हो। ऐसा अधिनियम कभी नहीं बना। जो बना, वह राज्यों के अलग-अलग क़ानूनों की क़तार है, और सुप्रीम कोर्ट ने 3 अक्टूबर 2024 के फ़ैसले की एक पादटिप्पणी में उसकी सूची गिनाई है: तमिलनाडु 1948, मध्य भारत 1952, ओडिशा 1952, उत्तर प्रदेश 1952, राजस्थान 1953, जम्मू-कश्मीर 1956, बंबई 1959, गुजरात 1959, केरल 1960, कर्नाटक 1961, आंध्र प्रदेश 1962, हिमाचल प्रदेश 1969, और गोवा, दमन तथा दीव 1976।
अदालत ने इनकी साझा बनावट भी दर्ज की। ज़्यादातर में आदतन अपराधी की एक ही परिभाषा है, तीन बार सज़ा पाना; ज़िला कलेक्टर रजिस्टर रखता है; कोई भी अधिकृत अफ़सर किसी भी वक़्त उँगलियों और हथेली के निशान, पैरों के निशान और तस्वीरें ले सकता है; दर्ज व्यक्ति को अपना पता और उसका बदलाव बताना होता है; और अदालतों का अधिकार क्षेत्र हटा दिया गया है, जो आंध्र प्रदेश की धारा 19, गुजरात और बंबई की धारा 22 और राजस्थान की धारा 14 में लिखा है।
राजस्थान में 1953 से पहले जो 1950 का क़ानून चला, वह परिभाषा में ही जन्म पकड़े था। अयंगर समिति ने लिखा कि उसमें 'आदतन अपराधी' वह है जो किसी अधिसूचित जनजाति का सदस्य हो और जिसे ज़िला मजिस्ट्रेट ने लिखित आदेश से इस दर्जे से बाहर न किया हो, और समिति ने इसे 1924 के क़ानून से "शायद ही कोई सुधार" कहा।
इनका इस्तेमाल कैसा रहा, यह रेन्के आयोग ने 2006 में राज्यों को प्रश्नावली भेजकर पूछा। रिपोर्ट का अध्याय आठ बताता है कि आदतन अपराधी क़ानून और भिक्षावृत्ति क़ानून के अमल पर किसी भी राज्य सरकार ने कोई जानकारी नहीं भेजी।
सुकन्या शांथा बनाम भारत संघ में मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने जेल नियमावलियों की इबारत पढ़ी। मध्य प्रदेश की नियमावली में आदतन अपराधी की परिभाषा का एक खंड यह है: "Any member of denotified tribe subject to the discretion of the State Government concerned"। पश्चिम बंगाल जेल संहिता का नियम 404 कहता है कि क़ैदी ओवरसियर को रात का पहरेदार तभी बनाया जाए जब वह ऐसे किसी वर्ग का न हो जिसमें भागने की प्रबल स्वाभाविक प्रवृत्ति हो, "such as men of wandering tribes"।

अदालत ने ये प्रावधान अनुच्छेद 14, 15, 17, 21 और 23 के उल्लंघन में असंवैधानिक ठहराए, तीन महीने में सब राज्यों को नियमावलियाँ बदलने को कहा, क़ैदियों के रजिस्टर से जाति का ख़ाना हटवाया, और जहाँ राज्य का अपना आदतन अपराधी क़ानून नहीं है वहाँ नियमावली में आदतन अपराधी के सब उल्लेख रद्द कर दिए। राज्यों के क़ानून ख़ुद चुनौती में नहीं थे, इसलिए उन पर फ़ैसला नहीं हुआ; पर पीठ ने लिखा कि यह वर्गीकरण "संवैधानिक रूप से संदिग्ध" है और राज्य सरकारें फिर से सोचें कि ऐसे क़ानूनों की ज़रूरत है भी या नहीं।
सीड योजना, विकास बोर्ड और बजट की चार पंक्तियाँ
इन समुदायों के लिए विकास एवं कल्याण बोर्ड 21 फ़रवरी 2019 की राजपत्र अधिसूचना से बना। उसकी योजना, सीड, 16 फ़रवरी 2022 को शुरू हुई, और उसका परिव्यय 2021-22 से 2025-26 तक क़रीब 200 करोड़ रुपये रखा गया। मंत्रालय के पृष्ठभूमि दस्तावेज़ में चारों घटकों के लक्ष्य भी हैं: पाँच साल में क़रीब 6,250 छात्रों की मुफ़्त कोचिंग पर 50 करोड़, 4,44,500 परिवारों के स्वास्थ्य बीमा पर 49 करोड़, दो हज़ार क्लस्टरों में आजीविका, और 4,200 मकानों पर 50 करोड़।
ख़र्च कितना हुआ, यह एक जगह नहीं छपता; उसे चार अलग बजट दस्तावेज़ों की एक ही पंक्ति से जोड़ना पड़ता है। अनुदानों की माँगों पर टिप्पणियों में सीड का वास्तविक व्यय इस तरह दर्ज है: 2021-22 में 0.21 करोड़ रुपये, 2022-23 में 2.82 करोड़, 2023-24 में 15 करोड़, और 2024-25 में 35.16 करोड़। चार बरस का जोड़ 53.19 करोड़ रुपये बैठता है। 2025-26 का संशोधित अनुमान 61.56 करोड़ है; वह पूरा ख़र्च हो जाए तो भी पाँच साल का जोड़ 114.75 करोड़ रुपये होगा, यानी तय परिव्यय का क़रीब आधा। 2026-27 के लिए इसी मद में 101 करोड़ रुपये हैं, जो विभाग के 13,687.59 करोड़ रुपये के शुद्ध बजट का 0.74 फ़ीसदी है।
बोर्ड की अपनी पंक्ति और छोटी है। हर साल उसके लिए 5 करोड़ रुपये का बजट अनुमान रखा गया, और वास्तविक ख़र्च 2021-22 में 4.80 करोड़, 2022-23 में 2.32 करोड़, 2023-24 में 0.95 करोड़ और 2024-25 में 0.82 करोड़ रहा। जिस संस्था को इन समुदायों की सुध लेनी है, उसका ख़र्च चार बरस में छठे हिस्से से भी नीचे आ गया।
पहुँच का ब्योरा विभाग ने 29 दिसंबर 2025 की वर्षांत समीक्षा में दिया। कोचिंग में 2024-25 के दौरान स्नातक स्तर के 51 और बारहवीं स्तर के 500 छात्र शामिल हुए; 2025-26 के 4,000 के लक्ष्य पर क़रीब 3,064 चुने जा चुके हैं। स्वास्थ्य बीमा में 2024-25 के दौरान गुजरात और महाराष्ट्र में 50,000 आयुष्मान कार्ड बने, और सात राज्यों के 4.50 लाख कार्ड के काम पर 50,287 का ई-केवाईसी पूरा हुआ है। मकान वाले घटक की स्थिति एक वाक्य में है: मध्य प्रदेश के भेजे 3,047 नाम 14 अगस्त 2024 को ग्रामीण विकास मंत्रालय तक पहुँचे, और वित्तीय सहायता अब तक मंज़ूर नहीं हुई।
आजीविका घटक पर उसी विज्ञप्ति में दो अलग हिसाब हैं। एक जगह लिखा है कि चार राज्यों के 28 ज़िलों में 1,450 स्वयं सहायता समूह मंज़ूर हुए, 30 नवंबर 2025 तक 952 बने जिनमें 17,801 लाभार्थी हैं, और 17.66 करोड़ रुपये जारी हुए। दूसरी जगह लिखा है कि आठ राज्यों के 113 ज़िलों में 5,650 समूहों का लक्ष्य है, अब तक 5,061 बन चुके हैं और उनसे 61,133 लोग जुड़े हैं। पहला हिसाब एनएसएफ़डीसी के रास्ते चल रहे काम का है और दूसरा साझेदार संस्थाओं के, पर विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि दोनों संख्याएँ आपस में किस तरह जुड़ती हैं।
गिनती का सवाल: 126, 1,235, 1,262 और दस करोड़
कितने समुदाय हैं, इस पर कोई दो दस्तावेज़ एक बात नहीं कहते। अयंगर समिति की सूची में 126 समुदाय थे, और इदाते आयोग ने उसकी सीमा ख़ुद बताई कि आज़ादी के तीन बरस बाद बनी वह सूची कई समुदायों तक पहुँची ही नहीं। इदाते आयोग ने यह भी दर्ज किया कि औपनिवेशिक सूची कभी स्थिर नहीं रही, कभी-कभी हर साल बदली, और 1871 में आठ समुदायों से शुरू होकर 1924 तक क़रीब दो सौ तक पहुँची।
रेन्के आयोग ने 2008 में आबादी का अनुमान लगाने की सबसे विस्तृत कोशिश की, और उसका तरीक़ा रिपोर्ट में खुला पड़ा है। अनुसूचित जाति या जनजाति में गिने जाने वाले विमुक्त समुदायों की आबादी 2001 की जनगणना से निकाली गई, 1,36,05,034; घुमंतू समुदायों की 4,49,59,058; और तीसरी श्रेणी, यानी अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल घुमंतू समुदाय, गणना नहीं बल्कि अनुपात से आई। 1931 के आँकड़ों को 1951 तक बढ़ाकर इनकी आबादी 1,71,77,138 निकली, जो उस साल की कुल आबादी का 4.76 फ़ीसदी थी; वही 4.76 फ़ीसदी 2001 की आबादी 1,02,70,15,247 पर लगाकर 4,88,85,926 का आँकड़ा बना। तीनों जोड़कर 10,74,50,018 हुआ, और आयोग ने लिखा कि आबादी दस करोड़ से ऊपर है।
रिपोर्ट अपनी सीमाएँ भी उसी पन्ने पर गिनाती है। विमुक्त समुदायों की सूची सिर्फ़ पंद्रह राज्यों ने भेजी और घुमंतू समुदायों की दस ने; 123 समुदायों के नाम तो मिले पर आबादी का आँकड़ा नहीं; 104 घुमंतू समुदाय किसी आरक्षण श्रेणी में नहीं आते, इसलिए उनका कोई आँकड़ा ही नहीं है; और गुजरात, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु में हर विमुक्त समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग में है, इसलिए इन तीन बड़े राज्यों का एक भी विमुक्त समुदाय इस जोड़ में नहीं है।
इदाते आयोग को पूरे देश का सर्वेक्षण करना था। उसके अध्यक्ष भीखू रामजी इदाते ने प्रस्तावना में लिखा कि धन न मिलने के कारण वह सर्वेक्षण नहीं हो सका, इसलिए आयोग की सूची कभी ज़मीन पर जाँची नहीं गई। रिपोर्ट के भीतर आयोग का अपना वाक्य इससे भी सीधा है कि इन समुदायों की संख्या पर उसके पास कोई आँकड़ा नहीं है।
फिर भी इसी रिपोर्ट से सरकार ने दो संख्याएँ निकालीं। मंत्रालय के 25 फ़रवरी 2022 के पृष्ठभूमि दस्तावेज़ में कुल 1,262 समुदाय बताए गए: 425 विमुक्त, 810 घुमंतू और 27 अर्ध-घुमंतू। राज्यसभा में 22 मार्च 2023 के उत्तर में यही रिपोर्ट 1,235 समुदाय देती है, और उसका राज्यवार अनुलग्नक 810 और 425 पर ख़त्म होता है; फ़र्क़ अर्ध-घुमंतू वाले उन 27 का है, जो दूसरे उत्तर में गिने ही नहीं गए। दोनों संख्याओं के नीचे आयोग की वे तालिकाएँ हैं जिनके कुल जोड़ के आगे आयोग ने ख़ुद लिखा है, "including repetition"।
जनगणना इस श्रेणी को दर्ज नहीं करती। संविधान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूचियाँ बनाता है, विमुक्त समुदायों की कोई अनुसूची उसमें नहीं है, और यह बात रेन्के आयोग ने अपने चौथे अध्याय में लिखी थी। जाति के हिसाब से आख़िरी जनगणना 1931 में हुई, इसीलिए 2008 के अनुमान को 1931 तक लौटना पड़ा। इदाते आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना के नतीजे कम से कम इन समुदायों के बारे में जारी हों। चौहत्तर बरस में इनका जो हिसाब सबसे पहले बना, वह रजिस्टर था।
स्रोतक्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 (1871 का अधिनियम संख्या 27) का पूरा पाठ, धारा 1 से 31 तक, इंडियन कानून पर, क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट एन्क्वायरी कमेटी (1949-50) की रिपोर्ट, अध्यक्ष एम. अनंतशयनम अयंगर, मैनेजर ऑफ़ पब्लिकेशंस, दिल्ली, 1951, पंजाब आदतन अपराधी (नियंत्रण एवं सुधार) अधिनियम, 1952 (पंजाब अधिनियम संख्या 12, 1952) का पूरा पाठ, उद्देश्य एवं कारण सहित, सुकन्या शांथा बनाम भारत संघ, रिट याचिका (सिविल) संख्या 1404/2023, सुप्रीम कोर्ट का 3 अक्टूबर 2024 का फ़ैसला, विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग (इदाते आयोग) की रिपोर्ट, दिसंबर 2017, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग (रेन्के आयोग) की रिपोर्ट, खंड एक, 30 जून 2008 (मंत्रालय की मूल प्रति का संग्रहीत रूप), पत्र सूचना कार्यालय, पृष्ठभूमि दस्तावेज़ RU-32-01-0060-250222, 25 फ़रवरी 2022: सीड योजना के चारों घटक, लक्ष्य और लागत, पत्र सूचना कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, 22 मार्च 2023: राज्यसभा में राज्यमंत्री प्रतिमा भौमिक का लिखित उत्तर और राज्यवार अनुलग्नक, पत्र सूचना कार्यालय, 29 दिसंबर 2025: सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की वर्षांत समीक्षा 2025, सीड और विकास बोर्ड का ब्योरा, केंद्रीय बजट 2026-27, अनुदानों की माँगों पर टिप्पणियाँ, माँग संख्या 93, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, केंद्रीय बजट 2023-24, अनुदानों की माँगों पर टिप्पणियाँ: सीड का 2021-22 का वास्तविक व्यय, केंद्रीय बजट 2024-25, अनुदानों की माँगों पर टिप्पणियाँ: सीड का 2022-23 का वास्तविक व्यय, केंद्रीय बजट 2025-26, अनुदानों की माँगों पर टिप्पणियाँ: सीड का 2023-24 का वास्तविक व्यय