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सहयोग पोर्टल का पूरा झगड़ा धारा 79(3)(b) की एक पंक्ति पर टिका है

X कॉर्प ने गुजरात हाई कोर्ट में दाख़िल हलफ़नामे में गृह मंत्रालय पर आरोप लगाया है कि वह 'बैकडोर' से ऐसा आदेश चाहता है जो कंपनी को सहयोग पोर्टल से जोड़ दे। इंडियन एक्सप्रेस ने यह 11 सितंबर को छापा। जड़ में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की दो अलग धाराएँ हैं, और दोनों में से एक के साथ कोई लिखी हुई प्रक्रिया नहीं जुड़ी है।

अहमदाबाद में गुजरात हाई कोर्ट की इमारत, 2012 की तस्वीर, जहाँ दाख़िल अगस्त वाले हलफ़नामे में X ने गृह मंत्रालय पर तथ्य छिपाने का आरोप लगाया है
तस्वीर: Maulik Kansara, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

इंडियन एक्सप्रेस ने शुक्रवार, 11 सितंबर को छापा कि X कॉर्प ने गुजरात हाई कोर्ट में दाख़िल एक हलफ़नामे में गृह मंत्रालय पर आरोप लगाया है कि मंत्रालय ने अदालत से कुछ तथ्य छिपाए और 'बैकडोर' से ऐसा आदेश हासिल करना चाहता है जो कंपनी को सहयोग पोर्टल से जोड़ दे। हलफ़नामा अगस्त में दाख़िल हुआ था और उस पर कंपनी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता ज़ौर गाजीव के दस्तख़त हैं।

यह आरोप है, और किसी अदालत ने अब तक इस पर कोई फ़ैसला नहीं सुनाया है।

पाठक के लिए इसका मतलब समझने के लिए एक बात जान लेना ज़रूरी है। भारत में किसी पोस्ट या पूरे खाते तक पहुँच रोकने के दो अलग क़ानूनी रास्ते हैं। पहला रास्ता सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A है, जिसके साथ 2009 के विस्तृत नियम जुड़े हैं। दूसरा रास्ता उसी अधिनियम की धारा 79(3)(b) है, जिसके साथ 2021 के नियमों का नियम 3(1)(d) जुड़ा है। सहयोग पोर्टल दूसरे रास्ते के नोटिस भेजने के लिए बना है।

दोनों रास्तों में जो सबसे बड़ा फ़र्क़ है वह यह है कि पहले के साथ एक लिखी हुई प्रक्रिया है और दूसरे के साथ नहीं। बाक़ी सारा झगड़ा इसी फ़र्क़ से निकलता है।

गुमशुदा बेटे का मुक़दमा और पोर्टल की शुरुआत

सहयोग पोर्टल पहली बार किसी अदालत के काग़ज़ों में एक ऐसे मुक़दमे से आया जिसका सोशल मीडिया के नियमन से कोई सीधा वास्ता नहीं था। दिल्ली हाई कोर्ट में शबाना नाम की एक महिला ने अपने गुमशुदा बेटे को पेश कराने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी, संविधान के अनुच्छेद 226 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत। मुक़दमे का नंबर W.P.(CRL) 1563/2024 है और यह न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह तथा न्यायमूर्ति अमित शर्मा की खंडपीठ के सामने चलता रहा है।

19 सितंबर 2024 को अदालत को बताया गया कि जाँच अधिकारी को एक सुराग़ मिला है: 6 सितंबर 2024 को लापता लड़का एक इंस्टाग्राम खाते का इस्तेमाल कर रहा था। पुलिस ने धारा 91 का नोटिस भेजकर उस खाते का फ़ोन नंबर, आईपी पता और उपकरण का आईएमईआई नंबर माँगा। आदेश में दर्ज है कि जाँच अधिकारी के मुताबिक़ कोई जवाब नहीं आया था।

अगले ही दिन मेटा के वकील पेश हुए और उन्होंने कहा कि जानकारी उस मंच पर डाल दी गई थी जिसे क़ानून प्रवर्तन एजेंसियाँ इस्तेमाल करती हैं, और राज्य के स्थायी वकील ने पुष्टि की कि वह उसी सुबह मिल गई थी। इसी मौक़े पर अदालत ने दर्ज किया कि गुमशुदगी के कई मुक़दमों में पुलिस के माँगने और मंच के देने के बीच देरी होती है, और उस देरी में क़ीमती वक़्त चला जाता है। उसी 20 सितंबर 2024 के आदेश से कई मंचों को नोटिस गए।

गृह मंत्रालय ने 11 दिसंबर 2024 को 10 दिसंबर की तारीख़ वाली स्थिति रिपोर्ट दाख़िल की। उसमें लिखा था कि साइबर अपराध की शिकायतों और सभी मंचों से तालमेल के लिए नोडल एजेंसी भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) है, और मंत्रालय 'सहयोग' नाम का साझा पोर्टल बना रहा है। रिपोर्ट के शब्दों में उस समय पोर्टल पायलट चरण में था, 9 मंच जुड़े थे (जोश, कोरा, टेलीग्राम, अमेज़ॉन, ऐपल, गूगल, यूट्यूब, पीआई डेटा सेंटर और शेयरचैट), 16 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों ने अपने नोडल अधिकारी अधिसूचित किए थे और बाक़ी 20 ने नहीं।

29 जनवरी 2025 की अगली स्थिति रिपोर्ट में यह संख्या 38 हो गई थी। उसी रिपोर्ट के हवाले से अदालत ने 18 मार्च 2025 के आदेश में दर्ज किया कि X कॉर्प ने 11 नवंबर 2024 को I4C को चिट्ठी लिखकर अपना रुख़ बता दिया था: श्रेया सिंघल फ़ैसले को देखते हुए सहयोग पोर्टल धारा 69A की योजना से बाहर पड़ता है और वह मौजूदा व्यवस्था के समांतर एक ऐसी व्यवस्था खड़ी करता है जिसमें न प्रक्रिया है न सुरक्षा-उपाय।

I4C की शिकायत उसी आदेश में उद्धृत है। एजेंसी ने कहा कि उसने बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान करके 17 दिसंबर 2024 को धारा 79(3)(b) के तहत नोटिस भेजा था और X ने उस पर अनुपालन की कोई सूचना नहीं दी। X की तरफ़ से वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि आपत्तिजनक सामग्री 24 घंटे के भीतर हटा दी गई थी। उसी दिन अदालत ने बाक़ी मंचों को मुक़दमे से अलग कर दिया, यह दर्ज करते हुए कि X को छोड़कर लगभग सभी बड़े मंच पोर्टल पर आ चुके हैं या आने की प्रक्रिया में हैं।

सहयोग पोर्टल का ढाँचा और उससे जुड़ी एजेंसियाँ

पोर्टल गृह मंत्रालय के I4C ने बनाया है, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और दूरसंचार विभाग के साथ मिलकर। यह अक्टूबर 2024 से चल रहा है। पोर्टल की अपनी वेबसाइट पर इसका काम इन शब्दों में लिखा है: उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी की तरफ़ से मध्यवर्ती संस्थाओं को नोटिस भेजने की प्रक्रिया को स्वचालित करना, ताकि किसी ग़ैर-क़ानूनी काम में इस्तेमाल हो रही सूचना, डेटा या लिंक को हटाना या उस तक पहुँच रोकना आसान हो।

रायसीना पहाड़ी पर नॉर्थ ब्लॉक, 2019 की तस्वीर, जिसमें गृह मंत्रालय बैठता है और जिसके I4C ने सहयोग पोर्टल बनाया
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में लिखा कि पोर्टल ख़ुद कुछ नहीं रोकता, वह एक तरह का डिजिटल डाकघर है। उसी फ़ैसले में यह भी दर्ज है कि सॉलिसिटर जनरल के मुताबिक़ बाध्यकारी ब्लॉकिंग आदेश देने की ताक़त सिर्फ़ धारा 69A और 2009 के नियमों के पास है।

उसी फ़ैसले में सॉलिसिटर जनरल का लिखित पक्ष उद्धृत है, जिसके अनुसार 24 मार्च 2025 तक 28 राज्यों, 5 केंद्रशासित प्रदेशों और 6 केंद्रीय मंत्रालयों ने अपनी अधिकृत एजेंसियाँ और नोडल अधिकारी अधिसूचित किए थे। वे छह मंत्रालय हैं: गृह, रक्षा, वित्त (एफ़आईयू और डीजीजीआई), सूचना एवं प्रसारण, ग्रामीण विकास तथा भारी उद्योग। चंडीगढ़, लक्षद्वीप और दादरा-नगर हवेली तथा दमन-दीव ने तब तक नहीं किया था। X की याचिका ने जिन अधिसूचनाओं को रद्द कराने की माँग की, उनमें रेल मंत्रालय की 24 दिसंबर 2024 की अधिसूचना, गृह मंत्रालय की 13 मार्च 2024 की अधिसूचना (F. No. 22003/21/2019-I4C) और इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय का 31 अक्टूबर 2023 का कार्यालय ज्ञापन भी शामिल थे।

संख्या की रफ़्तार इन्हीं दस्तावेज़ों से पढ़ी जा सकती है। दिसंबर 2024 में 9 मंच, जनवरी 2025 में 38, और अप्रैल 2026 में 524, जो आँकड़ा केंद्र ने गुजरात हाई कोर्ट को दिया और जो उस अदालत के आदेश में दर्ज है।

दो धाराएँ, दो अलग प्रक्रियाएँ

धारा 69A सरकार को सीधे ताक़त देती है। उसका पाठ कहता है कि केंद्र सरकार या उसका विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी, अगर संतुष्ट हो कि ऐसा करना ज़रूरी या समीचीन है, तो लिखित में कारण दर्ज करके किसी सरकारी एजेंसी या मध्यवर्ती संस्था को सूचना तक पहुँच रोकने का आदेश दे सकता है। जिन आधारों पर यह हो सकता है वे छह हैं: भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, और इनसे जुड़े किसी संज्ञेय अपराध के लिए उकसावे को रोकना। धारा 69A(3) के तहत आदेश न मानने वाली मध्यवर्ती संस्था को सात साल तक की क़ैद और जुर्माना हो सकता है।

इस धारा के साथ 2009 के नियम जुड़े हैं और उनमें प्रक्रिया लिखी हुई है। नियम 7 के तहत हर अनुरोध एक समिति के सामने जाता है, जिसका अध्यक्ष नामित अधिकारी होता है और जिसमें विधि एवं न्याय, गृह तथा सूचना-प्रसारण मंत्रालयों के संयुक्त सचिव स्तर के प्रतिनिधि और सीईआरटी-इन का प्रतिनिधि होते हैं। नियम 8 कहता है कि नामित अधिकारी सामग्री डालने वाले व्यक्ति या मध्यवर्ती संस्था को पहचानने की हर मुनासिब कोशिश करेगा और पहचान होने पर उसे समिति के सामने पेश होकर जवाब देने का नोटिस भेजेगा, जिसके और सुनवाई के बीच कम से कम 48 घंटे होने चाहिए। नियम 11 सात कार्यदिवस की समयसीमा तय करता है। नियम 13 हर मध्यवर्ती संस्था से कहता है कि वह इन आदेशों को लेने के लिए कम से कम एक व्यक्ति नामित करे, और वह व्यक्ति आदेश मिलने के दो घंटे के भीतर पावती भेजे। नियम 14 के तहत समीक्षा समिति हर दो महीने में कम से कम एक बार बैठती है और वह आदेश रद्द करके सामग्री बहाल कराने का निर्देश दे सकती है। आपात स्थिति में नियम 9(2) सचिव को बिना सुनवाई अंतरिम आदेश देने की छूट देता है, पर नियम 9(3) कहता है कि 48 घंटे के भीतर मामला समिति के सामने रखना होगा।

धारा 79(3)(b) इस तरह की कोई ताक़त नहीं देती। धारा 79 असल में छूट देने वाला प्रावधान है: मध्यवर्ती संस्था तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं मानी जाएगी, बशर्ते वह कुछ शर्तें पूरी करे। इसे 'सेफ़ हार्बर' कहते हैं। उपधारा (3)(b) उसी छूट की एक शर्त है, और उसका पाठ यह है कि छूट लागू नहीं होगी अगर संस्था को यह वास्तविक जानकारी मिलने पर, या उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी की तरफ़ से सूचित किए जाने पर कि उसके संसाधन पर मौजूद कोई सूचना किसी ग़ैर-क़ानूनी काम में इस्तेमाल हो रही है, वह उसे तुरंत हटाने में नाकाम रहे। सज़ा क़ैद नहीं है, छूट का चला जाना है।

2021 के नियमों का नियम 3(1)(d) इसी को खोलता है। उसमें आधारों की जो सूची है वह अनुच्छेद 19(2) की सूची है: भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता, अदालत की अवमानना, मानहानि, और इनसे जुड़े अपराध के लिए उकसावा। सूची यहीं ख़त्म नहीं होती। उसके बाद लिखा है, "या ऐसी कोई सूचना जो उस समय लागू किसी क़ानून के तहत निषिद्ध है"। नियम में एक शर्त और है: सरकार की तरफ़ से ऐसी सूचना वही एजेंसी भेज सकती है जिसे उपयुक्त सरकार ने अधिकृत एजेंसी के रूप में अधिसूचित किया हो। राज्यों और मंत्रालयों ने नोडल अधिकारी अधिसूचित करके यही शर्त पूरी की है, और सहयोग पोर्टल उन्हीं अधिसूचित अधिकारियों को एक जगह लाता है। नियम मूल रूप से 36 घंटे में हटाने को कहता था; फ़रवरी 2026 के संशोधन ने यह समय घटाकर तीन घंटे कर दिया, जो 20 फ़रवरी 2026 से लागू है।

यहीं वह ख़ाली जगह है जिसकी तरफ़ सरकार ख़ुद इशारा करती है। बाल यौन शोषण सामग्री धारा 69A के छह आधारों में कहीं नहीं आती। I4C की जो स्थिति रिपोर्ट दिल्ली हाई कोर्ट के 18 मार्च 2025 के आदेश में उद्धृत है, वह यही कहती है कि ऐसी सामग्री उन परिस्थितियों में फ़िट नहीं बैठती, और इसीलिए एजेंसी 79(3)(b) तथा नियम 3(1)(d) का इस्तेमाल करती है। मानहानि भी 69A के आधारों में नहीं है, पर नियम 3(1)(d) में है।

श्रेया सिंघल के दो पैराग्राफ़

24 मार्च 2015 को न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति आर.एफ़. नरीमन ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में धारा 66A रद्द की, धारा 69A और 2009 के नियमों को वैध ठहराया, और धारा 79(3)(b) को रद्द करने से इनकार करते हुए उसे सीमित पढ़ा। दोनों पक्ष आज उसी फ़ैसले के अलग-अलग हिस्से पढ़ते हैं।

जिस पैराग्राफ़ में अदालत ने असल में प्रावधान सीमित किया, वह कहता है कि धारा 79(3)(b) को इस अर्थ में पढ़ा जाएगा कि मध्यवर्ती संस्था को वास्तविक जानकारी तब मिलती है जब अदालत का आदेश आता है। अदालत ने कारण भी दिया: वरना गूगल और फ़ेसबुक जैसी संस्थाओं के लिए लाखों अनुरोधों में यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि कौन जायज़ है और कौन नहीं। उसी पैराग्राफ़ में दो शर्तें और हैं। अदालत का आदेश या सरकार की अधिसूचना, दोनों को अनुच्छेद 19(2) के विषयों का कड़ाई से पालन करना होगा; और 19(2) से बाहर के ग़ैर-क़ानूनी काम धारा 79 का हिस्सा नहीं बन सकते।

निष्कर्ष वाला पैराग्राफ़ अलग शब्द इस्तेमाल करता है। वहाँ लिखा है कि धारा 79 वैध है, बशर्ते 79(3)(b) को इस तरह पढ़ा जाए कि मध्यवर्ती संस्था अदालत के आदेश से, "या उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी की तरफ़ से सूचित किए जाने पर" कि अनुच्छेद 19(2) से संबंधित ग़ैर-क़ानूनी काम होने वाले हैं, सामग्री हटाने में नाकाम रहे। एक पैराग्राफ़ में सिर्फ़ अदालत है, दूसरे में अदालत या सरकार।

नियम 3(1)(d) दूसरे पैराग्राफ़ की भाषा में लिखा गया है। उसमें "अदालत के आदेश के रूप में या उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी द्वारा धारा 79 की उपधारा (3) के खंड (b) के तहत सूचित किए जाने पर" शब्द मौजूद हैं। X का पूरा मुक़दमा पहले पैराग्राफ़ पर खड़ा है, और सरकार का पक्ष दूसरे पर।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसका जवाब एक अलग रास्ते से दिया। फ़ैसले में दर्ज है कि श्रेया सिंघल में जिन नियमों की व्याख्या हुई थी वे 2011 के मध्यवर्ती दिशानिर्देश थे, जो अब रद्द होकर 2021 के नियमों से बदल चुके हैं। अदालत के शब्दों में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे विधान की व्याख्या की जो अब अस्तित्व में नहीं है। धारा 69A, धारा 79 और 2009 के नियम वही हैं, नियम बदल गए हैं, इसलिए मामले को नई निगाह से देखना होगा।

कर्नाटक का फ़ैसला और उसकी अपील

24 सितंबर 2025 को न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने 351 पन्नों का फ़ैसला सुनाकर X की याचिका ख़ारिज कर दी। उन्होंने सहयोग पोर्टल को असंवैधानिक मानने से इनकार किया, नियम 3(1)(d) को वैध ठहराया, और यह भी कहा कि अनुच्छेद 19 का संरक्षण नागरिकों के लिए है, इसलिए विदेश में पंजीकृत कंपनी उसके सहारे क़ानून को चुनौती नहीं दे सकती। इसी अदालत ने 2023 में X की एक पुरानी याचिका 50 लाख रुपये का ख़र्चा लगाकर ख़ारिज की थी, जो कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को 45 दिन में देना था।

बेंगलुरु में कर्नाटक हाई कोर्ट की इमारत अट्टारा कचेरी, 2019 की तस्वीर, जहाँ 351 पन्नों के उस फ़ैसले से X की याचिका ख़ारिज हुई थी
तस्वीर: N. Vivekananthamoorthy, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

याचिका में X ने तीन घोषणाएँ माँगी थीं: कि धारा 79(3)(b) ब्लॉकिंग आदेश देने का अधिकार नहीं देती, कि ऐसे आदेश सिर्फ़ धारा 69A और 2009 के नियमों के तहत निकल सकते हैं, और कि नियम 3(1)(d) अधिनियम से बाहर है। तीनों ख़ारिज हुईं। जिन संस्थाओं ने बीच में हस्तक्षेप की अर्ज़ी दी थी, उनकी अर्ज़ी भी उन्हीं कारणों से ख़ारिज हो गई।

X ने अपील की। लाइव लॉ की 10 मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक़ मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति सी. पूनाचा की पीठ ने अपील WA 1827/2025 में केंद्र को नोटिस जारी किया। नोटिस जारी होने का मतलब जवाब माँगना है, सहमति नहीं। डिजीपब न्यूज़ इंडिया फ़ाउंडेशन ने भी अलग अपील दाख़िल की। दिल्ली हाई कोर्ट के 6 फ़रवरी 2026 के आदेश में X के वरिष्ठ वकील का यह कहना दर्ज है कि एकल न्यायाधीश के उस फ़ैसले में भी कंपनी को पोर्टल से जुड़ने का कोई निर्देश नहीं दिया गया था।

'बैकडोर' का आरोप और केंद्र का जवाब

जिस गुजरात वाले मुक़दमे से यह विवाद निकला है, वह सहयोग पोर्टल के बारे में है ही नहीं। वकील विकास विजय नायर की जनहित याचिका R/WP(PIL) 9/2026 डीपफ़ेक और एआई से बनी सामग्री की बढ़ती तादाद के बारे में है। 15 अप्रैल 2026 को मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने मेटा, गूगल, X, रेडिट और स्क्रिब्ड को 8 मई के लिए नोटिस जारी किया। उसी आदेश में एक अंतरिम निर्देश है: ये पाँचों यह सुनिश्चित करें कि वे गृह मंत्रालय के I4C के बनाए सहयोग पोर्टल से जुड़ जाएँ, ताकि तालमेल बेहतर हो और कार्रवाई समयबद्ध हो।

उसी आदेश में केंद्र के आँकड़े दर्ज हैं। 524 मंच पोर्टल पर हैं, जिनमें मेटा और गूगल शामिल हैं, X नहीं। केंद्र के मुताबिक़ X को 94 सूचनाएँ भेजी गईं: 2024 में 60 (1,029 यूआरएल), 2025 में 33 (121 यूआरएल) और 2026 में 1 (10 यूआरएल), कुल 1,160 यूआरएल। इनमें से सिर्फ़ 13 पर औपचारिक जवाब मिला, 12 साल 2024 के और 1 साल 2025 का। उसी आदेश में यह भी लिखा है कि X ने 2024 में 788 यूआरएल, 2025 में 70 और 2026 में 6 पर पहुँच रोकी। केंद्र की शिकायत औपचारिक जवाबों के बारे में है। हटाई गई सामग्री का आँकड़ा उसी आदेश में उसके साथ ही दर्ज है।

X ने अगस्त वाले हलफ़नामे में यह नहीं माना कि उसने सहयोग नहीं किया। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ कंपनी ने कहा कि वह धारा 69A के सारे ब्लॉकिंग आदेशों का पालन कुछ ही घंटों में करती है, आपात आदेशों समेत, और जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच सरकार की भेजी 146 सूचियों के सभी 5,129 यूआरएल पर उसने कार्रवाई की। कंपनी का असल एतराज़ धारा पर है: 79(3)(b) के तहत भेजे गए नोटिस अनुरोध हैं, 69A के आदेश नहीं, और अगर सरकार को लगता था कि सामग्री रोकने लायक़ है तो वह 69A का रास्ता ले सकती थी।

हलफ़नामे में एक उदाहरण @TribalArmy नाम के हैंडल का दिया गया है, जिसकी पोस्ट छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल में अडाणी समूह की खनन मंज़ूरी के बारे में थी। X के मुताबिक़ सरकार ने उसे पूरे देश में हटाने को कहा, यह कहते हुए कि उसमें प्रधानमंत्री की एआई से बनी तस्वीर है। कंपनी का कहना है कि ऐसे नोटिस में सोच-विचार नहीं दिखता और इसी तरह की स्थिति के लिए 69A के सुरक्षा-उपाय बने हैं। छिपाने का आरोप यह है कि केंद्र ने गुजरात हाई कोर्ट को न कर्नाटक की खंडपीठ के 10 मार्च 2026 के नोटिस के बारे में बताया, न डिजीपब के हस्तक्षेप के बारे में। केंद्र का अप्रैल वाला हलफ़नामा कहता है कि X ने क़ानूनी निर्देशों में सहयोग नहीं किया। दोनों दावे अभी दावे हैं।

कुमार नयन का बंद खाता और समीक्षा समिति

18 मार्च 2026 को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एक ब्लॉकिंग आदेश जारी किया और अगले दिन X ने दो लोगों को ईमेल भेजकर बताया कि उनके खाते भारत में रोके जा रहे हैं। ये दो लोग थे प्रतीक शर्मा, जो @DrNimoYadav चलाते हैं, और राजनीतिक टिप्पणीकार कुमार नयन, जो @Nehr_who चलाते हैं। इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन के मुताबिक़ X ने उसी 19 मार्च को मंत्रालय को एतराज़ की चिट्ठी भी लिखी, जिसमें कहा गया कि आदेश धारा 69A की शर्तें पूरी नहीं करता, सामग्री का बड़ा हिस्सा उस धारा के आधारों में नहीं आता, और किसी खाताधारक को सुनवाई का मौक़ा नहीं दिया गया।

30 मार्च 2026 को X ने अदालत में वह आदेश पेश किया जिसके तहत @DrNimoYadav का खाता रोका गया था। उसमें ब्लॉक करने का आधार मानहानि बताया गया था। मानहानि अनुच्छेद 19(2) की सूची में है और नियम 3(1)(d) की सूची में भी है। धारा 69A के छह आधारों में वह नहीं है।

6 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने दोनों खाते बहाल करने को कहा, सिवाय उन पोस्टों के जो आदेश में चिह्नित थीं और जिन्हें 'अस्थायी रूप से रोकी गई' श्रेणी में डालना था। अदालत ने दोनों याचिकाकर्ताओं को 2009 के नियमों के नियम 14 वाली समीक्षा समिति के सामने पेश होने का निर्देश दिया, यह कहते हुए कि वहाँ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत माने जाएँगे और वे अपने वकील के साथ जा सकते हैं। इस आख़िरी बात का आधार दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ का तनुल ठाकुर वाला 11 मई 2022 का आदेश है।

चार महीने बाद वही खाता दोबारा बंद हुआ। स्क्रॉल की 10 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक़ X ने नयन को 27 जुलाई को बताया कि वह धारा 69A के तहत एक आदेश लागू कर रहा है; सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 28 जुलाई को खाता बंद करने का प्रस्ताव देते हुए नोटिस भेजा और उन लिंकों की सूची दी जिन पर कार्रवाई प्रस्तावित थी; और 7 अगस्त को अंतर-विभागीय समिति की कार्यवाही हुई। नयन का कहना है कि आदेश की प्रति उन्हें तब भी नहीं दी गई। खाते के 2.5 लाख से ज़्यादा फ़ॉलोअर थे।

नई दिल्ली में शास्त्री भवन, 2022 की तस्वीर, जिसमें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय बैठता है और जहाँ से 28 जुलाई वाला नोटिस गया
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

प्रति न मिलने का एक क़ानूनी कारण है। 2009 के नियमों का नियम 16 कहता है कि मिले हुए सारे अनुरोधों, शिकायतों और उन पर की गई कार्रवाई के बारे में कड़ी गोपनीयता बरती जाएगी। दिल्ली हाई कोर्ट में यह मामला 10 सितंबर को न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के सामने आया, जिन्होंने केंद्र से रुख़ पूछा है। अगली सुनवाई 16 सितंबर को है।

सुप्रीम कोर्ट में जमा हुए सारे मुक़दमे

22 जुलाई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र की स्थानांतरण याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि तब तक हाई कोर्टों की कार्यवाही रुकी रहेगी। याचिकाएँ TP(C) 2071-2074/2026 हैं और उनका शीर्षक भारत संघ बनाम डिजीपब न्यूज़ इंडिया फ़ाउंडेशन है। जो चार मुक़दमे रोके गए वे हैं: कर्नाटक हाई कोर्ट में X कॉर्प और डिजीपब की अपीलें, और बंबई हाई कोर्ट में हास्य कलाकार कुणाल कामरा तथा वरिष्ठ वकील हरेश जगतियानी की याचिकाएँ।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ उसी पीठ ने 8 सितंबर 2026 को गुजरात वाले मुक़दमे के लिए दाख़िल स्थानांतरण याचिका पर भी नोटिस जारी किया और वहाँ की आगे की कार्यवाही रोक दी; अगली तारीख़ 5 अक्टूबर है। गुजरात हाई कोर्ट में वह मामला 11 सितंबर को ही सूचीबद्ध था।

पोर्टल की वैधता पर सवाल और भी अदालतों में लंबित हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के 6 फ़रवरी 2026 के आदेश में सॉफ़्टवेयर फ़्रीडम लॉ सेंटर की याचिका WP(C) 7650/2025 और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में रजत कलसन की याचिका CWP 22084/2025 दोनों दर्ज हैं।

आम उपयोगकर्ता के लिए इस पूरे ढाँचे में एक बात साफ़ है। धारा 79(3)(b) के रास्ते पर नोटिस मंच के पास जाता है, आपके पास नहीं, और नियम 3(1)(d) में ऐसी कोई शर्त नहीं है जो आपको सूचना देने या सुनने को कहे; वहाँ आपका रास्ता मंच का शिकायत अधिकारी है। धारा 69A के रास्ते पर प्रक्रिया लिखी हुई है और समीक्षा समिति मौजूद है, पर कुमार नयन का मुक़दमा दिखाता है कि आदेश की प्रति मिलना अलग सवाल है। इन दोनों में से कौन सा रास्ता किस हद तक क़ानूनी है, यह अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा, और उससे पहले कोई हाई कोर्ट इनमें से किसी याचिका को नहीं सुनेगा।

स्रोतश्रेया सिंघल बनाम भारत संघ, (2015) 5 SCC 1, सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला, 24 मार्च 2015: धारा 79(3)(b) को सीमित करने वाला पैराग्राफ़ और निष्कर्ष वाला पैराग्राफ़, कर्नाटक हाई कोर्ट, रिट याचिका 7405/2025, X कॉर्प बनाम भारत संघ, न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना, 24 सितंबर 2025 का 351 पन्नों का फ़ैसला (इसमें 2009 के ब्लॉकिंग नियम, सॉलिसिटर जनरल का लिखित पक्ष और श्रेया सिंघल के उद्धृत पैराग्राफ़ हैं), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 का अद्यतन सरकारी पाठ: धारा 69A और धारा 79, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय: सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्था दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021, नियम 3(1)(d) का पूरा पाठ, सहयोग पोर्टल की अपनी वेबसाइट, गृह मंत्रालय: पोर्टल किस काम के लिए बना, इसका आधिकारिक विवरण, दिल्ली हाई कोर्ट, W.P.(CRL) 1563/2024, शबाना बनाम दिल्ली सरकार, 18 मार्च 2025 का आदेश: गृह मंत्रालय की 10 दिसंबर 2024 और 29 जनवरी 2025 की स्थिति रिपोर्टें उद्धृत, दिल्ली हाई कोर्ट, उसी मुक़दमे में 6 फ़रवरी 2026 का आदेश: I4C का 11 दिसंबर 2025 का अतिरिक्त हलफ़नामा और लंबित याचिकाओं की सूची, दिल्ली हाई कोर्ट, उसी मुक़दमे में 16 सितंबर 2025 का आदेश: 12 अगस्त 2025 के निर्देश का पाठ, इंडियन एक्सप्रेस, 11 सितंबर 2026, अदिति राजा: X कॉर्प के अगस्त वाले हलफ़नामे की सामग्री और 8 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट आदेश की रिपोर्ट, लाइव लॉ, 15 अप्रैल 2026: गुजरात हाई कोर्ट का आदेश, जनहित याचिका (PIL) 9/2026, मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे; केंद्र के आँकड़े आदेश से उद्धृत, लाइव लॉ, 14 अगस्त 2026: X कॉर्प का संशोधन आवेदन और 11 सितंबर की अगली तारीख़, लाइव लॉ, 10 मार्च 2026: कर्नाटक हाई कोर्ट की खंडपीठ का X कॉर्प की अपील WA 1827/2025 में नोटिस, लाइव लॉ, 7 अगस्त 2026: सुप्रीम कोर्ट का 22 जुलाई 2026 का आदेश, स्थानांतरण याचिकाएँ TP(C) 2071-2074/2026, इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन, 6 अप्रैल 2026: प्रतीक शर्मा और कुमार नयन के मुक़दमों का ब्योरा, दिल्ली हाई कोर्ट के 30 मार्च और 6 अप्रैल 2026 के आदेश, स्क्रॉल, 10 सितंबर 2026: कुमार नयन की दूसरी याचिका, 27 और 28 जुलाई तथा 7 अगस्त 2026 की तारीख़ें, लाइव लॉ: दिल्ली हाई कोर्ट में 10 सितंबर 2026 की सुनवाई, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा, अगली तारीख़ 16 सितंबर, खेतान एंड कंपनी: सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2026 का विश्लेषण, 36 घंटे से 3 घंटे की समयसीमा और 20 फ़रवरी 2026 से लागू होना

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।