पूरा खाता बंद करना आख़िरी उपाय: रिज़र्व बैंक के मसौदे में साइबर ठगी पर साठ दिन की सीमा
ठगी की रक़म जिस अनजान खाते में पहुँच जाती है, उस पर रोक कौन लगाता है, किस धारा से लगाता है और कितने दिन के लिए। शुक्रवार, 11 सितंबर को रिज़र्व बैंक ने जो मसौदा जारी किया, उसमें पहली बार हर क़दम पर एक तारीख़ लिखी है।

फ़रवरी 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने एक कंपनी की याचिका आई। नीलकंठ फार्मा लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड के बैंक खाते में निकाली जा सकने वाली रक़म 93,50,05,208 रुपये थी, और वह पूरा खाता बंद पड़ा था। वजह उसी खाते में आए 200 रुपये थे।
ठाणे के वर्तकनगर थाने ने 29 नवंबर 2024 को एचडीएफ़सी बैंक को चिट्ठी भेजी थी कि खाते पर डेबिट फ़्रीज़ लगा दिया जाए। बैंक ने लगा दिया। कंपनी के जारी किए कई चेक लौट गए और कारोबार ठप हो गया। दो महीने बाद उसी जाँच एजेंसी ने दूसरी चिट्ठी भेजकर कहा कि फ़्रीज़ हटा दें और सिर्फ़ 200 रुपये पर लियन लगा रहने दें। जज मनोज जैन ने 20 फ़रवरी 2025 के फ़ैसले में दर्ज किया कि याचिकाकर्ता के किसी साइबर अपराध में आरोपी या संदिग्ध होने का कोई संकेत रिकॉर्ड पर नहीं है।
यह उस आदमी की कहानी नहीं है जिसका पैसा ठगी में चला गया। यह तीसरे आदमी की है, जिसके खाते में वह पैसा आकर रुक गया, और जिसकी तनख़्वाह, किराया, स्कूल की फ़ीस और कारोबार उसी खाते में हैं। शुक्रवार, 11 सितंबर 2026 को रिज़र्व बैंक ने जो मसौदा जारी किया, वह पहली बार इस तीसरे आदमी को एक लिखी हुई समय-सारणी देता है।
रक़म रोकना और खाता बंद करना: अलग धाराएँ, अलग अधिकारी
आम बोलचाल में इन सबको "खाता फ़्रीज़" कह दिया जाता है। दस्तावेज़ों में ये चार अलग चीज़ें हैं, और हर एक का अधिकार अलग जगह से आता है।
पहली, किसी एक रक़म पर होल्ड। गृह मंत्रालय की एसओपी के खंड 9.1 के मुताबिक़ जब सीएफ़सीएफ़आरएमएस किसी बैंक को बताता है कि उसके खाते में ठगी की रक़म पहुँची है, और वह रक़म या उसका हिस्सा खाते में मौजूद है, तो बैंक का नोडल अधिकारी जाँच एजेंसी के निर्देश पर उतनी रक़म रोक देता है। धारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की 168 है, जिसे धारा 94 के साथ पढ़ा जाता है। इससे बाक़ी खाता चलता रहता है।
दूसरी, डिजिटल बैंकिंग सेवाएँ बंद करना। एसओपी कहती है कि अगर एक ही खाता एनसीआरपी पर कई बार रिपोर्ट हुआ है, तो बैंक आरटीजीएस, एनईएफ़टी, आईएमपीएस, यूपीआई, एईपीएस, एटीएम, पीपीआई और कार्ड बंद कर देगा। शाखा में जाकर काउंटर पर किया गया लेनदेन इस सूची से बाहर रखा गया है।
तीसरी, ज़ब्ती। यह धारा 106 के तहत होती है और एसओपी का मार्गदर्शक सिद्धांत (iv) साफ़ कहता है कि ऐसा आदेश सिर्फ़ किसी एफ़आईआर या ई-एफ़आईआर के संदर्भ में जारी हो, और उस एफ़आईआर की नक़ल आदेश के साथ भेजी जाए। धारा 106(3) जाँच अधिकारी पर यह ज़िम्मेदारी डालती है कि ज़ब्ती की सूचना फ़ौरन मजिस्ट्रेट को दे।
चौथी, कुर्की। अपराध से कमाई गई संपत्ति को कुर्क करने के लिए धारा 107 है। उसमें जाँच अधिकारी को पुलिस अधीक्षक या आयुक्त की मंज़ूरी लेकर अदालत में अर्ज़ी देनी होती है, और मजिस्ट्रेट आम तौर पर नोटिस देकर सुनवाई का मौक़ा देता है। इन चारों से अलग, बैंक अपनी तरफ़ से भी रोक लगा सकता है, धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 12एए और रिज़र्व बैंक के केवाईसी निदेशों के तहत।
फ़र्क़ इसलिए मायने रखता है कि राजस्थान हाई कोर्ट ने 20 अगस्त 2026 के फ़ैसले के अनुच्छेद 17 में लिखा है कि जाँच एजेंसी अपनी चिट्ठी पर "फ़्रीज़", "डेबिट फ़्रीज़", "लियन" या "ज़ब्ती" का लेबल चिपकाकर वह काम नहीं कर सकती जो असल में बिना क़ानूनी प्रक्रिया के अनिश्चितकालीन कुर्की है। नोडल, पूल और एस्क्रो खातों के लिए एसओपी का खंड 9.1(iii) अलग हिदायत देता है: इनमें सिर्फ़ विवादित रक़म रोकी जाए, और जाँच एजेंसियाँ इनकी डिजिटल सेवाएँ बंद कराने या इन्हें ज़ब्त कराने से आम तौर पर बचें।
11 सितंबर का मसौदा: 1,000 रुपये से शुरू और 60 दिन पर ख़त्म
मसौदे का नाम "रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (नो योर कस्टमर) संशोधन निदेश, 2026" है, संदर्भ संख्या DOR.AML.REC.No./14-01-001/2026-27, और तारीख़ की जगह अभी "September xx, 2026" लिखा है। अधिकार बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35ए से लिया गया है।

यह मसौदा केवाईसी निदेश, 2025 के अनुच्छेद 68 की जगह नया अनुच्छेद रखता है और निदेशों में अनुलग्नक III जोड़ता है। मौजूदा अनुच्छेद 68 बैंकों से कहता है कि म्यूल खातों की पहचान करें और "उचित कार्रवाई" करें। वह एक पैराग्राफ़ का है और उसमें खाताधारक को सूचना देने, उससे सफ़ाई माँगने या किसी समय-सीमा की बात नहीं है। नया अनुलग्नक III आठ हिस्सों की प्रक्रिया है।
शुरुआत की सीमा 1,000 रुपये है। मसौदे की परिभाषा के मुताबिक़ "संदिग्ध मनी म्यूल लेनदेन" वह है जो 1,000 रुपये या उससे ज़्यादा का हो और बैंक की निगरानी प्रणाली, जिसमें एआई और मशीन लर्निंग के औज़ार शामिल हैं, उसे संदिग्ध के तौर पर चिह्नित करे। चिह्नित करने का आधार दो में से एक होगा: लेनदेन खाताधारक के घोषित प्रोफ़ाइल से मेल न खाता हो, या वह किसी ऐसे खाते से जुड़ा हो जो पहले म्यूल या धोखाधड़ी वाला बताया जा चुका है।
इसके बाद छह क़दम हैं। पहला, बैंक फ़ौरन उस लेनदेन पर अस्थायी डेबिट होल्ड लगाएगा; और अगर पूरा खाता संदिग्ध म्यूल खाता है, तो पूरे खाते पर। दूसरा, बैंक खाताधारक को उसी वक़्त सूचना देगा, जिसमें कारण, रोक हटाने की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारी का संपर्क होगा; डिजिटल तरीक़े से न भेज सके तो अगले दिन कारोबार ख़त्म होने तक। तीसरा, बैंक खाताधारक से सफ़ाई माँगेगा और उसे रोक लगने की तारीख़ से 20 दिन देगा।
चौथा क़दम फ़ैसले का है। सफ़ाई मिल जाए तो बैंक उसे मिलने के 10 दिन के भीतर तय करेगा; सफ़ाई न आए तो रोक लगने से 30 दिन के भीतर। वह या तो रोक हटाकर खाताधारक को बता देगा, या रोक जारी रखकर मामला एनसीआरपी-सीएफ़सीएफ़आरएमएस के ज़रिए क्षेत्रीय पुलिस अधिकारी को भेजेगा और कारण दर्ज करेगा। पाँचवाँ, अगर पुलिस या सक्षम प्राधिकारी का क़ानून-समर्थित निर्देश आ जाए तो बैंक उसी पर अमल करेगा। छठा, अगर पुलिस को भेजने की तारीख़ से 30 दिन में ऐसा कोई निर्देश नहीं आता, तो बैंक इकतीसवें दिन रोक हटा देगा।
मसौदा इन दो घड़ियों को जोड़कर एक छत लिखता है: जाँच एजेंसी या सक्षम प्राधिकारी का उलटा निर्देश न हो तो अस्थायी डेबिट होल्ड की अधिकतम अवधि रोक लगने की तारीख़ से साठ दिन है।
पूरे खाते बनाम रक़म का सवाल मसौदे में अनुच्छेद 6 के भीतर तय होता है, जो बैंक की आंतरिक नीति की शर्तें गिनाता है। उपखंड (ii) कहता है कि आंतरिक नीति यह सुनिश्चित करेगी कि खाते के स्तर पर अस्थायी डेबिट होल्ड आख़िरी उपाय के तौर पर और सिर्फ़ अपवाद की परिस्थितियों में लगाया जाए। ऐसा वाक्य अब तक किसी रिज़र्व बैंक निर्देश में नहीं था।
बाक़ी शर्तें छोटी लेकिन ठोस हैं। यह एसओपी नोडल, पूल, एस्क्रो और लाभांश या शेयर पूँजी जैसे विशेष खातों पर लागू नहीं होगी। बैंक को केंद्रीकृत एमआईएस रखना होगा जिसमें रोक की तारीख़, कारण, खाताधारक से हर पत्राचार और पुलिस से मिले आदेश दर्ज हों; रिकॉर्ड कम से कम पाँच साल, और खाता बंद हो जाए तो बंद होने से दस साल। हर बैंक को क्षेत्रीय, अंचल या प्रधान कार्यालय स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त करने होंगे, उनके नाम और संपर्क वेबसाइट तथा हर शाखा में दिखाने होंगे, और इस एसओपी से उठी शिकायत तीस दिन में निपटानी होगी। मसौदे पर राय 2 अक्टूबर 2026 तक ली जाएगी, और यह 1 अप्रैल 2027 से लागू होगा, या उससे पहले जिस तारीख़ से कोई बैंक ख़ुद इसे अपनाने का फ़ैसला करे।
4 अगस्त का सुप्रीम कोर्ट आदेश और चार हफ़्ते की मियाद
रिज़र्व बैंक की अपनी विज्ञप्ति बताती है कि यह मसौदा किसके कहने पर आया। सुप्रीम कोर्ट में स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 3/2025 चल रही है, जिसका शीर्षक "इन री: विक्टिम्स ऑफ़ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टु फ़ोर्ज्ड डॉक्युमेंट्स" है। 4 अगस्त 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जज जॉयमाल्य बागची और जज वी. मोहना की पीठ ने चौदह अंतरिम निर्देश दिए। पहला निर्देश रिज़र्व बैंक को है: चार हफ़्ते में वह एसओपी औपचारिक रूप से अपनाए और प्रसारित करे जो बैंकों के लिए म्यूल गतिविधि और साइबर ठगी से जुड़ी रक़मों या खातों पर अस्थायी डेबिट होल्ड की कार्रवाई तय करती है, और अंतिम एसओपी की नक़ल आई4सी तथा सभी हाई कोर्टों के महापंजीयकों को भेजे।
चार हफ़्ते 1 सितंबर के आसपास पूरे हुए। रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर 4 अगस्त से 11 सितंबर के बीच इस विषय पर कोई अधिसूचना नहीं है। 11 सितंबर को जो आया, वह मसौदा है, जिस पर राय 2 अक्टूबर तक ली जानी है और जो 1 अप्रैल 2027 से लागू होगा।
उसी याचिका में 9 फ़रवरी 2026 के आदेश का अनुच्छेद 4 दर्ज करता है कि रिज़र्व बैंक उस वक़्त तक यह एसओपी लिख चुका था। उसी आदेश में अदालत ने गृह मंत्रालय को 2 जनवरी 2026 की एसओपी औपचारिक रूप से अपनाने और पूरे देश में जारी करने का निर्देश दिया था, और सभी हाई कोर्टों से कहा था कि उनके अधिकार क्षेत्र के अधिनिर्णायक प्राधिकारी उसका पालन करें। उसी आदेश में दर्ज है कि तिरपन में से क़रीब छब्बीस बैंकों ने म्यूल हंटर एआई अपनाया था।
4 अगस्त के आदेश में आई4सी की 3 अगस्त 2026 की चौथी स्थिति रिपोर्ट के आँकड़े हैं। डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी शिकायतें 2024 में 1,23,672 थीं, 2025 में 58,239, और 30 जून 2026 तक 16,377। शिकायत निवारण पोर्टल पर 69 बैंकों की 1,23,590 शाखाएँ हैं। रक़म वापसी पोर्टल पर 57 बैंक और सभी 36 राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश हैं, और उस पर 36,290 मामलों में कुल 18.05 करोड़ रुपये लौटाए जा चुके हैं, यानी औसतन क़रीब 4,975 रुपये प्रति मामला। अगली सुनवाई बुधवार, 16 सितंबर को है।
एसओपी का खंड 10: सात दिन, पंद्रह दिन, नब्बे दिन
रिज़र्व बैंक का मसौदा 2027 की बात है। जो आज चल रहा है, वह गृह मंत्रालय की 2 जनवरी 2026 की एसओपी है। 98 पन्नों का यह दस्तावेज़ साइबर एवं सूचना सुरक्षा प्रभाग ने जारी किया; मेघालय हाई कोर्ट ने 28 अप्रैल 2026 को इसे अपनी अधिसूचना के साथ प्रसारित किया।
इसका खंड 10 शिकायत का रास्ता है। हर राज्य में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, महानिरीक्षक या उप महानिरीक्षक स्तर का एक शिकायत अधिकारी और हर ज़िले में अतिरिक्त या उप पुलिस अधीक्षक स्तर का अधिकारी नामित होता है। हर बैंक को केंद्रीय और राज्य स्तर पर शिकायत अधिकारी रखने होते हैं, और शाखा स्तर पर ऐसे अधिकारी जो प्रभावित व्यक्ति की तरफ़ से शिकायत चढ़ाएँ।
खंड 10.1 रक़म पर लगी रोक के लिए है। खाताधारक अपनी शाखा या किसी नामित शाखा में जाता है। बैंक ग्राहक की जाँच और बढ़ी हुई जाँच-पड़ताल करता है, और उसकी सफ़ाई से संतुष्ट हो तो शिकायत को सीएफ़सीएफ़आरएमएस के शिकायत निवारण मॉड्यूल पर चढ़ाता है। इसके लिए वक़्त तय है: शिकायत करने के दिन से सात कैलेंडर दिन के भीतर।
आगे की घड़ी पुलिस के पास है। थानाध्यक्ष शिकायत जाँच अधिकारी को सौंपता है और ज़िला शिकायत अधिकारी को सूचना देता है। जाँच अधिकारी खाताधारक को नोटिस भेजकर सत्यापन के लिए बुलाता है, और एसओपी कहती है कि यह वीडियो कॉन्फ़्रेंस से हो; खाताधारक को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए तभी कहा जाए जब जाँच में वह टाला न जा सके और मामले में एफ़आईआर या ई-एफ़आईआर दर्ज हो। संतुष्ट होने पर वह शिकायत मिलने के पंद्रह कैलेंडर दिन के भीतर बैंक को रोक हटाने का निर्देश देगा, और बैंक हटाकर मॉड्यूल पर दर्ज करेगा। संतुष्ट न हो तो उन्हीं पंद्रह दिन में कारण लिखकर मॉड्यूल पर डालेगा और खाताधारक को एसएमएस या ईमेल से बताया जाएगा।
पंद्रह दिन में कुछ न हो तो शिकायत अपने आप ज़िला शिकायत अधिकारी के पास चली जाती है। खाताधारक जाँच अधिकारी के फ़ैसले से असंतुष्ट हो तो सूचना मिलने के पंद्रह दिन के भीतर नामित शाखा में जाकर पुनर्विचार की अर्ज़ी दे सकता है; ज़िला शिकायत अधिकारी को सूचना मिलने के पंद्रह दिन में फ़ैसला मॉड्यूल पर दर्ज करना है, जाँच अधिकारी को उस पर दो दिन में अमल करना है, और बैंक को माँगी गई जानकारी दो दिन में देनी है।
नब्बे दिन वाला उपबंध इसी खंड के अंत में है, और उसे अक्सर ग़लत उद्धृत किया जाता है। घड़ी उस दिन से चलती है जिस दिन बैंक शिकायत चढ़ाता है, न कि उस दिन से जब रोक लगी। अगर नब्बे कैलेंडर दिन तक रोक जारी रखने या हटाने का कोई वैध निर्देश नहीं आता, तो बैंक को इस अवधि के ख़त्म होने से पंद्रह दिन पहले जाँच एजेंसी को सूचित करना होगा, और थानाध्यक्ष को एनसीआरपी से एसएमएस जाएगा। अगर वह रक़म किसी और मामले में नहीं चाहिए, किसी अदालत में उसे छोड़ने की याचिका नहीं है, और जाँच एजेंसी ने अवधि बढ़ाने की माँग नहीं की, तो बैंक बढ़ी हुई जाँच-पड़ताल के बाद रोक हटा देगा। जाँच अधिकारी को ज़रूरत लगे तो वह नब्बे दिन और माँग सकता है।
खाता खुलवाने का क्रम और हर पड़ाव पर ज़रूरी काग़ज़
पहला क़दम शाखा में है, और वहाँ माँगने की चीज़ लिखित जानकारी है: रोक किस तारीख़ को लगी, किसके निर्देश पर, किस संदर्भ संख्या पर, और कितनी रक़म पर। एसओपी का खंड 9.1(ii) बैंक को इजाज़त देता है कि वह खाताधारक को उस जाँच एजेंसी का पता और संपर्क बता दे जिसने कार्रवाई कराई, और वित्तीय आसूचना इकाई ने 2 जून 2025 के परिपत्र में साफ़ किया है कि इसे "टिप-ऑफ़" नहीं माना जाएगा। शिकायतकर्ता या पीड़ित का ब्योरा खाताधारक को किसी सूरत में नहीं दिया जाएगा। साथ रखिए खाते का वह विवरण जिसमें विवादित जमा दिखती है, और बैंक से मिली सूचना की नक़ल।

दूसरा क़दम सफ़ाई का है, और यहीं मामला बनता या बिगड़ता है। बैंक को यह दिखाना है कि वह रक़म किस लेनदेन से आई। सामान बेचा है तो बिल, चालान और ई-वे बिल; सेवा दी है तो अनुबंध और जीएसटी विवरणी; किराया या उधार लौटा है तो लिखित करार और पुराना बैंक विवरण; पुरानी गाड़ी या फ़ोन बेचा है तो ख़रीदार का नाम, पता और सौदे का सबूत। साथ में केवाईसी के काग़ज़ दोबारा, क्योंकि बैंक को इसी मौक़े पर ग्राहक की जाँच और बढ़ी हुई जाँच-पड़ताल करनी है।
तीसरा क़दम बैंक का है, आपका नहीं, लेकिन उस पर घड़ी लगी है। बैंक को सात कैलेंडर दिन में शिकायत मॉड्यूल पर चढ़ानी है। शाखा से उस शिकायत की पावती और संदर्भ संख्या लिखित में लीजिए, क्योंकि नब्बे दिन की गिनती उसी तारीख़ से शुरू होती है।
चौथा क़दम पुलिस के सामने सत्यापन है। नोटिस आने पर वीडियो कॉन्फ़्रेंस की माँग कीजिए; एसओपी और राजस्थान हाई कोर्ट दोनों यही कहते हैं, और एसओपी इसमें बैंक के शिकायत निवारण अधिकारी को भी जोड़ने की बात करती है। एसओपी में "अनापत्ति प्रमाणपत्र" जैसा कोई काग़ज़ नहीं है। जो चीज़ असल में रोक हटाती है, वह जाँच अधिकारी का बैंक को दिया निर्देश और उसका मॉड्यूल पर दर्ज होना है। शाखा से उसी दर्ज प्रविष्टि का स्क्रीनशॉट या पावती माँगिए।
पाँचवाँ क़दम अपील का है। रक़म पर रोक के मामले में पुनर्विचार ज़िला शिकायत अधिकारी करते हैं। खाता ज़ब्त हो या डिजिटल सेवाएँ बंद हों तो खंड 10.2 के तहत ज़िला शिकायत अधिकारी के फ़ैसले पर पंद्रह दिन के भीतर राज्य शिकायत अधिकारी के सामने अपील होती है।
छठा क़दम अदालत है। खंड 10.2 का उपखंड (h) ख़ुद कहता है कि किसी भी शिकायत अधिकारी के फ़ैसले से पीड़ित व्यक्ति खाता खुलवाने के लिए क्षेत्राधिकार वाली अदालत जा सकता है। व्यवहार में यह रास्ता अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका का रहा है, जैसा ऊपर के तीनों मामलों में हुआ। सुप्रीम कोर्ट का 4 अगस्त का निर्देश (iii) कहता है कि पीड़ित व्यक्ति को पहले शिकायत तंत्र आज़माने के लिए आम तौर पर प्रोत्साहित किया जाए, पर यह किसी संवैधानिक, वैधानिक या अन्य क़ानूनी उपाय में बाधा नहीं है। याचिका के साथ बैंक की सूचना, शिकायत की पावती और तारीख़ों का क्रम लगाइए।
'म्यूल खाता' की परिभाषा में 'अनजाने' भी है
रिज़र्व बैंक के मसौदे में मनी म्यूल खाते की परिभाषा यह है: वह खाता जिसका इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से साइबर ठगी की कमाई पाने, उसे परतों में बाँटने या आगे भेजने के लिए किया गया हो, जानते हुए या अनजाने। अंग्रेज़ी पाठ का शब्द-युग्म "knowingly or unknowingly" है।
एसओपी का मार्गदर्शक सिद्धांत (xii) इसी को दूसरी तरफ़ से कहता है: जाँच अधिकारी को इस संभावना को ध्यान में रखना होगा कि रिपोर्ट किया गया खाता खाताधारक की जानकारी, मिलीभगत या सहमति के बिना चलाया जा रहा हो, और उसी हिसाब से कार्रवाई करनी होगी। सिद्धांत (viii) कहता है कि धारा 106(3) के तहत आदेश जारी करने से पहले जाँच अधिकारी खाताधारक और उसके बैंक से सत्यापन कर सकता है और सफ़ाई देने का उचित मौक़ा दे सकता है। यहाँ शब्द "कर सकता है" है, "करेगा" नहीं।
एक हिस्सा ऐसा भी है जिसमें किसी को कुछ बताया ही नहीं जाता। एसओपी का खंड 9.1(i) कहता है कि अगर संदिग्ध खाते में पर्याप्त रक़म बची ही नहीं है, तो भी पहली परत के खाते में रोक लगाई जाएगी, ताकि अगली ठगी की रक़म उसी खाते से आगे न जा सके। दस्तावेज़ साफ़ लिखता है कि ऐसी रोक के मामले में पीड़ित को कोई एसएमएस या ईमेल नहीं भेजा जाएगा। यानी खाते पर निशान लग चुका होता है और आगे की रक़म रुकने लगती है, इससे पहले कि किसी को कुछ पता चले।
राजस्थान हाई कोर्ट की चौदह शर्तें
20 अगस्त 2026 को राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ ने श्री बालाजी एंटरप्राइज़ेज़ और उससे जुड़ी याचिकाओं पर 77 पन्ने का साझा फ़ैसला सुनाया। जज आनंद शर्मा ने अनुच्छेद 2 में दर्ज किया कि कई याचिकाओं में विवादित लेनदेन 100, 1,000, 5,000 या 10,000 रुपये से कम का था, जबकि उससे कहीं बड़ी रक़म वाला पूरा खाता ठप कर दिया गया। कुछ मामलों में विवादित रक़म तय ही नहीं हुई थी। कुछ में जाँच पूरी होकर क्लीन चिट या क्लोज़र रिपोर्ट आ चुकी थी और खाता फिर भी बंद था। कुछ में न एफ़आईआर थी, न एनसीआरपी पर खाताधारक के ख़िलाफ़ कोई शिकायत।

अनुच्छेद 29 में अदालत ने अपना उदाहरण रखा: अगर कथित ठगी की रक़म 500 रुपये है और खाते में 5 लाख रुपये हैं, तो जाँच का मक़सद 500 रुपये रोककर पूरा हो जाता है, बाक़ी 4,99,500 रुपये से खाताधारक को वंचित करके नहीं।
फ़ैसले का अनुच्छेद 45 चौदह सिद्धांत गिनाता है, (A) से (N) तक, जो राजस्थान में लागू होंगे। विवादित रक़म पहचानी जा सके तो सामान्य रास्ता उतनी रक़म पर लियन है, पूरा खाता बंद करना नहीं; पूरा खाता बंद करना पड़े तो उसके कारण केस डायरी में दर्ज हों और बैंक को बताए जाएँ; धारा 106 की ज़ब्ती पर मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट और धारा 107 की कुर्की पर अदालत का आदेश ज़रूरी है; रोक की ज़रूरत की समीक्षा जाँच अधिकारी और उनके वरिष्ठ अधिकारी समय-समय पर करें; खाताधारक का अपराध से कोई संबंध न निकले तो रोक फ़ौरन हटे।
अनुच्छेद 34 पुलिस की चिट्ठी में आठ चीज़ें अनिवार्य करता है: जाँच अधिकारी का नाम और पद; थाना या एजेंसी और संपर्क; एफ़आईआर, अपराध या एनसीआरपी की संदर्भ संख्या; वह क़ानूनी प्रावधान जिसके तहत कार्रवाई हो रही है; खाता संख्या और बैंक का ब्योरा; लेनदेन की आईडी, यूटीआर या तारीख़; विवादित रक़म या पूरे खाते पर रोक का आधार; और यह कि चिट्ठी रक़म पर रोक चाहती है, डिजिटल सेवाएँ बंद कराना चाहती है, ज़ब्ती चाहती है या अदालती कुर्की की माँग है।
अदालत ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक को चार हफ़्ते में एक सामान्य परिपत्र जारी करने और एक वरिष्ठ अधिकारी को निगरानी के लिए नामित करने को कहा, जो यह आँकड़ा रखेगा कि कितने खाते बंद हुए, कितनी रक़म रोकी गई, कितनी शिकायतें आईं और निपटीं, और कितने पूरे फ़्रीज़ लेनदेन-विशेष लियन में बदले गए। ये निर्देश राजस्थान की सीमा में चलते हैं। हाई कोर्टों में यह सवाल अब भी खुला है: ओडिशा हाई कोर्ट में 12 अगस्त 2026 को सत्यव्रत दाश की याचिका पर भारतीय स्टेट बैंक के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के 4 अगस्त के आदेश का हवाला दिया, और जज ए.के. महापात्र ने बैंक से कहा कि वह रिज़र्व बैंक से निर्देश लेकर अगली तारीख़ पर बताए।
लोकपाल की सीमा और मुआवज़े का ख़ाली ख़ाना
रिज़र्व बैंक एकीकृत लोकपाल योजना, 2026 इसी 1 जुलाई से चल रही है। उसका खंड 10(2)(घ), अंग्रेज़ी पाठ में 10(2)(d), उन शिकायतों को योजना के दायरे से बाहर रखता है जो बैंक की उस कार्रवाई से पैदा हुई हों जो उसने किसी न्यायिक, अर्ध-न्यायिक, वैधानिक या क़ानून लागू कराने वाले प्राधिकारी के आदेश के पालन में की हो। पुलिस के कहने पर लगी रोक इसी श्रेणी में आती है, यानी लोकपाल का दरवाज़ा उस पर बंद है।
रिज़र्व बैंक का नया मसौदा इस तस्वीर को एक जगह बदल देता है। उसमें बैंक ख़ुद, अपनी निगरानी प्रणाली के आधार पर रोक लगाता है, किसी जाँच एजेंसी के आदेश पर नहीं। खंड 10(2)(घ) अपने शब्दों में ऐसी रोक को नहीं छूता, क्योंकि वह किसी बाहरी प्राधिकारी के आदेश के पालन में नहीं लगी। शर्त वही रहेगी जो योजना के खंड 10(1) में है: पहले बैंक को लिखित शिकायत, तीस दिन तक जवाब का इंतज़ार, और उसके बाद नब्बे दिन के भीतर लोकपाल के पास अर्ज़ी।
जो अभी किसी दस्तावेज़ में नहीं है, वह मुआवज़ा है। न एसओपी, न मसौदा, न कोई परिपत्र यह तय करता है कि बेगुनाह खाताधारक का खाता महीनों बंद रहने से जो नुक़सान हुआ, उसकी भरपाई कौन करेगा। सुप्रीम कोर्ट के 4 अगस्त के आदेश का निर्देश (viii) अंतर-विभागीय समिति से कहता है कि साझा देनदारी और पीड़ित मुआवज़े के ढाँचे के प्रस्ताव पर चर्चा करे और अगली तारीख़ से पहले स्थिति रिपोर्ट दे। वह तारीख़ 16 सितंबर है।
स्रोतभारतीय रिज़र्व बैंक, विज्ञप्ति 2026-2027/1109, 11 सितंबर 2026: 'रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (नो योर कस्टमर) संशोधन निदेश, 2026' के मसौदे पर राय आमंत्रित, मसौदा रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (नो योर कस्टमर) संशोधन निदेश, 2026, DOR.AML.REC.No./14-01-001/2026-27 का पूरा पाठ, और उसका अनुलग्नक III (एसओपी), भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक - नो योर कस्टमर) निदेश, 2025, अनुच्छेद 68 'बैंक खातों का संचालन और मनी म्यूल' (29 दिसंबर 2025 तक अद्यतन), सुप्रीम कोर्ट, स्वतः संज्ञान रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 3/2025, 'इन री: विक्टिम्स ऑफ़ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टु फ़ोर्ज्ड डॉक्युमेंट्स', कार्यवाही का रिकॉर्ड, 4 अगस्त 2026, सुप्रीम कोर्ट, उसी याचिका में 9 फ़रवरी 2026 का आदेश: गृह मंत्रालय को 2 जनवरी 2026 की एसओपी औपचारिक रूप से अपनाने का निर्देश, गृह मंत्रालय, साइबर एवं सूचना सुरक्षा प्रभाग की एनसीआरपी-सीएफ़सीएफ़आरएमएस, अभिरक्षा, रक़म की वापसी और शिकायत निवारण संबंधी एसओपी, 2 जनवरी 2026, 98 पन्ने; मेघालय हाई कोर्ट की 28 अप्रैल 2026 की अधिसूचना के साथ संलग्न प्रति, राजस्थान हाई कोर्ट, जयपुर पीठ, श्री बालाजी एंटरप्राइज़ेज़ बनाम भारतीय रिज़र्व बैंक, एस.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 2679/2026 और संबद्ध याचिकाएँ, [2026:RJ-JP:33344], 77 पन्ने, 20 अगस्त 2026, दिल्ली हाई कोर्ट, नीलकंठ फार्मा लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ, डब्ल्यू.पी.(सी) 17905/2024, जज मनोज जैन, 20 फ़रवरी 2025, ओडिशा हाई कोर्ट, सत्यव्रत दाश बनाम शाखा प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, जराका, डब्ल्यू.पी.(सी) संख्या 16140/2026, 12 अगस्त 2026, रिज़र्व बैंक एकीकृत लोकपाल योजना, 2026, 1 जुलाई 2026 से प्रभावी, खंड 9 और 10 का पाठ