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कवच का एक किलोमीटर लखनऊ मंडल में 41.47 लाख का, मुरादाबाद में 23.88 लाख का, और दोनों विज्ञप्तियाँ वजह नहीं बतातीं

शनिवार, 19 सितंबर की दोपहर रेल मंत्रालय ने 53 मिनट में चार काम मंज़ूर किए, कुल 736.23 करोड़ रुपये। सबसे बड़ी रक़म उत्तर-पूर्व रेलवे के लखनऊ मंडल में कवच 4.0 की है: 607.7 रूट किलोमीटर पर 252 करोड़। अठारह दिन पहले उत्तरी रेलवे के मुरादाबाद मंडल में वही संस्करण 712 रूट किलोमीटर पर 170 करोड़ में मंज़ूर हुआ था।

भारतीय रेल की कवच प्रणाली की लोको इकाई, यानी इंजन में लगने वाला वह डिब्बा जो केबिन के भीतर दूरी, रफ़्तार और सिग्नल की हालत दिखाता है, रेल मंत्रालय की 2021 में जारी तस्वीर
तस्वीर: Ministry of Railways (India), विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

दोपहर के 53 मिनट, चार मंज़ूरियाँ

शनिवार, 19 सितंबर को रेल मंत्रालय ने दोपहर 3 बजकर 23 मिनट से शाम 4 बजकर 16 मिनट के बीच चार विज्ञप्तियाँ जारी कीं। चारों का साँचा एक है। हर एक में एक काम है, एक रक़म है, और एक लंबाई या गिनती है।

पहली विज्ञप्ति (3:23, रिलीज़ 2312428) पश्चिम रेलवे के उधना-उकाई सोंगाध खंड पर एक चार लेन के रोड ओवर ब्रिज की है, कुल 133.2295 करोड़ रुपये। दूसरी (3:25, रिलीज़ 2312432) दक्षिण तट रेलवे के 73 रूट किलोमीटर लंबे सवलियापुरम-गुंटूर खंड पर बिजली की लाइन को 1×25 केवी से 2×25 केवी करने की है, 142 करोड़ रुपये। तीसरी (4:15, रिलीज़ 2312504) मध्य रेलवे के सोलापुर मंडल के सात स्टेशनों पर इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग की है, 209 करोड़ रुपये। चौथी (4:16, रिलीज़ 2312506) उत्तर-पूर्व रेलवे के लखनऊ मंडल के 607.7 रूट किलोमीटर पर कवच 4.0 की है, 252 करोड़ रुपये।

चारों का जोड़ 736.2295 करोड़ रुपये बनता है। द इंडियन एक्सप्रेस ने उसी शाम 5 बजकर 1 मिनट पर छपी अनीश मंडल की रिपोर्ट में इसे 736 करोड़ रुपये लिखा, और चार राज्य गिनाए: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गुजरात।

सबसे बड़ी रक़म कवच वाली है। उसी में एक संख्या छिपी है जिसे पाठक ख़ुद निकाल सकता है, क्योंकि विज्ञप्ति में रक़म भी है और लंबाई भी। 252 करोड़ में 607.7 का भाग दीजिए। एक रूट किलोमीटर 41.47 लाख रुपये का पड़ता है।

अठारह दिन पहले, 1 सितंबर को, यही प्रणाली और यही संस्करण एक दूसरे मंडल में मंज़ूर हुआ था। वहाँ एक रूट किलोमीटर 23.88 लाख का था।

लोको पायलट के केबिन में कवच का काम

कवच को समझने के लिए पहले यह देखना पड़ता है कि उसके बिना क्या होता है। इंजन चलाने वाला पटरी के किनारे लगे सिग्नल देखता है। उसे रुकने का संकेत दिखे तो वह ख़ुद ब्रेक लगाता है। पूरी व्यवस्था उसकी नज़र और उसके हाथ पर टिकी है।

पत्र सूचना कार्यालय के 6 फ़रवरी 2026 के पृष्ठभूमि दस्तावेज़ में इस ढाँचे की सीमाएँ गिनाई गई हैं। पुराने सिग्नल केबिन के भीतर यह नहीं बताते कि इस वक़्त कितनी रफ़्तार जायज़ है, अगला निशान कितनी दूर है, इंजन ठीक कहाँ खड़ा है और आगे ढलान कैसी है। मोड़ पर और कोहरे में सिग्नल दिखना ही मुश्किल हो जाता है। सुरक्षा की गुंजाइश रखने के लिए दो रेलगाड़ियों के बीच ज़्यादा फ़ासला रखना पड़ता है, जिससे एक ही पटरी पर कम रेलगाड़ियाँ चल पाती हैं।

कवच इस पूरी कड़ी में एक परत और जोड़ता है। पटरी पर जगह-जगह आरएफ़आईडी टैग लगे होते हैं, जिनसे इंजन को अपनी सटीक जगह का पता चलता रहता है। स्टेशन पर लगी इकाई इंटरलॉकिंग से लगातार जानकारी लेती है: कौन-सा सिग्नल किस हालत में है, काँटे किस तरफ़ मुड़े हैं, कौन-सा खंड ख़ाली है और कौन-सा रास्ता किसके लिए तय है। इसी से वह तय करती है कि रेलगाड़ी सुरक्षित रूप से कितनी दूर तक जा सकती है, और यह संख्या रेडियो से इंजन तक भेजती है।

कवच की रिमोट इंटरफ़ेस इकाई, पटरी किनारे लगने वाला बक्सा जो टैग और स्टेशन की इंटरलॉकिंग के बीच की कड़ी है, रेल मंत्रालय की 2021 में जारी तस्वीर
तस्वीर: Ministry of Railways (India), विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

इंजन में लगी इकाई अब दो काम एक साथ करती है। वह केबिन के भीतर लगे परदे पर यह दूरी, जायज़ रफ़्तार और सिग्नल की हालत दिखाती है। और वह रफ़्तार पर नज़र रखती है। ख़तरे का संकेत क़रीब आए, या रफ़्तार तय हद से ऊपर जाए, या रास्ता आपस में टकराता हो, तो वह ख़ुद ब्रेक लगा देती है।

19 सितंबर की विज्ञप्ति में मंत्रालय ने इसे इन शब्दों में लिखा: "'कवच' स्वदेशी रूप से विकसित एक स्वचालित रेल सुरक्षा (एटीपी) प्रणाली है, जिसे परिचालन सुरक्षा बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।" फ़रवरी वाले पृष्ठभूमि दस्तावेज़ में गिनाई गई ख़ूबियों में कुछ और भी हैं: समपार फाटक क़रीब आने पर हॉर्न अपने आप बजना, ढलान पर रेलगाड़ी के अपने आप पीछे या आगे सरकने से रोकना, दो रेलगाड़ियाँ आमने-सामने आ जाएँ तो दोनों को रुकने का संदेश भेजना, और रेलगाड़ी की लंबाई ख़ुद नापना। प्रमाणन का दर्जा एसआईएल-4 है, जो रेल सिग्नलिंग में सबसे ऊपर का है।

16 जुलाई 2024 को मंज़ूर हुआ चौथा संस्करण

कवच पर काम पुराना है। यात्री रेलगाड़ियों पर पहले मैदानी परीक्षण फ़रवरी 2016 में शुरू हुए। 2018-19 में तीन कंपनियों को संस्करण 3.2 की आपूर्ति के लिए मंज़ूरी मिली। जुलाई 2020 में इसे देश की राष्ट्रीय स्वचालित रेल सुरक्षा प्रणाली मान लिया गया।

असली तजुर्बा दक्षिण मध्य रेलवे से आया, जहाँ संस्करण 3.2 को 1,465 रूट किलोमीटर पर लगाया गया। वह एक ज़ोन था। रेल मंत्री ने 19 मार्च 2025 को लोकसभा में लिखित उत्तर में बताया कि इसी तैनाती से मिले अनुभव पर सुधार किए गए, और कवच का संस्करण 4.0 आरडीएसओ ने 16 जुलाई 2024 को मंज़ूर किया। उसी उत्तर में चार बड़े सुधार गिनाए गए हैं: जगह बताने की बेहतर सटीकता, बड़े यार्डों में सिग्नल की हालत की बेहतर जानकारी, ऑप्टिकल फ़ाइबर के रास्ते एक स्टेशन के कवच का दूसरे स्टेशन के कवच से जुड़ना, और मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग से सीधा जुड़ाव।

इनमें से आख़िरी दो सीधे उस बात से जुड़े हैं जिस पर पैसा ख़र्च होता है। एक स्टेशन का कवच दूसरे से तभी जुड़ेगा जब बीच में फ़ाइबर पड़ा हो। और इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग से सीधा जुड़ाव तभी होगा जब स्टेशन पर पुरानी रिले इंटरलॉकिंग की जगह इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग लग चुकी हो। यानी कवच अकेली चीज़ नहीं है। वह एक कड़ी है जिसके पहले दो और कड़ियाँ चाहिए।

लखनऊ और मुरादाबाद, दोनों मंज़ूरियाँ मंडल के "शेष" हिस्सों के लिए हैं। यह शब्द दोनों विज्ञप्तियों में है। इसकी वजह रेलवे बोर्ड की तय प्राथमिकताओं में दिखती है, जो 6 फ़रवरी के दस्तावेज़ में छपी हैं। सबसे पहले उच्च घनत्व वाले मार्ग, जैसे नई दिल्ली-मुंबई और नई दिल्ली-हावड़ा, जहाँ रेलगाड़ियाँ एक-दूसरे के ज़्यादा क़रीब चलती हैं। फिर ऑटोमैटिक ब्लॉक सिग्नलिंग और केंद्रीकृत यातायात नियंत्रण वाले अधिक उपयोग के मार्ग। फिर बाक़ी व्यस्त यात्री मार्ग। और सबसे आख़िर में बचा हुआ पूरा नेटवर्क। उसी दस्तावेज़ के मुताबिक़ रेलवे का लगभग 96 फ़ीसदी यातायात पहली दो श्रेणियों पर चलता है। "शेष हिस्सा" इसी क्रम का नीचे का सिरा है।

41.47 लाख और 23.88 लाख: एक किलोमीटर के दो भाव

19 सितंबर की विज्ञप्ति कहती है: उत्तर-पूर्व रेलवे के लखनऊ मंडल के 607.7 रूट किलोमीटर, कुल लागत 252 करोड़ रुपये। 1 सितंबर की विज्ञप्ति कहती है: उत्तरी रेलवे के मुरादाबाद मंडल के शेष 712 रूट किलोमीटर, कुल लागत 170 करोड़ रुपये।

भाग दीजिए। 252 करोड़ बँटे 607.7 से 41.47 लाख रुपये प्रति किलोमीटर होता है। 170 करोड़ बँटे 712 से 23.88 लाख प्रति किलोमीटर। पहला दूसरे से 73.7 फ़ीसदी ऊपर है।

यह अकेला जोड़ा नहीं है। इसी साल की और मंज़ूरियाँ खोलिए तो तस्वीर बदल जाती है।

मंडल या ज़ोनविज्ञप्ति की तारीख़रूट किलोमीटरमंज़ूर रक़म (करोड़ ₹)प्रति किलोमीटर (लाख ₹)
अहमदाबाद, पश्चिम रेलवे (48 ब्लॉक सेक्शन)15 जून 202659814023.41
मुरादाबाद, उत्तरी रेलवे (शेष हिस्सा)1 सितंबर 202671217023.88
अंबाला, उत्तरी रेलवे (शेष ब्रॉड गेज)15 जून 202681120124.78
लखनऊ, उत्तर-पूर्व रेलवे (शेष हिस्सा)19 सितंबर 2026607.725241.47
पूर्व तट रेलवे (छह खंड)22 जून 202663127042.79
शोरनूर-मंगलुरु, दक्षिण रेलवे (नई 4×48 फ़ाइबर लाइन सहित)25 मार्च 2026308151.4449.17
जोलारपेट्टई-इरोड और चेन्नई बीच-चेंगलपट्टु, दक्षिण रेलवे (नई फ़ाइबर लाइन सहित)25 मार्च 2026240158.7466.14

तालिका में दो गुच्छे साफ़ दिखते हैं। नीचे वाला 23 से 25 लाख के बीच है और उसमें तीन मंडल हैं। ऊपर वाला 41 से 43 लाख के बीच है और उसमें दो हैं। यानी लखनऊ अकेला नहीं है, और मुरादाबाद भी अकेला नहीं है।

अब वह बात जो इन विज्ञप्तियों के अपने शब्दों से निकलती है। अंबाला, अहमदाबाद और पूर्व तट रेलवे, तीनों की विज्ञप्तियाँ बताती हैं कि काम किस छाते के नीचे मंज़ूर हुआ, और तीनों एक ही छाते का नाम लेती हैं: भारतीय रेल के शेष मार्गों पर एलटीई संचार रीढ़ के साथ कवच लगाने का छाता कार्य। उसी छाते के भीतर एक आँकड़ा 23.41 लाख है और दूसरा 42.79 लाख। जिन तीन विज्ञप्तियों ने छाते का नाम लिया है, उनमें अलग-अलग कार्यक्रम वाली वजह नहीं बचती।

सबसे महँगी दो मंज़ूरियाँ दक्षिण रेलवे की हैं, 49.17 लाख और 66.14 लाख प्रति किलोमीटर। दोनों 25 मार्च की हैं। यही दो ऐसी हैं जिनकी विज्ञप्ति में साफ़ लिखा है कि मंज़ूरी में नई ऑप्टिकल फ़ाइबर लाइन भी शामिल है। एक में "नई ऑप्टिकल फ़ाइबर केबलिंग सहित" है और दूसरी में "नई 4×48 फ़ाइबर ओएफ़सी केबलिंग सहित"। जिन दो विज्ञप्तियों में काम का दायरा थोड़ा ज़्यादा खुलकर लिखा है, वही दोनों सबसे ऊपर बैठती हैं।

यह एक इशारा भर है। लखनऊ और मुरादाबाद की विज्ञप्तियाँ यह नहीं बतातीं कि उनकी मंज़ूरी में फ़ाइबर है या नहीं। वे यह भी नहीं बतातीं कि कितने स्टेशन हैं, कितने ब्लॉक सेक्शन हैं, कितने टावर लगने हैं, लाइन इकहरी है या दोहरी, और इंजन इसी रक़म में शामिल हैं या नहीं। इसलिए 73.7 फ़ीसदी का फ़ासला इन दो दस्तावेज़ों से समझाया नहीं जा सकता।

वह फ़ासला दर्ज है और बेसबब नहीं होगा, पर उसका सबब इन काग़ज़ों में नहीं लिखा।

एक और बात। मंत्रालय के पास इसे लिखने का तरीक़ा मौजूद है। अहमदाबाद की 15 जून की विज्ञप्ति में साफ़ लिखा है कि 598 रूट किलोमीटर में 48 ब्लॉक सेक्शन शामिल हैं, और यह भी कि इसी मंडल के लगभग 702 रूट किलोमीटर पर कवच पहले मंज़ूर हो चुका था। पूर्व तट रेलवे की विज्ञप्ति छहों खंडों के नाम गिनाती है। अंबाला की विज्ञप्ति पाँच मार्ग गिनाती है और तीन राज्यों का नाम लेती है। लखनऊ की विज्ञप्ति में इनमें से कुछ नहीं है।

लखनऊ वाली मंज़ूरी में "शेष" शब्द एक और सवाल खड़ा करता है। शेष किसका? इस मंडल के लिए इससे पहले कितने रूट किलोमीटर पर कवच मंज़ूर हुआ था, यह किसी ऐसे दस्तावेज़ में नहीं मिला जो आज पढ़ा जा सका। अहमदाबाद की विज्ञप्ति ने अपना पिछला आँकड़ा ख़ुद छापा था। लखनऊ की नहीं छापती, इसलिए 607.7 किलोमीटर किस कुल का बचा हुआ हिस्सा है, यह इस मंज़ूरी से तय नहीं होता।

दोनों विज्ञप्तियाँ एक और जगह अलग हैं, और वह जगह कवच की परिभाषा है। मुरादाबाद वाली विज्ञप्ति में प्रणाली के बारे में यह भी लिखा है कि वह "गंभीर परिस्थितियों में ट्रेन की गति को नियंत्रित करता है", और टक्कर का ख़तरा घटाता है। लखनऊ वाली विज्ञप्ति में ये दोनों बातें नहीं हैं। अंग्रेज़ी पाठ में भी यही फ़र्क़ है, इसलिए यह अनुवाद की चूक नहीं है। दोनों परिभाषाएँ प्रणाली की हैं। मंज़ूर हुए काम की परिभाषा किसी में नहीं है।

आख़िर में एक जोड़ जो अकेली तुलना से ज़्यादा बताता है। इस साल की पाँच ट्रैकसाइड मंज़ूरियाँ, यानी अहमदाबाद, अंबाला, पूर्व तट, मुरादाबाद और लखनऊ, मिलकर 3,359.7 रूट किलोमीटर पर 1,033 करोड़ रुपये बनती हैं। औसत निकालिए तो 30.75 लाख रुपये प्रति किलोमीटर। नीचे वाला गुच्छा इस औसत से लगभग एक-चौथाई नीचे है और ऊपर वाला लगभग एक-तिहाई ऊपर।

एक कवच किलोमीटर में स्टेशन, टैग, टावर और लोको

कवच लगाने में क्या-क्या करना पड़ता है, यह मंत्रालय ने ख़ुद लोकसभा में दो बार गिनाया है, 19 मार्च 2025 को और फिर 5 अगस्त 2026 को। सूची दोनों बार वही है। हर स्टेशन और हर ब्लॉक सेक्शन पर स्टेशन कवच लगाना। पटरी की पूरी लंबाई में आरएफ़आईडी टैग लगाना। पूरे खंड में दूरसंचार टावर खड़े करना। पटरी के साथ ऑप्टिकल फ़ाइबर बिछाना। और भारतीय रेल पर चलने वाले हर इंजन में लोको कवच लगाना।

इस सूची में तीन चीज़ें ऐसी हैं जिनका हिसाब रूट किलोमीटर से नहीं चलता। टैग पटरी पर लगते हैं, मार्ग पर नहीं, इसलिए दोहरी लाइन पर एक रूट किलोमीटर में दो बार ख़र्च होता है। स्टेशन कवच का हिसाब स्टेशनों की गिनती से चलता है, इसलिए जिस खंड में स्टेशन पास-पास हैं वह महँगा पड़ेगा। और लोको कवच का हिसाब इंजनों से चलता है।

19 मार्च 2025 के उसी लोकसभा उत्तर में मंत्रालय ने अपना आँकड़ा भी दिया है। स्टेशन उपकरण मिलाकर ट्रैकसाइड कवच पर लगभग 50 लाख रुपये प्रति किलोमीटर, और इंजन पर लगभग 80 लाख रुपये प्रति इंजन। तालिका की सात में से छह मंज़ूरियाँ इस 50 लाख से नीचे हैं। सातवीं, दक्षिण रेलवे वाली 66.14 लाख, अकेली ऊपर है। और नीचे वाला गुच्छा मंत्रालय के अपने आँकड़े के आधे से भी नीचे बैठता है।

इंजन वाला हिस्सा अलग से मंज़ूर होता है, और इसका सीधा सबूत है। 6 अप्रैल 2026 की विज्ञप्ति में दक्षिण रेलवे के 232 इंजनों पर कवच 4.0 लगाने के लिए अलग से 208.81 करोड़ रुपये मंज़ूर हुए। भाग दीजिए तो 90 लाख रुपये प्रति इंजन। यह मंत्रालय के अपने बताए 80 लाख के आँकड़े से ऊपर है, पर वह आँकड़ा तेरह महीने पुराना था।

लखनऊ मंडल में क्या-क्या है, इसका एक अंदाज़ मंडल के अपने परिचय दस्तावेज़ से मिलता है, जिसके आँकड़े जुलाई 2021 तक के हैं। मंडल उत्तर प्रदेश के 14 ज़िलों में फैला है, गोरखपुर और बस्ती से लेकर बहराइच, सीतापुर, लखीमपुर और लखनऊ तक। उसमें 158 स्टेशन दर्ज हैं और 437 मानवयुक्त समपार फाटक। ब्रॉड गेज पर मार्ग की लंबाई 921.99 किलोमीटर है और पटरी की लंबाई 1,166.99 किलोमीटर। दोनों का अनुपात 1.27 है, यानी 2021 में इस मंडल का ज़्यादातर ब्रॉड गेज इकहरी लाइन था। पाँच साल में दोहरीकरण हुआ है, इसलिए यह आँकड़ा आज का नहीं है। पर जिस दिशा में यह इशारा करता है, वह महँगाई की दिशा नहीं है।

उत्तर-पूर्व रेलवे के गोरखपुर जंक्शन का मुख्य द्वार, मई 2023 की तस्वीर, लखनऊ मंडल के जिन 14 ज़िलों का ज़िक्र ऊपर है उनमें गोरखपुर पहला नाम है
तस्वीर: SM7, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

यहाँ एक बात साफ़ कर देनी चाहिए, क्योंकि उलझने की पूरी गुंजाइश है। लखनऊ नाम के दो रेल मंडल हैं। एक उत्तर-पूर्व रेलवे का, जिसकी 19 सितंबर की मंज़ूरी है। दूसरा उत्तरी रेलवे का। 6 अप्रैल 2026 को जिस "लखनऊ मंडल" के 1,074 रूट किलोमीटर पर 119.63 करोड़ रुपये की फ़ाइबर लाइन मंज़ूर हुई, वह उत्तरी रेलवे के छाते के नीचे है, यानी दूसरा वाला।

2,633 चालू, 21,794 पर काम, 27,693 करोड़ का छाता

मंज़ूरी काग़ज़ है। चालू व्यवस्था अलग चीज़ है। इन दोनों के बीच की दूरी मंत्रालय के अपने आँकड़ों में नापी जा सकती है।

रेल मंत्री ने 5 अगस्त 2026 को लोकसभा में बताया कि 31 जुलाई 2026 तक कवच 4.0 कुल 2,633 रूट किलोमीटर पर चालू था। उसी उत्तर में खंडवार तालिका है: दिल्ली-मुंबई मार्ग पर 1,423 और दिल्ली-हावड़ा मार्ग पर 1,210 रूट किलोमीटर। ये वही दो गलियारे हैं जो बोर्ड की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर हैं। उसी उत्तर में यह भी दर्ज है कि ट्रैकसाइड कवच का काम 21,794 रूट किलोमीटर पर हाथ में लिया जा चुका है।

बीच के पड़ाव भी उसी उत्तर में हैं। ऑप्टिकल फ़ाइबर 11,547 किलोमीटर बिछ चुका है। 1,721 दूरसंचार टावर खड़े हैं। 1,009 स्टेशनों पर डेटा सेंटर बन चुके हैं। ट्रैकसाइड उपकरण 7,726 रूट किलोमीटर पर लग चुके हैं। और 6,290 इंजनों में कवच लग चुका है, जबकि 7,190 और इंजनों तथा 1,200 ईएमयू और मेमू पर काम हाथ में है। पैमाना समझने के लिए एक और आँकड़ा। 22 जुलाई 2026 की विज्ञप्ति में विद्युतीकरण की तालिका है: 2014 से पहले 21,801 रूट किलोमीटर और 2014 से 2026 के बीच 48,072। जोड़ 69,873 बनता है, और उसी विज्ञप्ति के मुताबिक़ यह ब्रॉड गेज नेटवर्क का लगभग 99.6 फ़ीसदी है।

पैसे का हिसाब भी उसी 5 अगस्त के उत्तर में है। कवच पर जून 2026 तक कुल 3,875 करोड़ रुपये ख़र्च हुए। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 2,066 करोड़ रुपये आवंटित हैं। जिस छाता कार्य के नीचे ये मंज़ूरियाँ खुलती हैं, उसकी कुल लागत 6 अप्रैल 2026 की विज्ञप्ति में 27,693 करोड़ रुपये लिखी है। मंत्रालय ने साथ में यह भी लिखा है कि काम की प्रगति के हिसाब से ज़रूरी धन उपलब्ध कराया जाता है, इसलिए एक साल के आवंटन को सीधे बाक़ी रक़म पर चढ़ाना सही नहीं होगा। फिर भी तीन संख्याएँ एक साथ पढ़ने लायक़ हैं: 27,693 का छाता, 3,875 का अब तक का ख़र्च, और 2,066 का इस साल का आवंटन।

यह फ़ासला सिर्फ़ कवच का नहीं है। 10 सितंबर के अंक में हमने रेल मंत्री के लोकसभा उत्तरों से दर्ज किया था कि 1 अप्रैल 2025 तक मंज़ूर 35,966 किलोमीटर में से 12,769 किलोमीटर ही चालू हुए थे। और 4 सितंबर के अंक में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की वह रिपोर्ट, जिसमें सुरक्षा से जुड़े 20,304 काम अधूरे दर्ज हैं।

तो लखनऊ मंडल के किसी यात्री के लिए 19 सितंबर की मंज़ूरी का मतलब क्या है। दोनों में से किसी विज्ञप्ति में पूरा होने की तारीख़ नहीं है। मंत्रालय ने 26 मार्च 2026 को कहा था कि अगले दो साल में कवच का दायरा 9,000 रूट किलोमीटर बढ़ाने की योजना है, और उसके बाद हर साल 10,000 तक। उस रफ़्तार पर भी 21,794 रूट किलोमीटर का बकाया कई बरस का है, और उसमें लखनऊ मंडल की बारी कब आएगी, यह किसी काग़ज़ में नहीं लिखा। जो लिखा है वह क्रम है, तारीख़ नहीं।

सोलापुर के सात स्टेशन और गुंटूर की 2×25 केवी लाइन

उसी दोपहर की दूसरी बड़ी रक़म इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग की है। मध्य रेलवे के सोलापुर मंडल के सात स्टेशनों पर 209 करोड़ रुपये। नाम विज्ञप्ति में हैं: मोहोल, मुंधेवाड़ी, बाले, सोलापुर, होटगी जंक्शन-होटगी ए केबिन, शाहबाद और वाडी जंक्शन।

इंटरलॉकिंग स्टेशन का वह तंत्र है जो काँटों और सिग्नलों को आपस में बाँधे रखता है, ताकि एक साथ दो टकराते रास्ते न खुल सकें। पुराना तरीक़ा रिले का था, यानी बिजली से चलने वाले सैकड़ों स्विच एक कमरे में जुड़े रहते थे। तर्क तारों से बनता था। विज्ञप्ति कहती है कि इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग एक कंप्यूटर आधारित प्रणाली है जो इसकी जगह लेती है, काँटों और सिग्नलों पर ज़्यादा भरोसेमंद नियंत्रण देती है, गड़बड़ी जल्दी पकड़ती है और रखरखाव आसान करती है।

इस काम का सीधा रिश्ता कवच से है, और विज्ञप्ति ने वह रिश्ता ख़ुद जोड़ा है। ये सातों स्टेशन उच्च घनत्व नेटवर्क के मार्ग 7 पर हैं, जहाँ कवच, ऑटोमैटिक ब्लॉक सिग्नलिंग और केंद्रीकृत यातायात नियंत्रण भी मंज़ूर हो चुके हैं। संस्करण 4.0 की एक ख़ूबी ही इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग से सीधा जुड़ना है। रिले वाले स्टेशन पर वह जुड़ाव बनता नहीं।

दिन की तीसरी मंज़ूरी बिजली की है। सवलियापुरम-गुंटूर खंड पर कर्षण प्रणाली 1×25 केवी से 2×25 केवी की जाएगी, 142 करोड़ रुपये में। खंड 73 रूट किलोमीटर का है और काम 146 ट्रैक किलोमीटर पर होगा, यानी हर रूट किलोमीटर पर दो ट्रैक किलोमीटर। यह वास्को-गडग-गुंटकल-नंद्याल-सवलियापुरम-गुंटूर-विजयवाड़ा वाले अधिक उपयोग नेटवर्क मार्ग 8 का हिस्सा है।

62 प्रतिशत का विषम कोण और 16,499 फाटक

दिन की सबसे बारीक विज्ञप्ति सबसे पहले आई थी। पश्चिम रेलवे के उधना-उकाई सोंगाध खंड पर किलोमीटर 62/2-4 पर समपार फाटक संख्या 53 है। उसकी जगह चार लेन का रोड ओवर ब्रिज बनेगा।

तेलंगाना के करीमनगर ज़िले में एक मानवयुक्त समपार फाटक, बंद फाटक और इंतज़ार करते वाहन, सितंबर 2014 की तस्वीर, यह गुजरात वाला फाटक संख्या 53 नहीं बल्कि देश भर के 16,499 मानवयुक्त फाटकों में से एक है
तस्वीर: Nikhilb239, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

इस एक पुल का हिसाब विज्ञप्ति ने पैसे-पैसे में खोला है। कुल लागत 133.2295 करोड़ रुपये। रेलवे के ऊपर से गुज़रने वाले हिस्से में ओपन वेब गर्डर लगेगा, अनुमानित लागत 91.60 करोड़। वायडक्ट 311.58 मीटर लंबा होगा, 19.98 करोड़ का। पहुँच मार्ग 524.32 मीटर का होगा, 10.25 करोड़ का। और लागत राज्य सरकार के साथ बँटेगी: रेलवे का हिस्सा 66.6147 करोड़ और राज्य सरकार का 66.6148 करोड़। राज्य पर एक हज़ार रुपये ज़्यादा, ताकि आधा-आधा का जोड़ पूरा बैठे।

बीच में एक वाक्य है जो इंजीनियरी की दिक़्क़त बताता है। विज्ञप्ति के अपने शब्दों में, चौराहे के स्थान पर "62 प्रतिशत का विषम कोण" है, जो डिज़ाइन और निर्माण की कठिनाई बढ़ा देता है। सड़क और पटरी समकोण पर नहीं मिलतीं, तिरछी मिलती हैं। तिरछे पुल के गर्डर लंबे होते हैं और उनका बोझ असमान बँटता है।

विज्ञप्ति राज्य का नाम नहीं लेती, सिर्फ़ "राज्य सरकार" लिखती है। उधना सूरत ज़िले में है और उकाई सोंगाध तापी ज़िले में, दोनों गुजरात में। द इंडियन एक्सप्रेस ने 19 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में इस मंज़ूरी को गुजरात के खाते में रखा है। मंत्रालय के काग़ज़ पर वह नाम नहीं है।

एक फाटक हटाने पर 133 करोड़ रुपये क्यों, इसका जवाब पैमाने में है। 11 फ़रवरी 2026 की एक विज्ञप्ति में मंत्रालय ने लोकसभा को बताया कि 1 अप्रैल 2025 तक भारतीय रेल पर 16,499 मानवयुक्त समपार फाटक थे। ब्रॉड गेज के सारे मानवरहित फाटक 31 जनवरी 2019 तक हटा दिए गए थे। 1 जनवरी 2026 तक 4,769 आरओबी और आरयूबी मंज़ूर थे, कुल 1,14,298 करोड़ रुपये के। यह मंज़ूरी है, निर्माण नहीं। 2004 से 2014 के बीच 4,148 ऐसे पुल बने थे; 2014 से दिसंबर 2025 तक 13,882।

भाग दीजिए तो मंज़ूर 4,769 पुलों पर औसत लागत लगभग 24 करोड़ रुपये प्रति पुल बैठती है। उधना वाला पुल उससे पाँच गुना से ज़्यादा महँगा है। वह चार लेन का है, तिरछा है, और उसका आधा ख़र्च राज्य उठा रहा है। इस विज्ञप्ति ने अपने आँकड़े खोले हैं, इसलिए यह अंतर समझा जा सकता है। कवच वाली विज्ञप्ति ने नहीं खोले, इसलिए वहाँ का अंतर नहीं समझा जा सकता।

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, शाम 4:16 (हिंदी): उत्तर-पूर्व रेलवे के लखनऊ मंडल के 607.7 रूट किलोमीटर पर कवच 4.0 के लिए 252 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, शाम 4:16 (अंग्रेज़ी): उसी मंज़ूरी का अंग्रेज़ी पाठ, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, शाम 4:15: मध्य रेलवे के सोलापुर मंडल के सात स्टेशनों पर इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग, 209 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, दोपहर 3:25: सवलियापुरम-गुंटूर खंड पर 2×25 केवी कर्षण उन्नयन, 142 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, दोपहर 3:23: उधना-उकाई सोंगाध खंड पर समपार फाटक 53 की जगह चार लेन का रोड ओवर ब्रिज, 133.2295 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 1 सितंबर 2026, सुबह 11:03: उत्तरी रेलवे के मुरादाबाद मंडल के शेष 712 रूट किलोमीटर पर कवच 4.0 के लिए 170 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 1 सितंबर 2026 (अंग्रेज़ी): मुरादाबाद मंडल की उसी मंज़ूरी का अंग्रेज़ी पाठ, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 15 जून 2026, दोपहर 2:27: उत्तरी रेलवे के अंबाला मंडल के 811 रूट किलोमीटर पर कवच, 201 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 15 जून 2026, दोपहर 2:25: पश्चिम रेलवे के अहमदाबाद मंडल के 598 रूट किलोमीटर और 48 ब्लॉक सेक्शन पर कवच 4.0, 140 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 22 जून 2026, दोपहर 3:03: पूर्व तट रेलवे के छह खंडों के 631 रूट किलोमीटर पर कवच, 270 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 25 मार्च 2026, रात 8:35: दक्षिण रेलवे के दो खंडों पर कवच 4.0 और नई ऑप्टिकल फ़ाइबर लाइन, 310.18 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 6 अप्रैल 2026, शाम 5:47: 1,364.45 करोड़ की मंज़ूरियाँ, और एलटीई छाता कार्य 2024-25 की कुल लागत 27,693 करोड़ रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 26 मार्च 2026, शाम 6:13: रेल मंत्री की कवच प्रगति समीक्षा, 3,103 रूट किलोमीटर पर स्थापना और 24,427 पर काम, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 5 अगस्त 2026, दोपहर 3:25: रेल मंत्री का लोकसभा उत्तर, 31 जुलाई 2026 तक कवच 4.0 पर 2,633 रूट किलोमीटर और खंडवार तालिका, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 19 मार्च 2025, शाम 4:47: रेल मंत्री का लोकसभा उत्तर, कवच 4.0 की आरडीएसओ मंज़ूरी 16 जुलाई 2024 और ट्रैकसाइड लागत लगभग 50 लाख रुपये प्रति किलोमीटर, पत्र सूचना कार्यालय का पृष्ठभूमि दस्तावेज़, 6 फ़रवरी 2026: कवच की कार्यप्रणाली, सुरक्षा विशेषताएँ, रेलवे बोर्ड की चार प्राथमिकताएँ और दुर्घटना आँकड़े, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 11 फ़रवरी 2026, शाम 4:14: 1 अप्रैल 2025 तक 16,499 मानवयुक्त समपार, और 1 जनवरी 2026 तक 4,769 आरओबी/आरयूबी की मंज़ूरी, पत्र सूचना कार्यालय, रेल मंत्रालय, 22 जुलाई 2026, दोपहर 1:01: ब्रॉड गेज नेटवर्क का लगभग 99.6 फ़ीसदी विद्युतीकृत; 2014 से पहले 21,801 और 2014-26 में 48,072 रूट किलोमीटर, उत्तर-पूर्व रेलवे, लखनऊ मंडल का अपना परिचय दस्तावेज़ (आँकड़े जुलाई 2021 तक): 14 ज़िले, 158 स्टेशन, 921.99 ब्रॉड गेज रूट किलोमीटर और 437 मानवयुक्त फाटक, द इंडियन एक्सप्रेस, 19 सितंबर 2026, शाम 5:01 (अनीश मंडल): चार राज्यों में 736 करोड़ रुपये की मंज़ूरियाँ

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