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हिमनद झीलों पर बैठक पाँच राज्यों के साथ हुई, और सबसे ज़्यादा झीलें जहाँ हैं वह लद्दाख बुलाया ही नहीं गया

गृह सचिव ने उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर के साथ तैयारी की समीक्षा की। विज्ञप्ति में झीलों की गिनती नहीं है, पैसा नहीं है, और कोई समयसीमा नहीं है।

हिमनद झीलों पर बैठक पाँच राज्यों के साथ हुई, और सबसे ज़्यादा झीलें जहाँ हैं वह लद्दाख बुलाया ही नहीं गया

केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने नई दिल्ली में एक बैठक की, जिसमें हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़ और हिमस्खलन की तैयारी की समीक्षा हुई।

बैठक में पाँच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव थे। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर।

सिक्किम की गुरुडोंगमार झील, जिसके पीछे ग्लेशियर दिखता है
तस्वीर: योघ्या, संपादन UnpetitproleX, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

लद्दाख इस सूची में नहीं है।

झीलें कहाँ हैं

सरकारी आकलनों में हिमालयी नदी घाटियों की 2,485 हिमनद झीलों की निगरानी की बात आती है, जिनमें से 56 को बहुत ज़्यादा जोखिम वाला माना गया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 2025 में 189 ऊँचे जोखिम वाली झीलों का वैज्ञानिक आकलन कराया था।

भारत के भीतर पड़ने वाली झीलों का एक राज्यवार बँटवारा भी चलता है, जिसमें कुल 681 झीलें गिनाई जाती हैं। उसमें लद्दाख में 179, अरुणाचल में 324, जम्मू-कश्मीर में 76, सिक्किम में 72, हिमाचल में 17 और उत्तराखंड में 13 दर्ज हैं।

इसी बीच एक दूसरा सेट भी चलता है, जिसमें ऊँचे जोखिम वाली झीलें हिमाचल में 48, सिक्किम में 40, लद्दाख में 35, अरुणाचल में 28, जम्मू-कश्मीर में 26 और उत्तराखंड में 13 बताई जाती हैं।

दोनों सेट एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, और वे एक ही चीज़ नहीं गिन रहे। एक कुल झीलें गिनता दिखता है, दूसरा जोखिम वाली।

⚠ हम इन दोनों में से किसी को प्राधिकरण के अपने प्रकाशित दस्तावेज़ से नहीं मिला सके। इसलिए इन्हें यहाँ प्रचलित आँकड़ों के तौर पर दिया जा रहा है, अंतिम आँकड़े के तौर पर नहीं। जो पक्का है वह यह है कि दोनों सेट में लद्दाख ऊपर की तरफ़ है।

5 राज्य, लद्दाख नहींजिनके साथ गृह सचिव ने तैयारी की समीक्षा की

जो विज्ञप्ति में है

विज्ञप्ति बताती है कि बैठक में किन चीज़ों पर ज़ोर दिया गया।

प्रारंभिक चेतावनी। संवेदनशील झीलों और बर्फ़ से ढके इलाक़ों की निगरानी। ऊँचे जोखिम वाली जगहों की पहचान। पानी के बहने के संभावित रास्तों का निर्धारण। चेतावनियों का समय पर आख़िरी छोर तक पहुँचना। निकासी की तैयारी।

बैठक में गृह मंत्रालय के अलावा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग, भारत मौसम विज्ञान विभाग और रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान के अधिकारी थे। आख़िरी वाला संस्थान हिमस्खलन की चेतावनी का काम देखता है।

गृह सचिव ने कहा कि तैयारी सिर्फ़ प्रतिक्रिया तक सीमित न रहे, बल्कि जोखिम को ध्यान में रखकर बनी योजना और निवारक उपायों तक जाए।

जो विज्ञप्ति में नहीं है

कितनी झीलें निगरानी में हैं, यह नहीं लिखा।

कितनी पर चेतावनी तंत्र लग चुका है, यह नहीं लिखा।

कितना पैसा है, कहाँ से आएगा, किस राज्य को कितना मिला, यह नहीं लिखा।

और कोई तारीख़ नहीं है। न यह कि अगली समीक्षा कब होगी, न यह कि कौन-सा काम कब तक पूरा होगा।

भूगोल, जो इस पूरे मामले की जड़ है

हिमनद झील बनती कैसे है, यह समझना ज़रूरी है।

ग्लेशियर जब पीछे हटता है तो वह अपने साथ लाया मलबा आगे छोड़ जाता है। पत्थर, बजरी और मिट्टी का यह ढेर एक क़ुदरती बाँध बना देता है, जिसे मोरेन कहते हैं। ग्लेशियर के पिघलने का पानी उसके पीछे जमा होता रहता है।

यह बाँध सीमेंट का नहीं है। वह ढीले मलबे का है।

जब वह टूटता है, तो पूरी झील एक साथ नीचे उतरती है, और रास्ते का मलबा साथ लेती जाती है। इसी को हिमनद झील विस्फोट बाढ़ कहते हैं।

टूटने की वजह अलग-अलग हो सकती है। ऊपर से बर्फ़ या चट्टान का बड़ा टुकड़ा झील में गिरना, भूकंप, या बाँध का धीरे-धीरे रिसते-रिसते बैठ जाना।

नदियाँ जिन घाटियों में बहती हैं, वे तंग हैं और उनका ढाल तेज़ है। यही दो बातें ऐसी बाढ़ को ख़तरनाक बनाती हैं। पानी फैलने की जगह नहीं मिलती, इसलिए वह ऊँचा उठता है और तेज़ चलता है।

बैठक में जिन राज्यों के नाम हैं, उनकी नदियाँ अलग-अलग तंत्रों की हैं। सिक्किम और उत्तरी बंगाल की तिस्ता, अरुणाचल की सुबनसिरी और सियांग, उत्तराखंड की अलकनंदा और धौलीगंगा, हिमाचल की सतलुज और चिनाब की ऊपरी धाराएँ, और लद्दाख में सिंधु का ऊपरी हिस्सा।

लद्दाख की झीलें सिंधु तंत्र में गिरती हैं।

सिक्किम में रंगपो के पास तिस्ता नदी और उसका चौड़ा पथरीला पाट, जो बताता है कि बाढ़ के वक़्त पानी कहाँ तक आता है
तस्वीर: पिनाकपाणि, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

यह बैठक इस हफ़्ते क्यों

26 अगस्त को नेपाल के रसुवा में आई बाढ़ में 550 से ज़्यादा लोग मारे गए थे। हमने 29 अगस्त के अंक में दर्ज किया था कि उसकी वजह हिमनद झील नहीं थी, बल्कि चट्टान और बर्फ़ का भूस्खलन था जिसने त्रिशूली की एक सहायक नदी को बाँध दिया और फिर वह अस्थायी बाँध टूट गया।

यह फ़र्क़ मायने रखता है और आज की बैठक उसे नहीं मिटाता।

रसुवा वाली झील एक दिन पहले तक थी ही नहीं। जिन झीलों की निगरानी होती है, वे सालों से मौजूद झीलें हैं। जो रातोंरात बनकर टूट जाए, वह किसी सूची में नहीं होगी।

विज्ञप्ति में भूस्खलन से बने अस्थायी बाँधों का ज़िक्र नहीं है।

स्रोतगृह मंत्रालय, विज्ञप्ति, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, हिमनद झील जोखिम आकलन, रेल मंत्रालय, नेपाल बाढ़ पर विज्ञप्ति

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।