केरल के मुख्यमंत्री का एआई वीडियो भारत में रोका गया, किस आधार पर यह अब तक किसी ने नहीं बताया
त्रिशूर की एक कंपनी के बनाए व्यंग्य वीडियो को 1 करोड़ 78 लाख लोग देख चुके थे। रविवार, 13 सितंबर को मेटा ने उसे भारत में बंद कर दिया और बनाने वाले को एक वाक्य का संदेश भेजा, जिसमें भारत सरकार की सूचना का ज़िक्र है और कारण का नहीं। भारत में किसी की पोस्ट रुकने पर उसे क़ानूनन कितना जानने को मिलता है, यह दो अलग प्रक्रियाओं और एक अदालती फ़ैसले में लिखा है।

रविवार, 13 सितंबर को 'ऐकवला' नाम के एक पन्ने ने अपने पाठकों को बताया कि उसका सबसे ज़्यादा देखा गया वीडियो भारत में बंद कर दिया गया है। पन्ना त्रिशूर की डिजिटल मार्केटिंग कंपनी 'रीच यू' चलाती है, जिसके मालिक अभिजित के.एस. हैं। द हिंदू ने मेटा का जो संदेश छापा, वह एक वाक्य का है: "भारत सरकार की सूचना के अनुसार हमने भारत में आपकी सामग्री तक पहुँच प्रतिबंधित कर दी है।"
वीडियो में केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन केरल राज्य विद्युत बोर्ड के कर्मचारियों के साथ नाचते दिखते हैं। वह असली दृश्य नहीं, एआई से बना है, और राज्य की बिजली कटौती पर व्यंग्य है। गुरुवार, 10 सितंबर को डाला गया था और रविवार तक 1 करोड़ 78 लाख बार देखा जा चुका था।
मुख्यमंत्री ख़ुद उससे पहले उसकी तारीफ़ कर चुके थे। केरल हाई कोर्ट के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि वीडियो देखकर उन्हें ख़ुशी हुई, और वे मोहनलाल तथा तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ़ विजय से बेहतर नाच सकते हैं।
अभिजित ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें नहीं लगता कि रोक मुख्यमंत्री की तरफ़ से लगवाई गई है। उनके शब्द थे, "हमें वजह नहीं पता। पर मुख्यमंत्री ने एक सार्वजनिक मंच पर इसकी तारीफ़ की थी। वीडियो दूसरे देशों से देखा जा सकता है।"
वजह अब तक किसी ने नहीं बताई।
इंस्टाग्राम पर चार दिन और मेटा का एक वाक्य
दोनों अख़बार वीडियो के ठिकाने पर एक जैसा ब्योरा नहीं देते। द हिंदू लिखता है कि वह इंस्टाग्राम के पन्ने 'aikavala' पर था और उसी पन्ने से 1.78 करोड़ बार देखा गया। ओणमनोरमा उसी कंपनी के फ़ेसबुक पन्ने 'AI Kavala' का नाम लेता है। दोनों मंच एक ही कंपनी के हैं और एक ही क़ानूनी ढाँचे में आते हैं।
संदेश के पाठ में भी दोनों रिपोर्टों में फ़र्क़ है, और यह फ़र्क़ मामूली नहीं है। द हिंदू के पास "भारत सरकार की सूचना के अनुसार" वाला वाक्य है। ओणमनोरमा लिखता है कि अभिजित को मिली सूचना में कहा गया था कि वीडियो एक शिकायत के बाद भारत में रोका गया है, और मेटा ने भारतीय क़ानूनों के उल्लंघन का हवाला दिया। दोनों शब्द दो अलग क़ानूनी प्रक्रियाओं के हैं। 'शिकायत' और 'अनुरोध' 2009 के नियमों की भाषा है, और 'सूचित किया जाना' 2021 के नियम 3(1)(d) की। इनमें से किस प्रक्रिया के तहत यह वीडियो रुका, यह न मेटा ने बताया है, न सरकार ने, न अभिजित को पता है।
केरल में इस महीने यह पहला ऐसा मामला नहीं है। शनिवार, 5 सितंबर को मुख्यमंत्री कार्यालय के अपने फ़ेसबुक पन्ने से दो पोस्ट हट गए थे: एक आशा कार्यकर्ताओं के ओणम भत्ते की घोषणा, दूसरा नबी दिनम की शुभकामनाओं का। मुख्यमंत्री कार्यालय ने मेटा और इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, दोनों को चिट्ठी भेजी और कुछ घंटों में पोस्ट लौट आए। सतीशन ने उसी दिन X पर लिखा कि सामग्री वापस आ गई है, पर सरकारी संचार के मनमाने ढंग से हटने का सवाल बना हुआ है। मुख्यमंत्री के सचिव रतन यू. केलकर ने मेटा और मंत्रालय से जो पूछा, उसमें एक सवाल यह भी था कि पोस्ट अपने आप किसी तकनीकी प्रणाली ने हटाए या किसी व्यक्ति ने। सरकार के अपने पन्ने के लिए भी यह सवाल चिट्ठी लिखकर पूछना पड़ा।
द हिंदू इस पिछली घटना को अलग ढंग से दर्ज करता है। उसकी 14 सितंबर की रिपोर्ट कहती है कि मेटा ने इससे पहले राज्य सरकार और सतीशन की आलोचना करने वाले ख़बरिया वीडियो हटाए थे, सतीशन ने अपने दफ़्तर से ऐसी कोई माँग जाने से इनकार किया, और बहाली के लिए लिखे जाने पर मेटा ने वजह तकनीकी बताई। ओणमनोरमा की 5 सितंबर की रिपोर्ट में हटी हुई सामग्री सरकार के अपने दो पोस्ट हैं। दोनों ब्योरे एक ही घटना के हैं या दो अलग घटनाओं के, यह इन रिपोर्टों से तय नहीं होता।
संदेश में मौजूद जानकारी की हद
मेटा के एक वाक्य में तीन बातें हैं: सामग्री रोकी गई है, रोक सिर्फ़ भारत में है, और उसके पीछे भारत सरकार की कोई सूचना है।
उसमें जो नहीं है, वह गिनने लायक़ है। कौन सा मंत्रालय या कौन सी एजेंसी, यह नहीं। किस क़ानून की किस धारा के तहत, यह नहीं। कौन सा आधार, यह नहीं। सूचना की तारीख़ नहीं, उसका कोई संदर्भ नंबर नहीं, भेजने वाले अधिकारी का पद नहीं। रोक कब तक चलेगी, यह भी नहीं।
X इसी हालत में अपने उपयोगकर्ताओं को जो ईमेल भेजता है, उसमें कुछ ज़्यादा होता है। मीडियानामा ने 11 मार्च 2026 को ऐसी कई सूचनाओं का ब्योरा छापा था। उनमें धारा 69A का नाम और मंत्रालय का नाम दर्ज रहता है, और साथ में यह कि क़ानूनी पाबंदियों के चलते कंपनी इससे ज़्यादा जानकारी नहीं दे सकती। उपयोगकर्ता को एक ईमेल पता दिया जाता है और अदालत जाने का रास्ता बताया जाता है।
किसी नियम में यह तय नहीं है कि ऐसी सूचना में कितना लिखा जाएगा।
रोक के दो रास्ते और उनमें बनाने वाले की जगह
भारत में किसी पोस्ट तक पहुँच रोकने के दो क़ानूनी रास्ते हैं, और दोनों में उस व्यक्ति की जगह अलग है जिसने पोस्ट डाली।
पहला धारा 69A है। उसका अपना पाठ कहता है कि केंद्र सरकार या उसका विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी, संतुष्ट होने पर, "लिखित में कारण दर्ज करके" आदेश देगा। आदेश का पता किसी सरकारी एजेंसी या मध्यवर्ती संस्था का होता है। पोस्ट डालने वाला उस आदेश का पक्षकार नहीं है। 2009 के नियमों का नियम 8 नामित अधिकारी से कहता है कि वह "उस व्यक्ति या मध्यवर्ती संस्था" को पहचानने की हर मुनासिब कोशिश करे जिसने सामग्री रखी है, और पहचान होने पर उसे समिति के सामने पेश होने का नोटिस भेजे, जिसके और सुनवाई के बीच कम से कम 48 घंटे हों।
उस वाक्य में 'या' दो बार आता है, और सॉफ़्टवेयर फ़्रीडम लॉ सेंटर ने सुप्रीम कोर्ट में यही पकड़ा है। उसकी याचिका का कहना है कि 'या' के रहते मध्यवर्ती संस्था को पहचान लेना ही नियम की शर्त पूरी कर देता है, और पोस्ट डालने वाले को नोटिस भेजना वैकल्पिक रह जाता है। याचिका माँगती है कि इसे 'और' पढ़ा जाए। नियम के पाठ में दोनों को पहचानने या दोनों को नोटिस भेजने की शर्त कहीं नहीं है।
दूसरा रास्ता धारा 79(3)(b) का है। धारा 79 मध्यवर्ती संस्था को तीसरे पक्ष की सामग्री की ज़िम्मेदारी से छूट देती है, और उपधारा (3)(b) उस छूट की एक शर्त है: सरकार या उसकी एजेंसी की सूचना के बाद सामग्री न हटाने पर छूट चली जाती है। इसी रास्ते पर बने सहयोग पोर्टल और उस पर X के मुक़दमे को भारत पन्ना ने 12 सितंबर के अंक में देखा था।
यहाँ काम की बात 10 फ़रवरी 2026 की है। जी.एस.आर. 120(E) ने 2021 के नियमों का नियम 3(1)(d) बदल दिया, और नया पाठ कहता है कि 'वास्तविक जानकारी' सिर्फ़ दो तरह से बन सकती है: सक्षम अदालत के आदेश से, या "लिखित में, कारण सहित सूचना" से। वह सूचना संयुक्त सचिव या समकक्ष रैंक के अधिकृत अधिकारी की तरफ़ से आनी चाहिए, पुलिस की तरफ़ से हो तो पुलिस उप-महानिरीक्षक से नीचे के अधिकारी की नहीं, और हर महीने संबंधित सरकार के सचिव स्तर का अधिकारी इन सूचनाओं की समीक्षा करेगा। नियम आगे यह भी तय करता है कि सूचना में क्या-क्या साफ़ लिखा होगा: क़ानूनी आधार और लागू की गई वैधानिक धारा, ग़ैर-क़ानूनी काम की प्रकृति, और वह यूआरएल जिसे हटाना है।
कारण, इस तरह, काग़ज़ पर मौजूद होता है। नियम में यह कहीं नहीं लिखा कि वह काग़ज़ या उसका सार पोस्ट डालने वाले तक पहुँचाया जाएगा।
नियम 16 का एक वाक्य और नियम 6 का फ़ॉर्म
धारा 69A वाले रास्ते पर जो नियम लागू हैं, उनका पूरा नाम है सूचना प्रौद्योगिकी (जनता के लिए सूचना तक पहुँच अवरुद्ध करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009। ये जी.एस.आर. 781(E) से 27 अक्टूबर 2009 को अधिसूचित हुए, उसी दिन लागू हुए, और अधिनियम की धारा 87(2)(z) तथा धारा 69A(2) के तहत बने हैं।
सोलह नियमों में आख़िरी सबसे छोटा है। नियम 16 का शीर्षक है 'अनुरोध और शिकायतें गोपनीय रहेंगी', और उसका पूरा पाठ एक वाक्य है: "प्राप्त सभी अनुरोधों और शिकायतों तथा उन पर की गई कार्रवाई के बारे में कड़ी गोपनीयता बरती जाएगी।" कोई अपवाद नहीं, कोई अवधि नहीं, कोई ऐसी श्रेणी नहीं जो इससे बाहर हो।
उससे ठीक पहले वाला नियम उलटी दिशा में जाता है। नियम 15 नामित अधिकारी से कहता है कि वह मिले हर अनुरोध और की गई हर कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड रखे, इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस में भी और रजिस्टर में भी। रिकॉर्ड बनता है, संभाला जाता है, और नियम 16 के दायरे में रहता है।
नियम 6(2) के साथ एक फ़ॉर्म नत्थी है, जिस पर भरकर कोई संगठन अपना अनुरोध नामित अधिकारी को भेजता है। उसमें पच्चीस क्रमांकित ख़ाने हैं, चार हिस्सों में बँटे। पहले हिस्से के छह ख़ाने शिकायत करने वाले के हैं: नाम, पता, टेलीफ़ोन, फ़ैक्स, मोबाइल, ईमेल। दूसरे हिस्से के सात ख़ाने सामग्री और मंच के हैं: यूआरएल, आईपी पता, हाइपरलिंक, सर्वर का पता, मध्यवर्ती संस्था का नाम और यूआरएल, और वह पता जो तब भरा जाए जब बाक़ी ब्योरा उपलब्ध न हो। तीसरे हिस्से के चार ख़ाने मंत्रालय या राज्य सरकार की सिफ़ारिश, मंज़ूरी के स्तर और उन छह आधारों की सूची के हैं जिनमें से एक पर निशान लगाना होता है। चौथे हिस्से के आठ ख़ाने नोडल अधिकारी के अपने ब्योरे के हैं।
पच्चीस में से एक भी ख़ाना उस व्यक्ति के नाम का नहीं है जिसने सामग्री डाली। शिकायत करने वाले का नाम पहला ख़ाना है।
नियम 6(3) दूसरी तरफ़ से भी दरवाज़ा बंद करता है: नामित अधिकारी किसी व्यक्ति से सीधे कोई शिकायत या अनुरोध नहीं लेगा। हर बात नोडल अधिकारी के रास्ते आएगी। पोस्ट डालने वाला व्यक्ति इस प्रक्रिया में न भेजने वाला बन सकता है, न उसका नाम काग़ज़ पर आता है।
इसी नियम 16 के हवाले से सूचना का अधिकार क़ानून की अर्ज़ियाँ ख़ारिज होती रही हैं। फ़िल्म समीक्षक तनुल ठाकुर की अर्ज़ी 2019 से पहले ख़ारिज हुई। अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता सुशांत सिंह का X खाता 2021 में दो बार निलंबित हुआ; उन्होंने पूछा कि क्या यह किसी क़ानूनी माँग पर हुआ और आदेश की प्रति माँगी, और मंत्रालय ने दोनों अर्ज़ियों पर वही नियम गिनाया। उनकी रिट याचिका 1133/2022 बंबई हाई कोर्ट में दाख़िल हुई।

श्रेया सिंघल के पैराग्राफ़ 108 से 111
24 मार्च 2015 को न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति आर.एफ़. नरीमन ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में धारा 66A रद्द की और धारा 69A तथा 2009 के नियमों को वैध ठहराया। इस सवाल पर फ़ैसला पैराग्राफ़ 107 से शुरू होता है।
पैराग्राफ़ 107 में अदालत नियमों की पूरी प्रक्रिया गिनाती है और आख़िरी वाक्य में नियम 16 का ज़िक्र करती है। पैराग्राफ़ 108 में याचिकाकर्ताओं की दलीलें दर्ज हैं, और उनमें दो हैं। पहली यह कि नियमों में 'ओरिजिनेटर' को, यानी उस व्यक्ति को जो संदेश भेजता, बनाता या भेजवाता है और जिसकी परिभाषा अधिनियम की धारा 2(za) में है, फ़ैसले से पहले सुनवाई का मौक़ा नहीं मिलता। दूसरी यह कि गोपनीयता वाला प्रावधान याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों पर असर डालता है।
पैराग्राफ़ 109 धारा 69A के तीन सुरक्षा-उपाय गिनाता है। तीसरा यह है कि रोक के आदेश में कारण लिखित में दर्ज करने होते हैं, और अदालत इसकी वजह भी लिखती है: ताकि अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका में उन्हें चुनौती दी जा सके। पैराग्राफ़ 110 और आगे जाता है। उसमें लिखा है कि नियम 8 को पढ़ने पर साफ़ है कि सुनवाई सिर्फ़ मध्यवर्ती संस्था की नहीं होती, और अगर 'व्यक्ति' यानी ओरिजिनेटर की पहचान हो जाती है तो आदेश पारित होने से पहले उसे भी सुना जाएगा। पैराग्राफ़ 116 में यही बात दोहराई गई है, इन शब्दों में कि धारा 69A के तहत रोक सिर्फ़ कारण सहित आदेश से लग सकती है, कई प्रक्रियात्मक सुरक्षा-उपायों का पालन करने के बाद, जिनमें ओरिजिनेटर और मध्यवर्ती संस्था की सुनवाई शामिल है।
पैराग्राफ़ 111 पूरा दो वाक्यों का है। पहला कहता है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 95 और 96 जैसे कुछ अतिरिक्त सुरक्षा-उपाय न होने से नियम असंवैधानिक नहीं हो जाते। दूसरा कहता है कि अदालत की राय में नियम किसी भी तरह से संवैधानिक रूप से त्रुटिपूर्ण नहीं हैं।

गोपनीयता वाली जो चुनौती पैराग्राफ़ 108 में दर्ज है, फ़ैसला उस पर अलग से लौटता नहीं। नियम 16 का नाम 107 में आता है और 119 के निष्कर्ष में पूरे नियम वैध ठहरा दिए जाते हैं। बीच के तीन पैराग्राफ़ सुनवाई और लिखित कारणों पर हैं, गोपनीयता पर नहीं।
दस साल बाद यही सवाल दोबारा सुप्रीम कोर्ट में है। सॉफ़्टवेयर फ़्रीडम लॉ सेंटर, इंडिया की रिट याचिका (सिविल) 161/2025 नियम 16 को रद्द करने और नियम 8 तथा 9 को सीमित पढ़ने की माँग करती है। 3 मार्च 2025 को अदालत ने केंद्र को नोटिस जारी किया। 2 मई 2025 को न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने सुशांत सिंह की स्थानांतरण याचिका पर नोटिस जारी करके उसे इसी मामले के साथ जोड़ दिया। नोटिस जारी होना याचिका से सहमति नहीं है; इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि अदालत ने सरकार से जवाब माँगा है।
डाउरी कैलकुलेटर का काटा हुआ आदेश
अंत तक लड़ने पर हाथ में क्या आता है, यह एक आदमी देख चुका है।
तनुल ठाकुर की व्यंग्य वेबसाइट 'डाउरी कैलकुलेटर' (dowrycalculator.com) जुलाई 2018 में रोक दी गई। उनकी अपनी रिट याचिका में दर्ज है कि प्रक्रिया के किसी चरण में उनसे संपर्क नहीं किया गया और रोक का आदेश उन्हें नहीं दिया गया; रोक लगने की बात उन्हें बाद में सूचना के अधिकार की अर्ज़ियों से पता चली, और वे अर्ज़ियाँ नियम 16 के हवाले से ख़ारिज हुईं। 2019 में वे दिल्ली हाई कोर्ट पहुँचे, रिट याचिका (सिविल) 13037/2019।
अदालत के आदेशों के बाद उन्हें 6 जुलाई 2018 का रोक वाला आदेश मिला, काटी हुई शक्ल में। अंतर-मंत्रालयी समिति के सामने उनकी सुनवाई 23 मई 2022 को हुई, यानी रोक लगने के लगभग चार साल बाद, और वे वकील के साथ पेश हुए। 20 जून 2022 को उन्हें चिट्ठी मिली कि समिति ने वेबसाइट रोके रखने की सिफ़ारिश की है और सक्षम प्राधिकारी ने उसे मान लिया है। उनकी लिखित दलीलों में दर्ज है कि सिफ़ारिश की प्रति तो दी गई, पर सक्षम प्राधिकारी ने अपना दिमाग़ कैसे लगाया, यह दिखाने वाला कोई काग़ज़ नहीं दिया गया: न नया आदेश, न फ़ाइल की टिप्पणियाँ।
28 नवंबर 2022 को न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने संशोधन की उनकी अर्ज़ी पर कहा कि नए आदेश याचिका दाख़िल होने के बाद के हैं, इसलिए नई याचिका दाख़िल करना ज़्यादा उचित होगा, और पुरानी याचिका इसी छूट के साथ निपटा दी। नई याचिका, रिट याचिका (सिविल) 788/2023, जनवरी 2023 में दाख़िल हुई।
20 जुलाई 2023 को उनके वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ अग्रवाल ने अदालत में एक अस्वीकरण का मसौदा सौंपा, इस प्रस्ताव के साथ कि वेबसाइट पर वह चेतावनी लगाकर उसे खोल दिया जाए। 4 अक्टूबर 2023 के आदेश में न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद ने दर्ज किया कि केंद्र के वकील ने बताया है कि अस्वीकरण अंतर-मंत्रालयी समिति ने स्वीकार नहीं किया। अदालत ने समिति की रिपोर्ट सीलबंद लिफ़ाफ़े में पेश करने को कहा।
पाँच साल, दो याचिकाओं और कई सुनवाइयों के बाद एक व्यक्ति के हाथ में जो काग़ज़ आए, वे एक काटा हुआ आदेश और एक सिफ़ारिश थे। जिस रिपोर्ट पर उसकी वेबसाइट बंद रही, वह सीलबंद लिफ़ाफ़े में अदालत के पास गई।
नियम 4(8) और 'अपनी मर्ज़ी से' वाले दो शब्द
2021 के नियमों में एक प्रावधान ऐसा है जो सीधे उपयोगकर्ता को कारण बताने की बात करता है। नियम 4(8) कहता है कि जब कोई बड़ी सोशल मीडिया कंपनी नियम 3(1)(b) के तहत "अपनी मर्ज़ी से" कोई सामग्री हटाए, तो हटाने से पहले उसे उस उपयोगकर्ता को सूचना देनी होगी जिसने वह सामग्री डाली थी, और उस सूचना में कार्रवाई तथा "उसके आधार या कारण" लिखे होंगे। उपयोगकर्ता को कार्रवाई पर आपत्ति उठाने और सामग्री बहाल कराने की माँग करने का उचित मौक़ा देना होगा, और कंपनी का भारत में नियुक्त शिकायत अधिकारी इस पूरी व्यवस्था की निगरानी करेगा।
'अपनी मर्ज़ी से' वाले दो शब्द इस प्रावधान की सीमा हैं। नियम 4(8) तब लागू होता है जब मंच अपने नियमों के उल्लंघन पर ख़ुद कार्रवाई करता है। सरकार की सूचना पर या अदालत के आदेश पर हटाई गई सामग्री इस प्रावधान के दायरे में नहीं आती, और वहाँ कारण बताने की कोई ऐसी ज़िम्मेदारी नियमों में नहीं लिखी।
फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम इसी श्रेणी में आते हैं: केंद्र सरकार ने 25 फ़रवरी 2021 की अधिसूचना एस.ओ. 942(E) से 'बड़ी सोशल मीडिया कंपनी' की सीमा भारत में पचास लाख पंजीकृत उपयोगकर्ताओं पर तय की थी।
मेटा के अपने पारदर्शिता पन्ने पर लिखा है कि किसी देश के क़ानून के तहत सामग्री पर रोक लगने पर वह उपयोगकर्ता को उस स्थानीय रोक की सूचना देती है। सूचना में कौन सी सरकार और कौन सा क़ानून, यह लिखा जाएगा, ऐसा वहाँ नहीं लिखा। न्यूज़लॉन्ड्री से 12 अगस्त 2026 को बात करते हुए मेटा के एक कर्मचारी ने, नाम न छापने की शर्त पर, यही कहा था कि धारा 79(3)(b) के तहत आई सूचनाएँ कंपनी के लिए बाध्यकारी हैं और पालन न करने पर क़ानूनी छूट चली जाती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस तरह रोकी गई पोस्टें कंपनी के सामुदायिक दिशानिर्देशों के उल्लंघन का मामला नहीं थीं; उल्लंघन होने पर उपयोगकर्ता को अलग सूचना जाती है, जिसमें लिखा होता है कि कौन सा दिशानिर्देश टूटा।
शिकायत अपील समिति का दसवाँ सवाल
उपयोगकर्ता के लिए बनी अपील की एक ही सरकारी खिड़की है। 2021 के नियमों का नियम 3A शिकायत अपील समिति बनाता है। हर समिति में एक अध्यक्ष और दो पूर्णकालिक सदस्य होते हैं, जिन्हें केंद्र सरकार नियुक्त करती है; तीनों में एक पदेन होता है और दो स्वतंत्र। नियम 3A(3) के तहत मंच के शिकायत अधिकारी के फ़ैसले से पीड़ित कोई भी व्यक्ति उसका जवाब मिलने के तीस दिन के भीतर अपील कर सकता है। समिति को तीस दिन में निपटाने की कोशिश करनी है, पूरी कार्यवाही ऑनलाइन होती है, और नियम 3A(7) के तहत मंच को समिति के आदेश का पालन करके उसकी रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर डालनी होती है। शुरुआत में सरकार ने तीन समितियाँ बनाईं।
समिति के अपने पन्ने पर अक्सर पूछे जाने वाले सवालों में दसवाँ सवाल ठीक इसी स्थिति का है। वह पूछता है कि क्या कोई उपयोगकर्ता अदालत, नियामक, उपभोक्ता मंच, किसी आयोग के फ़ैसले, या केंद्र सरकार अथवा उसके अधिकृत अधिकारी के उस आदेश के ख़िलाफ़ समिति में अपील कर सकता है जो किसी कंप्यूटर संसाधन पर सूचना तक पहुँच रोकता है।
जवाब दो वाक्यों का है। "नहीं। अपील सिर्फ़ मध्यवर्ती संस्था के शिकायत अधिकारी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ की जा सकती है।"
अभिजित जैसे किसी व्यक्ति के लिए इसका अर्थ सीधा है। मेटा के शिकायत अधिकारी के पास जाने पर वे यह सुन सकते हैं कि यह कंपनी का फ़ैसला नहीं, सरकार की सूचना का पालन है; और अपील समिति के पास जाने पर उन्हें दसवाँ सवाल मिलेगा। बचा हुआ रास्ता संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट है, यानी वही रास्ता जिसकी तरफ़ श्रेया सिंघल के पैराग्राफ़ 109 ने इशारा किया था, और जिस पर चलने के लिए सबसे पहले उस आदेश की प्रति चाहिए जिसे चुनौती दी जानी है।
समिति का पन्ना अपनी दो संख्याएँ ख़ुद दिखाता है। 15 सितंबर को उसे पढ़ा गया तो वहाँ 62,339 अपीलें मिलने और 12,741 निपटने का आँकड़ा था। घटाने पर 49,598 अपीलें बाक़ी बैठती हैं।
मेटा और X के अपने आँकड़े
मंचों की पारदर्शिता रिपोर्टें यह नहीं बतातीं कि किसी एक पोस्ट पर रोक क्यों लगी, पर पैमाना बताती हैं।
मेटा के पारदर्शिता पन्ने पर भारत के लिए जुलाई से दिसंबर 2025 का आँकड़ा दर्ज है: इस दौरान 41,000 से ज़्यादा सामग्रियों तक पहुँच भारत में रोकी गई, जो उससे पिछले साल की इसी अवधि से क़रीब तीन गुना है। न्यूज़लॉन्ड्री ने उसी रिपोर्ट का विभाजन छापा है: फ़ेसबुक पर 23,000 पोस्ट, 3,200 प्रोफ़ाइल, 935 टिप्पणियाँ और 261 पन्ने तथा समूह; इंस्टाग्राम पर 10,500 सामग्रियाँ और 3,540 खाते। इन छह संख्याओं का जोड़ 41,436 है, यानी विभाजन कुल के साथ बैठता है।
उसी पन्ने पर मेटा ने आधारों का मोटा बँटवारा भी दिया है। 9,000 से ज़्यादा सामग्रियाँ इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के निर्देशों पर रोकी गईं। 22,000 से ज़्यादा उन अदालती आदेशों पर, जो स्थानीय पुलिस एजेंसियों ने पेश किए और जिनका विषय मेटा के अपने शब्दों में स्थानीय राजनेताओं के बारे में एआई से बनी सामग्री था। थ्रेड्स पर 100 से ज़्यादा। बाक़ी दूसरे स्थानीय क़ानूनों के कथित उल्लंघन पर।

X का आँकड़ा एक अदालत में दर्ज है। कंपनी ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया कि जनवरी से जून 2025 के बीच उसे भारत सरकार से पोस्ट हटाने के 29,118 अनुरोध मिले और उसने 26,641 पर अमल किया। यह 91.49 फ़ीसदी बैठता है।
इनमें से कोई संख्या यह नहीं बताती कि किस पोस्ट पर कौन सा प्रावधान लगा, या रोक के बाद कितने लोगों ने उसे चुनौती दी और कितनों को कुछ मिला। मेटा की मौजूदा रिपोर्ट दिसंबर 2025 पर ख़त्म होती है, इसलिए सितंबर 2026 का यह वीडियो उसमें है ही नहीं।
अभिजित ने कहा है कि वे इस पर आगे कुछ नहीं करेंगे। सतीशन ने रोक लगने के बाद कहा कि वीडियो उन्हें पसंद आया था, पर एआई से बने कुछ वीडियो क़ानूनी सवाल खड़े कर सकते हैं। किस आधार पर यह वीडियो रुका, यह अब भी दर्ज नहीं है।
स्रोतद हिंदू, 14 सितंबर 2026 (पीटीआई): मेटा का संदेश, वीडियो की तारीख़ें और दर्शक-संख्या, और मुख्यमंत्री का केरल हाई कोर्ट के कार्यक्रम वाला बयान, ओणमनोरमा, 14 सितंबर 2026: 'रीच यू' और अभिजित के.एस. का ब्योरा, और मेटा के संदेश का दूसरा पाठ, ओणमनोरमा, 5 सितंबर 2026: मुख्यमंत्री कार्यालय के अपने दो पोस्ट हटने और बहाल होने का ब्योरा, और सचिव रतन यू. केलकर की चिट्ठी, इंडिया कोड: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का अद्यतन पाठ, धारा 69A और धारा 79, सूचना प्रौद्योगिकी (जनता के लिए सूचना तक पहुँच अवरुद्ध करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009, जी.एस.आर. 781(E), 27 अक्टूबर 2009: नियम 6 से 16 और नियम 6(2) वाला फ़ॉर्म, श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट, 24 मार्च 2015: पैराग्राफ़ 107 से 111, 116 और 119, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय: सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्था दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021, 10 फ़रवरी 2026 तक संशोधित पाठ, नियम 3(1)(d), नियम 3A और नियम 4(8), शिकायत अपील समिति का आधिकारिक पन्ना: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल, सवाल संख्या 10, मेटा पारदर्शिता केंद्र: भारत में स्थानीय क़ानून के आधार पर सामग्री पर रोक, जुलाई से दिसंबर 2025, न्यूज़लॉन्ड्री, 12 अगस्त 2026: मेटा के भारत के आँकड़ों का विभाजन और मेटा के एक कर्मचारी का बयान, मीडियानामा, 11 मार्च 2026: धारा 69A के तहत रोकी गई पोस्टों पर X की सूचना का पाठ, और कर्नाटक हाई कोर्ट में X के दिए आँकड़े, इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन, 5 अक्टूबर 2023: तनुल ठाकुर के मुक़दमे का क्रम, और मुक़दमे के मूल काग़ज़ों की प्रतियाँ, सॉफ़्टवेयर फ़्रीडम लॉ सेंटर, इंडिया बनाम भारत संघ, रिट याचिका (सिविल) 161/2025: नियम 16 को चुनौती और याचिका की माँगें, लाइव लॉ, 2 मई 2025: सुशांत सिंह की स्थानांतरण याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस