बार काउंसिल ने एक पूरे बैच को वकील बनने से रोक दिया था, और सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यह अधिकार आया कहाँ से
अधिवक्ता अधिनियम 1961 में वह धारा है ही नहीं। तीन जजों की पीठ ने कहा कि बार काउंसिल का अनुशासन तब शुरू होता है जब कोई वकील बन जाए, उससे पहले नहीं। जिन जजों ने यह कहा, उनमें वही मुख्य न्यायाधीश थे जिनके विरोध से यह सब शुरू हुआ था।

एक क़ानून का छात्र पाँच साल पढ़ता है, डिग्री लेता है, और फिर एक रजिस्टर में अपना नाम लिखवाता है। उस दिन से वह वकील है।
उस रजिस्टर तक पहुँचने से पहले वह क्या है, इस सवाल का जवाब इस साल अगस्त में अचानक ज़रूरी हो गया।
बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने अगस्त के मध्य में सभी राज्य बार काउंसिलों को लिखा कि नालसार विधि विश्वविद्यालय, हैदराबाद से 2026 में क़ानून की डिग्री लेने वाले किसी भी छात्र को अधिवक्ता के रूप में नामांकित न किया जाए। साथ में छात्रों और शिक्षकों के ख़िलाफ़ जाँच बैठाने की बात भी थी।
3 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने वे निर्देश ग़ैर-क़ानूनी क़रार दे दिए।
फ़ैसला मिहिरा सूद बनाम बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया में आया, याचिका संख्या डब्ल्यू.पी.(सी) 1040/2026। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना थे।
विवाद किस बात पर था
नालसार के दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को आना था।
कुछ छात्रों ने इसका विरोध किया और उनके आने के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। यह अभियान किस रूप में था, इस पर रिपोर्टों में ब्योरा सीमित है, और इस लेख में वही लिखा जा रहा है जो रिकॉर्ड में है।
इसके बाद बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष की ओर से परिपत्र निकला। उसकी भाषा सामान्य नहीं थी। उसमें यह नहीं लिखा था कि जिन छात्रों ने अभियान चलाया, उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो। उसमें लिखा था कि नालसार से 2026 में डिग्री लेने वाला कोई भी छात्र किसी राज्य बार काउंसिल में नामांकित न किया जाए।
यह अंतर मामूली नहीं है। एक बैच में सौ से ऊपर छात्र होते हैं। उनमें से अधिकांश का उस अभियान से कोई संबंध नहीं था।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक़ बाद में बार काउंसिल ने ख़ुद यह माना। परिषद के सदस्यों की सर्वसम्मत राय बनी कि नालसार के 2026 बैच के अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और उस काम में शामिल नहीं थे, इसलिए आदेश में बदलाव किया गया और सभी छात्रों को अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में नामांकन का हक़ बहाल कर दिया गया।
जिनके ख़िलाफ़ विरोध था, उन्होंने क्या कहा
यहाँ इस पूरे प्रकरण की सबसे असामान्य बात आती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 14 अगस्त, शुक्रवार को इस परिपत्र पर नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि अगर छात्रों के पास विरोध का कोई कारण है तो उन्हें विरोध का अधिकार है, कि यह छात्रों और उनके बीच का संवाद था, और बार काउंसिल की कार्रवाई अनुचित थी क्योंकि बार काउंसिल का इससे कोई लेना-देना नहीं था।
यानी जिस व्यक्ति के सम्मान की रक्षा में यह परिपत्र निकला था, उसी ने सबसे पहले कहा कि ऐसी रक्षा की ज़रूरत नहीं है।
और तीन हफ़्ते बाद वही मुख्य न्यायाधीश उस पीठ में बैठे जिसने इस परिपत्र को क़ानूनी रूप से रद्द किया।
अदालतों में यह असामान्य स्थिति है। एक जज आमतौर पर उस मामले से ख़ुद को अलग कर लेते हैं जिसमें उनका अपना नाम आता हो। यहाँ मामला उनके नाम का नहीं था। मामला इस सवाल का था कि एक नियामक संस्था के पास कौन-सा अधिकार है, और उस सवाल का जवाब किसी भी विवाद से स्वतंत्र है।
क़ानून में लिखा क्या है
अधिवक्ता अधिनियम 1961 वह क़ानून है जिससे बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया बनी है।
उसकी धारा 7 परिषद के काम गिनाती है। उनमें अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानक तय करना है, अपनी और राज्य बार काउंसिलों की अनुशासन समितियों की प्रक्रिया तय करना है, और अधिवक्ताओं के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है।
उसी धारा में शिक्षा से जुड़े दो काम भी हैं। परिषद क़ानूनी शिक्षा को बढ़ावा देती है और विश्वविद्यालयों तथा राज्य बार काउंसिलों के परामर्श से उसके मानक तय करती है। और वह उन विश्वविद्यालयों को मान्यता देती है जिनकी क़ानून की डिग्री नामांकन के लिए योग्यता मानी जाएगी, और इस काम के लिए उनका निरीक्षण करती है।
इन दोनों वाक्यों को ध्यान से पढ़िए। दोनों में जिसका ज़िक्र है, वह विश्वविद्यालय है। छात्र नहीं।
परिषद विश्वविद्यालय को मान्यता दे सकती है, उसका निरीक्षण कर सकती है, उसके पाठ्यक्रम के मानक तय कर सकती है। इनमें से कोई अधिकार किसी एक छात्र पर सीधे नहीं चलता।
धारा 24 बताती है कि कौन अधिवक्ता के रूप में राज्य नामावली में दर्ज हो सकता है। शर्तें भारत का नागरिक होना, इक्कीस साल की उम्र पूरी करना, मान्यता प्राप्त संस्थान से क़ानून की डिग्री और निर्धारित शुल्क हैं।
धारा 35 अनुशासन की धारा है, और उसकी भाषा इस पूरे मामले की धुरी है। वह कहती है कि जब किसी राज्य बार काउंसिल के पास यह मानने का कारण हो कि उसकी नामावली में दर्ज कोई अधिवक्ता पेशेवर या अन्य दुराचार का दोषी है, तो मामला उसकी अनुशासन समिति को भेजा जाएगा।
"उसकी नामावली में दर्ज कोई अधिवक्ता।"
छात्र किसी नामावली में दर्ज नहीं होता। इसलिए धारा 35 उस पर लागू ही नहीं होती। अनुशासन समिति जो सज़ाएँ दे सकती है, वे भी इसी ढाँचे की हैं: शिकायत ख़ारिज करना, फटकार लगाना, प्रैक्टिस से निलंबित करना, या नाम नामावली से हटा देना। इनमें से कोई भी उस पर लागू नहीं होता जिसका नाम कभी दर्ज ही नहीं हुआ।

अदालत ने क्या कहा
पीठ का निष्कर्ष सीधा था। अधिवक्ता अधिनियम 1961 बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया या किसी राज्य बार काउंसिल को क़ानून के छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं देता, न स्पष्ट रूप से, न निहित रूप से।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने कहा कि जब कोई क़ानून स्नातक अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हो जाता है, तब बीसीआई उसके आचरण को नियंत्रित करने वाली वैधानिक संस्था है, पर छात्रों के आचरण की नहीं।
और छात्रों पर अनुशासन का अधिकार किसके पास है, यह भी बताया गया: उनकी अपनी संस्था, या उस संस्था को चलाने वाले नियमों और उपनियमों में तय प्राधिकारी।
"निहित रूप से" वाला शब्द क्यों मायने रखता है
फ़ैसले में दो शब्द हैं जिन पर रुकना चाहिए: स्पष्ट, और निहित।
नियामक संस्थाएँ अक्सर यह तर्क देती हैं कि जब क़ानून ने उन्हें कोई बड़ा उद्देश्य सौंपा है, तो उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए ज़रूरी छोटे अधिकार अपने-आप उसमें शामिल माने जाएँगे। इसे निहित शक्ति कहते हैं, और यह क़ानून में एक स्वीकृत विचार है।
तर्क इस मामले में यह बन सकता था कि परिषद को क़ानूनी शिक्षा के मानक तय करने हैं, पेशे की गरिमा की रक्षा करनी है, और इसलिए भावी वकीलों के आचरण पर उसका कुछ अधिकार निहित रूप से मौजूद है।
अदालत ने इस दरवाज़े को भी बंद किया। यही "निहित रूप से" शब्द का काम है। अगर फ़ैसला सिर्फ़ यह कहता कि क़ानून में ऐसी कोई धारा नहीं है, तो परिषद अगली बार यही तर्क दूसरे रास्ते से ला सकती थी।
धारा 7 का ढाँचा इस निष्कर्ष का समर्थन करता है। शिक्षा के मामले में परिषद का अधिकार परामर्श से चलता है, अकेले नहीं। और वह संस्था पर चलता है, व्यक्ति पर नहीं। जिस अधिकार का प्रयोग परामर्श से होना तय है, उससे एकतरफ़ा दंड की शक्ति निकालना कठिन है।
नामांकन रोकने का असल मतलब
इस मामले में जो रोका गया था, वह कोई प्रमाणपत्र या पुरस्कार नहीं था।
भारत में क़ानून की प्रैक्टिस के लिए राज्य बार काउंसिल में नामांकन अनिवार्य है। नामांकन के बिना कोई व्यक्ति अदालत में किसी की ओर से पेश नहीं हो सकता। डिग्री होने से वह वकील नहीं बनता, नामांकन से बनता है।
इसलिए नामांकन रोकने का अर्थ है, पाँच साल की पढ़ाई के बाद पेशे में प्रवेश ही रोक देना।
और उसका असर सिर्फ़ अदालत तक सीमित नहीं रहता। कई कंपनियों और विधि फ़र्मों में नियुक्ति की शर्त नामांकन से जुड़ी होती है। न्यायिक सेवा की परीक्षाओं और कई सरकारी विधि पदों की पात्रता में भी यह शर्त आती है। जो छात्र डिग्री के तुरंत बाद काम शुरू करना चाहता है, उसके लिए यह देरी सीधे आमदनी की देरी है।
एक और बात। बैच पूरा का पूरा रोक देने में जो नुक़सान होता है, वह अनुपात से बाहर होता है। जिसने कुछ नहीं किया, उसका नुक़सान उतना ही है जितना उसका जिसने कुछ किया। दंड की सबसे पुरानी शर्त यही है कि वह उसी पर पड़े जिसने कुछ किया हो।

तो अनुशासन किसका काम है
फ़ैसले ने यह ख़ाली जगह छोड़ी नहीं।
अनुशासन का अधिकार मूल संस्था के पास है। नालसार जैसे राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय राज्य के क़ानूनों से बने हैं और उनके अपने नियम, अनुशासन समितियाँ और प्रक्रियाएँ हैं।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि अगर विश्वविद्यालय को लगता कि किसी छात्र ने अनुशासन तोड़ा है, तो कार्रवाई का रास्ता उसके पास था। उस रास्ते में सुनवाई का मौक़ा, अपील और सीमित दंड सब पहले से तय हैं।
बाहर से आया आदेश इन सबको छोड़कर सीधे सबसे भारी नतीजे पर पहुँच गया था।

परिषद के पास जो दरवाज़ा सचमुच है
यहाँ एक बात जोड़ने लायक़ है, क्योंकि उसके बिना यह लगेगा कि परिषद के पास नए वकीलों पर कोई अधिकार ही नहीं है। ऐसा नहीं है।
बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने 30 अप्रैल 2010 को अखिल भारतीय बार परीक्षा को मंज़ूरी दी थी। यह 2009-10 के शैक्षणिक सत्र और उसके बाद डिग्री लेने वाले सभी छात्रों पर लागू है।
इस व्यवस्था की तरतीब पर ध्यान दीजिए, क्योंकि वही इस पूरे मामले पर रोशनी डालती है।
छात्र पहले धारा 24 के तहत नामांकित होता है। नामांकन के बाद ही वह परीक्षा में बैठ सकता है। नामांकन दो साल के लिए अस्थायी होता है और इस अवधि में वह सभी अदालतों और अधिकरणों में काम कर सकता है। दो साल में परीक्षा पास न हो तो वह किसी अदालत या अधिकरण में प्रैक्टिस का हक़दार नहीं रहता, और परिषद के 12 अप्रैल 2013 के प्रस्ताव के अनुसार उसका नामांकन अपने-आप रद्द हो जाता है।
यानी परिषद के पास पेशे में बने रहने की एक असली शर्त पहले से मौजूद है। पर वह शर्त नामांकन से पहले नहीं, नामांकन के बाद लगती है।
यह उसी सीमा का दूसरा प्रमाण है जो अदालत ने खींची। परिषद जिस जगह खड़ी होकर किसी को रोक सकती है, वह जगह रजिस्टर के इस तरफ़ है। अगस्त के परिपत्र ने उसी रजिस्टर तक पहुँचने से रोका था, और वह जगह उसकी कभी थी ही नहीं।
जो सवाल इस फ़ैसले से बाहर रह गए
एक फ़ैसला उतना ही तय करता है जितना उसके सामने रखा जाए। यहाँ जो तय हुआ वह अधिकार का सवाल था, और उससे लगे कुछ सवाल खुले रह गए।
पहला, अगर किसी छात्र का आचरण सचमुच ऐसा हो कि वह पेशे के लिए अयोग्य ठहरे, तो नामांकन के समय उसका क्या होगा। धारा 24 योग्यता की शर्तें गिनाती है और धारा 24क कुछ अपराधों में सज़ा पाए लोगों के लिए अयोग्यता रखती है। इनके बीच कितनी जगह है, यह इस फ़ैसले का विषय नहीं था।
दूसरा, परिषद ने आदेश पहले ही वापस ले लिया था। फिर भी अदालत ने उसे ग़ैर-क़ानूनी कहा। यह मायने रखता है, क्योंकि वापस लिया गया आदेश दोबारा निकल सकता है, और अधिकार पर टिप्पणी उसे रोकती है।
तीसरा, दो तारीख़ों में मामूली फ़र्क़ है। कुछ रिपोर्टों में परिपत्र की तारीख़ 13 अगस्त है और कुछ में 14 अगस्त। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी 14 अगस्त, शुक्रवार की है। यह लेख इसीलिए "अगस्त के मध्य" लिखता है, क्योंकि दोनों में से कौन-सी सही है, यह मूल परिपत्र देखे बिना तय नहीं होता।
एक पुरानी बहस, नए रूप में
भारत में वकीलों का पेशा उन गिने-चुने पेशों में है जो ख़ुद अपना नियमन करते हैं। बार काउंसिल में निर्वाचित सदस्य वकील ही होते हैं। यह व्यवस्था 1961 में इसी सोच से बनी थी कि पेशे की स्वतंत्रता तभी बचती है जब सरकार उसे बाहर से न चलाए।
स्व-नियमन की क़ीमत यह है कि उसकी सीमा भी उसी क़ानून में लिखी होनी चाहिए जिसने उसे बनाया। जो संस्था अपने ही पेशे के लोगों से बनी हो, उस पर बाहर से नियंत्रण कम होता है, इसलिए भीतर की सीमा साफ़ होनी ज़रूरी है।
इस फ़ैसले ने वही सीमा दोहराई है। अनुशासन उस दिन शुरू होता है जिस दिन नाम नामावली में चढ़ता है।
उससे पहले जो पाँच साल हैं, वे विश्वविद्यालय के हैं। और उन पाँच सालों में छात्र वही करते हैं जो छात्र करते आए हैं, जिसमें असहमति भी शामिल है।
आख़िर में
इस पूरे मामले का सबसे सीधा वाक्य मुख्य न्यायाधीश का है, और वह किसी फ़ैसले में नहीं, 14 अगस्त की एक मौखिक टिप्पणी में है: अगर छात्रों के पास विरोध का कारण है तो उन्हें विरोध का अधिकार है।
बाक़ी सब उसी वाक्य का क़ानूनी रूप है।
एक बैच अपने नामांकन का इंतज़ार कर रहा था। तीन हफ़्ते में उसे वह मिल गया, पहले परिषद के अपने फ़ैसले से और फिर अदालत के फ़ैसले से, जिसने बताया कि वह इंतज़ार कभी होना ही नहीं चाहिए था।
स्रोतलाइव लॉ, मिहिरा सूद बनाम बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट, 3 सितंबर 2026, बार एंड बेंच, बीसीआई के आदेश वापस लेने की रिपोर्ट, द ट्रिब्यून, फ़ैसले की रिपोर्ट, अधिवक्ता अधिनियम 1961, धारा 7, अखिल भारतीय बार परीक्षा, बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया