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तेलंगाना विधानसभा ने बीआरएस के 22 विधायक निलंबित किए, सूची में एक नाम उस सदस्य का भी जो सदन में मौजूद नहीं था

9 सितंबर को विधायी कार्य मंत्री डी. श्रीधर बाबू का प्रस्ताव पारित होते ही मुख्य विपक्षी दल की पूरी उपस्थित बेंच सत्र के बाक़ी हिस्से के लिए बाहर हो गई। सत्र 11 सितंबर को ख़त्म हो रहा है, यानी निलंबन तीन बैठकों का है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में महाराष्ट्र के 12 विधायकों के मामले में तय किया था कि सत्र से आगे का निलंबन अवैध है, और सत्र तक का निलंबन सदन के अधिकार में आता है।

हैदराबाद में तेलंगाना विधानसभा के गेट पर लगे लोहे के बैरिकेड और उनके ऊपर लिपटा कँटीला तार, पीछे विधानसभा का नाम-पट्ट; यह तस्वीर मई 2023 की है
तस्वीर: Wasiul Bahar, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

करीमनगर के विधायक गंगुला कमलाकर 9 सितंबर को तेलंगाना विधानसभा में नहीं थे। निलंबित होने वालों की सूची में उनका नाम फिर भी पढ़ा गया।

सूची में कुल 22 नाम थे। तेलंगाना टुडे के मुताबिक़ कमलाकर के साथ पार्टी के 21 और विधायक निलंबित हुए, और आईएएनएस ने उसी कार्यवाही को इन शब्दों में दर्ज किया कि सदन में मौजूद सभी 21 बीआरएस सदस्य निलंबित कर दिए गए। दोनों ब्योरे एक ही तस्वीर के दो सिरे हैं: कमरे में जितने विपक्षी सदस्य थे, उतने ही बाहर कर दिए गए, और एक नाम कमरे के बाहर से जोड़ा गया।

निलंबन मानसून सत्र के बाक़ी हिस्से के लिए है। सत्र 11 सितंबर को ख़त्म हो रहा है।

बचती हैं तीन बैठकें।

सूची का बाइसवाँ नाम

अनुपस्थित सदस्य को निलंबित करने पर आपत्ति सत्ता पक्ष के विरोधी खेमे से भी आई। तेलंगाना टुडे के अनुसार भाजपा के सदन नेता अलेटी महेश्वर रेड्डी ने पूछा कि किस नियम के तहत ग़ैरहाज़िर सदस्यों को निलंबित किया जा सकता है, और यह भी कि क्या कोई नई नियमावली चलन में आ गई है। रिपोर्ट में कमलाकर की अनुपस्थिति का कारण दर्ज नहीं है। यही एक ब्योरा उस दिन की सबसे जाँची जा सकने वाली बात है, क्योंकि निलंबन का आधार सदन में व्यवधान बताया गया, और जिस पर व्यवधान का आधार लागू हुआ वह सदन में था ही नहीं।

जो प्रस्ताव लाया गया और जिस नियम के तहत लाया गया

बीआरएस की तरफ़ से जो सूचना दी गई थी, वह स्थगन प्रस्ताव की थी। पीटीआई और द न्यूज़मिल दोनों ने उसे तेलंगाना विधानसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली के नियम 63 के तहत दर्ज बताया है, और उस पर के.टी. रामाराव, टी. हरीश राव, जी. जगदीश रेड्डी, पी. सबिता इंद्रा रेड्डी, के.पी. विवेकानंद और विजयुडु के दस्तख़त बताए हैं। निलंबन उस सूचना पर नहीं हुआ। न्यूज़मीटर के मुताबिक़ सदन ने विधायी कार्य मंत्री डुड्डिल्ला श्रीधर बाबू का प्रस्ताव पारित किया। किसी भी रिपोर्ट में उस प्रस्ताव के नीचे लिखा नियम नंबर नहीं मिला।

भाजपा ने पूछा: किस नियम से

निलंबन के अगले दिन सदन में यही सवाल दोबारा उठा। महेश्वर रेड्डी ने कहा कि सरकार ने तीन दिन बीआरएस विधायकों के निलंबन पर चर्चा में लगा दिए और सूचीबद्ध मुद्दे नहीं उठाए। उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्का का जवाब तेलंगाना टुडे ने इस तरह दर्ज किया कि बीआरएस द्वारा दलितों के अपमान से बड़ा मुद्दा क्या हो सकता है, और यह जनता का ही मुद्दा है। दो पक्षों की यह भिड़ंत उस सदन में हुई जिसमें मुख्य विपक्षी दल का एक भी सदस्य नहीं था।

महिला विधायकों के साथ धक्का-मुक्की का वह आरोप

सत्र 7 सितंबर को शुरू हुआ था। सियासत डेली के मुताबिक़ उसी दिन विधानसभा परिसर के बाहर बीआरएस की महिला विधायकों ने पुलिस पर कथित तौर पर गला पकड़ने और बाल खींचने का आरोप लगाया, और कहा कि वी. सुनीता लक्ष्मा रेड्डी की साड़ी फाड़ी गई। सुनीता लक्ष्मा रेड्डी को मामूली चोटें आईं और पैरों तले कुचले जाने की बात उन्होंने भावुक होकर बताई। प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पी. सबिता इंद्रा रेड्डी ने कहा कि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक सभ्य समाज में पूरी महिला बिरादरी का अपमान है। पुलिस ने विधायकों को परिसर में जाने से रोका था, क्योंकि वे राजनीतिक नारे लिखी काली टी-शर्ट पहने हुए थे।

उसी सुबह का दूसरा काग़ज़

आरोप का दूसरा सिरा भी दर्ज है। सियासत डेली के अनुसार कांग्रेस की विधायक नलमादा पद्मावती रेड्डी, रागमयी, यशस्विनी रेड्डी और पर्णिका रेड्डी ने महिला कांग्रेस अध्यक्ष एर्राबेल्ली स्वर्णा के साथ 8 सितंबर को तेलंगाना राज्य महिला आयोग में शिकायत दी। उनका कहना था कि बीआरएस नेताओं ने कथित तौर पर क़मीज़ उतारकर महिला अधिकारियों के सामने आकर उन्हें डराया। इसी सिलसिले में महिला कांस्टेबल के. पद्मावती की शिकायत पर सैफ़ाबाद थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 121(1), 132, 74, 79, 351, 352 और 353 सहपठित 3(5) के तहत मामला दर्ज हुआ। आरोपी होना दोष सिद्ध होना नहीं है, और दोनों तरफ़ की जाँच अभी चल रही है।

उसी दिन हाई कोर्ट ने पुलिस से क्या कहा

निलंबन वाले दिन ही तेलंगाना हाई कोर्ट में यह मामला पहुँचा। द न्यूज़ मिनट के मुताबिक़ बीआरएस विधायक तलसानी श्रीनिवास यादव की लंच मोशन याचिका पर न्यायमूर्ति टी. माधवी देवी ने कहा कि नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई पुलिस का नहीं, अध्यक्ष का काम है। अदालत ने पुलिस को विधायकों को विधानसभा में जाने से रोकने से मना किया, पुलिस महानिदेशक से ज़िम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर सख़्त कार्रवाई करने को कहा, और 21 सितंबर की सुनवाई पर रिपोर्ट माँगी। अदालत के शब्द रिपोर्ट में इस तरह हैं कि पुलिस इतनी अतिउत्साही होकर इस तरह पेश नहीं आ सकती।

परिषद में दो सदस्य एक दिन पहले ही निलंबित हो चुके थे

विधानसभा से पहले विधान परिषद में यही हो चुका था। 8 सितंबर को बीआरएस के दो सदस्य टाटा मधुसूदन और एन. नवीन कुमार रेड्डी सत्र के बाक़ी हिस्से के लिए निलंबित हुए। प्रस्ताव विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री दामोदर राजनरसिम्हा और परिषद में श्रीधर बाबू ने रखा। प्रस्ताव के शब्द तेलंगाना टुडे ने उद्धृत किए हैं: यह सदन गेट नंबर 3 के पास अध्यक्ष के विरुद्ध कही गई घोर अपमानजनक और असंसदीय बातों की कड़ी निंदा और गहरी अस्वीकृति दर्ज करता है। परिषद के सभापति जी. सुखेंदर रेड्डी ने निलंबन की घोषणा की।

अध्यक्ष का यह अधिकार कहाँ से आता है

अनुच्छेद 208(1) राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन को अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है, संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए। अनुच्छेद 194 सदन, उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियों तथा विशेषाधिकारों की बात करता है। महाराष्ट्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों रास्तों को अलग-अलग रखा था: एक रास्ता नियमावली में लिखा अध्यक्ष का अधिकार है, दूसरा सदन की अपनी अंतर्निहित शक्ति, जिसे वह प्रस्ताव पारित करके इस्तेमाल करता है। तेलंगाना में जो हुआ, वह रिपोर्टों के अनुसार दूसरा रास्ता था।

निलंबन का असल असर: वेतन, समिति और सदन की कार्यवाही

निलंबन से क्या-क्या रुकता है, इसकी सबसे विस्तृत सूची शेलार फ़ैसले के फ़ुटनोट 60 में है, जो महाराष्ट्र विधानसभा नियमावली से बनाई गई थी। उसके मुताबिक़ निलंबित सदस्य कोई प्रस्ताव नहीं रख सकता, मत विभाजन में हिस्सा नहीं ले सकता, बहस में नहीं बोल सकता, मंत्रियों के वक्तव्यों पर सवाल नहीं पूछ सकता, व्यक्तिगत स्पष्टीकरण नहीं दे सकता, अल्प सूचना प्रश्न नहीं लगा सकता, ग़ैर-सरकारी विधेयक नहीं ला सकता, अविश्वास प्रस्ताव और स्थगन प्रस्ताव नहीं रख सकता, और लोक लेखा समिति तथा प्राक्कलन समिति समेत समितियों की बैठकों में नहीं बैठ सकता। वेतन या भत्ते रोकने का ज़िक्र न तेलंगाना के प्रस्ताव की किसी रिपोर्ट में मिला, न इस सूची में।

जब विपक्ष सदन में नहीं होता तो विधेयक कैसे पास होते हैं

नए संसद भवन में लोकसभा का सभागार, उद्घाटन से पहले मई 2023 में ली गई तस्वीर, जिसमें सारी बेंचें ख़ाली हैं; यह तस्वीर नई दिल्ली की है, तेलंगाना की नहीं
तस्वीर: Ministry of Parliamentary Affairs GODL-India

निलंबन वाले दिन ही सदन में पंचायत राज संशोधन विधेयक, 2026 पेश हुआ। इसे पंचायत राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री डी. सीताक्का ने रखा और यह तेलंगाना पंचायत राज अधिनियम, 2018 की धारा 70(3) में संशोधन करता है, ताकि ग्राम पंचायतें अपना पैसा सरकारी ख़ज़ाने में जमा कराने के बजाय बैंकों और डाकघरों में रख सकें। पैसा कहाँ रहेगा, इस पर सवाल पूछने वाली बेंच उस समय ख़ाली थी। मुख्य विपक्षी दल का कोई सदस्य सदन में नहीं था।

जो मुद्दे सूची में थे और जिन पर बात नहीं हुई

कार्य मंत्रणा समिति की सूची में जो मामले थे और जिन पर चर्चा नहीं हुई, तेलंगाना टुडे ने उन्हें गिनाया है: पंजीकरण अधिनियम की धारा 22-ए वाली निषिद्ध संपत्तियों की सूची, फ़ीस प्रतिपूर्ति, और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बकाया लाभ। निलंबन के दिन हरीश राव ने जिन मामलों को उठाने की बात कही, उनमें आरटीसी कर्मचारियों का विलय, निषिद्ध सूची से ज़मीनें हटाने की माँग, जीओ 97 वापस लेने की पॉलिटेक्निक छात्रों की माँग, कर्मचारियों का महँगाई भत्ता और वेतन संशोधन आयोग, सिंगरेणी कर्मचारियों की अनुकंपा नियुक्तियाँ और बुज़ुर्गों की पेंशन शामिल थे। उनका वाक्य तेलंगाना टुडे ने दर्ज किया: माइक काटे जा सकते हैं, निलंबन हो सकते हैं, पर जनता के बीच हमारी आवाज़ बंद नहीं की जा सकती।

दिसंबर 2023: लोकसभा और राज्यसभा से 146 सांसदों का निलंबन

नई दिल्ली में नया संसद भवन, मई 2023 की तस्वीर, जब इमारत का काम पूरा हो रहा था; दिसंबर 2023 का शीतकालीन सत्र इसी भवन में बैठा
तस्वीर: Ministry of Parliamentary Affairs GODL-India

राज्य से पहले संसद में यही पैमाने पर हो चुका है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आँकड़ों के मुताबिक़ 4 से 21 दिसंबर 2023 के शीतकालीन सत्र में 14 से 21 दिसंबर के बीच लोकसभा से 100 और राज्यसभा से 46 सांसद निलंबित हुए, और डेक्कन हेराल्ड के अनुसार ये सभी 146 विपक्ष के थे। यह दोनों सदनों में से हर एक की कुल संख्या का 19 फ़ीसदी था, और पीआरएस इसे किसी भी लोकसभा कार्यकाल का सबसे ऊँचा आँकड़ा दर्ज करता है। सत्र में 10 विधेयक पेश हुए और 17 पारित हुए।

उन्हीं दिनों तीन आपराधिक क़ानून पास हुए

पीआरएस के विधेयक-रिकॉर्ड के अनुसार भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता और भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) विधेयक तीनों 12 दिसंबर 2023 को लोकसभा में पेश हुए, 20 दिसंबर को लोकसभा से और 21 दिसंबर को राज्यसभा से पारित हुए। दोनों तारीख़ें निलंबन की अवधि के भीतर पड़ती हैं। पीआरएस के मुताबिक़ इन तीनों पर लोकसभा में नौ घंटे 28 मिनट और राज्यसभा में छह घंटे आठ मिनट चर्चा हुई; लोकसभा में बोलने वाले 34 सदस्यों में से 25 भाजपा के थे और राज्यसभा में बोलने वाले 40 में से 30 भाजपा के।

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के 12 विधायकों के एक साल के निलंबन पर क्या कहा था

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की इमारत, जहाँ 28 जनवरी 2022 को महाराष्ट्र के 12 विधायकों का एक साल का निलंबन रद्द हुआ
तस्वीर: सुभाशीष पाणिग्रही, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

महाराष्ट्र विधानसभा ने 5 जुलाई 2021 को भाजपा के 12 विधायकों को एक साल के लिए निलंबित किया था। अशीष शेलार बनाम महाराष्ट्र विधानसभा, रिट याचिका (सिविल) 797/2021 में न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सी.टी. रविकुमार की पीठ ने 28 जनवरी 2022 को वह प्रस्ताव रद्द किया। फ़ैसले के पैरा 75 के शब्द हैं कि उस सत्र के बाक़ी हिस्से से आगे का निलंबन "क़ानून की नज़र में अस्तित्वहीन, शून्य, असंवैधानिक, तात्विक रूप से अवैध और अविवेकी" है। पैरा 76 में याचिकाकर्ताओं को सत्र की अवधि बीतने के बाद के सारे परिणामी लाभ दिए गए।

अदालत ने रेखा सत्र पर क्यों खींची

फ़ैसले का पैरा 54 शब्द "निलंबन" को सदन में सदस्य की उपस्थिति से जोड़ता है और कहता है कि निलंबन सिर्फ़ उस सत्र के दौरान सदन का कामकाज व्यवस्थित रखने के लिए किया जा सकता है, और इससे आगे कुछ भी अविवेकी निलंबन होगा। पैरा 53 में अदालत ने अमरिंदर सिंह वाले फ़ैसले का हवाला देकर लिखा कि विशेषाधिकार के इस्तेमाल को परखने की कसौटी यह है कि क्या वह विधायी कार्य की अखंडता बचाने के लिए ज़रूरी है, और निलंबन को अल्पकालिक तथा अस्थायी उपाय के रूप में ही चुना जाना चाहिए।

अनुच्छेद 190(4) और वे साठ दिन

संविधान का अनुच्छेद 190(4) कहता है कि यदि किसी राज्य विधानमंडल के सदन का सदस्य सदन की अनुमति के बिना साठ दिन तक उसकी सभी बैठकों से अनुपस्थित रहे, तो सदन उसका स्थान रिक्त घोषित कर सकता है। इसी अनुच्छेद के परंतुक में लिखा है कि साठ दिन की गिनती में वह अवधि नहीं जोड़ी जाएगी जिसमें सदन सत्रावसान में हो या चार से ज़्यादा लगातार दिनों के लिए स्थगित हो। शेलार फ़ैसले के पैरा 54 में अदालत ने इसी समय-सीमा को निलंबन की बाहरी हद के साथ जोड़ा।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151क

दूसरी समय-सीमा एक क़ानून में है। फ़ैसले के फ़ुटनोट 5 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151क का पूरा पाठ दिया गया है: धारा 147, 149, 150 और 151 में उल्लिखित किसी भी रिक्ति को भरने के लिए उपचुनाव रिक्ति की तारीख़ से छह महीने के भीतर कराया जाएगा। इसमें दो अपवाद हैं, कि सदस्य का बचा हुआ कार्यकाल एक साल से कम हो, या चुनाव आयोग केंद्र सरकार से परामर्श करके प्रमाणित करे कि उस अवधि में उपचुनाव कराना कठिन है।

निलंबन और निष्कासन की तुलना अदालत ने कैसे की

पैरा 56 में अदालत ने लिखा कि जहाँ तक सदन में प्रतिनिधित्व पाने के निर्वाचन क्षेत्र के अधिकार का सवाल है, एक साल का निलंबन "निष्कासन", "निरर्हता" या "त्यागपत्र" से भी बुरा है। तर्क यह है कि निष्कासन पर धारा 151क के तहत छह महीने के भीतर उपचुनाव होता है, जबकि लंबा निलंबन पैरा 55 के शब्दों में विधिक रिक्ति तो नहीं बनाता, व्यावहारिक रिक्ति बना देता है। पैरा 52 में अदालत ने जोड़ा कि यदि आचरण इतना गंभीर हो, तो सदन के पास निष्कासन की बड़ी शक्ति मौजूद है।

विधानमंडल ही एकमात्र सीधे चुनी जाने वाली संस्था है

संविधान के पाठ में यह बात दो जगह साफ़ है। अनुच्छेद 75(3) कहता है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी, और अनुच्छेद 164(2) कहती है कि राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होगी। कार्यपालिका इसी सदन से निकलती है और इसी को जवाब देती है। शेलार फ़ैसले के पैरा 48 में अदालत ने इसी ढाँचे पर लंबे निलंबन का असर लिखा: इससे सत्ता पक्ष सदन में विपक्ष की संख्या के साथ अलोकतांत्रिक ढंग से खेल सकता है, विपक्ष लंबे निलंबन के लगातार डर में बहस में ठीक से हिस्सा नहीं ले पाएगा, और फिर सार्थक बहस के बजाय बहुमत की मर्ज़ी से चलने वाली भयग्रस्त बहस बचेगी, जो पूरे लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं है।

बीआरएस 39 से 27 तक कैसे पहुँची

2023 के चुनाव में बीआरएस ने 119 में से 39 सीटें जीती थीं और कांग्रेस ने 64। विधानसभा की मौजूदा दलगत संरचना में कांग्रेस के 76 और बीआरएस के 27 सदस्य हैं, भाजपा और एआईएमआईएम के सात-सात, सीपीआई का एक और एक निर्दलीय। बीच का अंतर दलबदल का है। एससीसी ऑनलाइन के अनुसार पाडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य में 31 जुलाई 2025 को मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने अध्यक्ष को दस बीआरएस विधायकों की निरर्हता याचिकाओं पर तीन महीने में फ़ैसला करने का निर्देश दिया था, यह पूछते हुए कि क्या अध्यक्ष ने उस तेज़ी से काम किया जिस तेज़ी के लिए संसद ने यह काम उन्हें सौंपा था।

निलंबन वापस कैसे होता है

निलंबन को सदन ही वापस ले सकता है। लोकसभा के नियम 374 में लिखा है कि सदन बाद में प्रस्ताव पारित करके ऐसे निलंबन को समाप्त कर सकता है, और राज्यसभा के नियम 256 में परिषद के लिए वही व्यवस्था है। डेक्कन हेराल्ड के अनुसार दिसंबर 2023 में निलंबित 146 विपक्षी सांसदों में से 132 का निलंबन सत्र के बाक़ी हिस्से तक था और 14 का विशेषाधिकार समितियों की रिपोर्ट आने तक। उन 14 में 11 राज्यसभा से और तीन लोकसभा से थे। खेद-पत्र मिलने के बाद समितियों ने निलंबन रद्द करने की सिफ़ारिश की, ओम बिरला और जगदीप धनखड़ ने सहमति दी, और संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने 30 जनवरी 2024 को इसकी घोषणा की। तेलंगाना के प्रस्ताव में ऐसी किसी समिति के हवाले की रिपोर्ट नहीं मिली।

तेलंगाना का निलंबन उस रेखा के किस तरफ़ पड़ता है

शेलार फ़ैसले ने सत्र के बाक़ी हिस्से तक के निलंबन को सदन की शक्ति के भीतर माना और उससे आगे को नहीं। तेलंगाना का प्रस्ताव, जैसा सभी रिपोर्टों में दर्ज है, सत्र के बाक़ी हिस्से तक ही है। पैरा 53 के शब्दों में एक दिन या सत्र के बाक़ी हिस्से का निलंबन उसी शक्ति का कम मात्रा वाला इस्तेमाल है। जो सवाल फ़ैसले में तय नहीं हुआ, वह यह है कि सदन में मौजूद न रहने वाले सदस्य पर सदन में व्यवधान का आधार कैसे लागू होता है; महेश्वर रेड्डी का सवाल ठीक इसी बिंदु पर था।

सत्र कब तक चलना है

द हंस इंडिया के अनुसार यह सत्र 7 से 11 सितंबर तक, पाँच दिन का ही रखा गया, और इसकी दो वजहें बताई गईं। पहली, विधानसभा अध्यक्ष, विधान परिषद के सभापति और उपसभापति को 13 से 19 सितंबर तक केप टाउन में 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन में जाना है। दूसरी, 14 सितंबर से शुरू हो रहे गणेश उत्सव के लिए पुलिस बल की ज़रूरत है। हाई कोर्ट में तलसानी श्रीनिवास यादव की याचिका पर अगली सुनवाई 21 सितंबर को है, और उस दिन पुलिस महानिदेशक को अपनी रिपोर्ट देनी है।

स्रोतसोशल न्यूज़ (आईएएनएस), तेलंगाना विधानसभा से बीआरएस सदस्यों के निलंबन की रिपोर्ट, 9 सितंबर 2026, तेलंगाना टुडे, अनुपस्थित विधायक गंगुला कमलाकर के निलंबन पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, तेलंगाना टुडे, सत्र के बाक़ी हिस्से के लिए बीआरएस विधायकों के निलंबन की रिपोर्ट, 9 सितंबर 2026, तेलंगाना टुडे, विधान परिषद से दो बीआरएस सदस्यों के निलंबन और प्रस्ताव का पाठ, 8 सितंबर 2026, तेलंगाना टुडे, निलंबन के बाद सदन में उठे और छूटे मुद्दों पर रिपोर्ट, सितंबर 2026, तेलंगाना टुडे, टी. हरीश राव का बयान, 9 सितंबर 2026, लेटेस्टली (पीटीआई), नियम 63 की सूचना और निलंबित सदस्यों की नामसूची, 9 सितंबर 2026, न्यूज़मीटर, विधानसभा में पारित निलंबन प्रस्ताव और सदन के भीतर की कार्यवाही, 9 सितंबर 2026, सियासत डेली, बीआरएस महिला विधायकों के आरोप और प्रेस कॉन्फ़्रेंस, सितंबर 2026, सियासत डेली, कांग्रेस महिला विधायकों की शिकायत और सैफ़ाबाद थाने की एफ़आईआर, 8 सितंबर 2026, द न्यूज़ मिनट, तेलंगाना हाई कोर्ट के 9 सितंबर 2026 के आदेश की रिपोर्ट, इंडियन कानून पर अशीष शेलार बनाम महाराष्ट्र विधानसभा, रिट याचिका (सिविल) 797/2021, सुप्रीम कोर्ट का 28 जनवरी 2022 का फ़ैसला, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, संसद के शीतकालीन सत्र 2023 के आँकड़े, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, भारतीय न्याय (द्वितीय) संहिता विधेयक 2023 की तारीख़ें, विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत का संविधान, 1 मई 2024 तक अद्यतन संस्करण, द हंस इंडिया, तेलंगाना मानसून सत्र की अवधि और कारण, सितंबर 2026, एससीसी ऑनलाइन, पाडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य, सुप्रीम कोर्ट का 31 जुलाई 2025 का निर्देश, विकिपीडिया, तेलंगाना विधानसभा की मौजूदा दलगत संरचना और पदाधिकारी, डेक्कन हेराल्ड, 14 निलंबित सांसदों की वापसी और शीतकालीन सत्र 2023 के निलंबन का विभाजन, 30 जनवरी 2024, मनोरमा ईयरबुक, लोकसभा के नियम 373, 374, 374क और राज्यसभा के नियम 255, 256 की व्याख्या, दिसंबर 2023

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।