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लद्दाख के लिए अनुच्छेद 371(K) का प्रस्ताव रखा गया है, पर विधानसभा के बिना विधायी अधिकार किसके पास होगा यह अभी लिखा नहीं गया

9 सितंबर को नई दिल्ली में गृह मंत्रालय ने लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के सामने अनुच्छेद 371 में एक नया खंड रखा। इसमें न राज्य का दर्जा है, न छठी अनुसूची, न विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश। जिस मसौदे की उम्मीद थी वह नहीं मिला।

नई दिल्ली में नॉर्थ ब्लॉक के दरवाज़े पर क़तार में खड़ी सरकारी एंबेसडर गाड़ियाँ; गृह मंत्रालय इसी इमारत में बैठता है, और लद्दाख के दोनों संगठनों की बातचीत इसी मंत्रालय की उपसमिति के साथ चल रही है
तस्वीर: क्रिश्चियन हौगेन, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

नई दिल्ली की उस बैठक से लद्दाख का प्रतिनिधिमंडल जो चीज़ लेकर लौटा, वह एक पावरपॉइंट प्रस्तुति थी। जिस चीज़ की उम्मीद लेकर वे गए थे, वह मसौदा था। कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के सज्जाद कारगिली ने बाद में कहा कि केंद्रशासित प्रदेश स्तर की संस्था पर मसौदे का इंतज़ार था, पर कुछ नहीं मिला।

प्रस्ताव यह है कि संविधान के अनुच्छेद 371 में एक नया खंड जोड़ा जाए, जिसके तहत लद्दाख में सीधे चुनाव से एक संस्था बने और उसे ज़मीन, संस्कृति और भाषा, जंगल, पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों पर क़ानून बनाने का अधिकार मिले।

जो पेश नहीं हुआ, उसकी फ़ेहरिस्त इससे लंबी है। राज्य का दर्जा नहीं। छठी अनुसूची नहीं। विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश भी नहीं। सीटों की संख्या तय नहीं। पुलिस और नौकरशाही पर अधिकार तय नहीं। लेह और कारगिल की मौजूदा पहाड़ी विकास परिषदों का भविष्य तय नहीं।

जो माँगा गया था और जो पेश हुआ है

लद्दाख के दोनों संगठनों की माँगें चार रही हैं: राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल किया जाना, लद्दाख के लिए अलग लोक सेवा आयोग, और संसद में दो सीटें। 17 नवंबर 2025 को उन्होंने गृह मंत्रालय को 29 पन्नों का प्रस्ताव सौंपा, जिसमें 30 सदस्यों की विधानसभा, अनुच्छेद 371 के तहत संरक्षण, और मौजूदा पहाड़ी परिषदों की जगह हर ज़िले में एक स्वायत्त विकास परिषद की बात थी। '371K' नाम पहले उसी प्रस्ताव में आया था। केंद्र ने वही नाम उठा लिया, पर उसके भीतर जो सामान रखा है वह अलग है।

मसौदे की जगह एक प्रस्तुति

प्रतिनिधिमंडल को प्रस्तावित ढाँचे का ख़ाका दिखाया गया, और उसके साथ यह कि संस्था प्रत्यक्ष चुनाव से बनेगी। उसकी विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियों को परिभाषित करने वाला काग़ज़ नहीं दिया गया। लेह एपेक्स बॉडी के अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाक्रूक ने कहा कि नया कुछ नहीं था और पुरानी बातें दोहरा दी गईं; अधिकारियों का जवाब था कि वे काम कर रहे हैं। सीटों की संख्या और परिसीमन बाद की बैठकों पर टाल दिए गए। गृह मंत्रालय ने इस बैठक पर प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की; 9 और 10 सितंबर की पीआईबी सूची में इसका ज़िक्र नहीं है।

एक ही बैठक से निकले अलग-अलग बयान

एक ही कमरे से निकले लोगों ने अलग-अलग बातें कहीं। लेह एपेक्स बॉडी की तरफ़ से अध्यक्ष लाक्रूक, वांगचुक और लद्दाख के सांसद मोहम्मद हनीफ़ा जान बैठे थे; कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस की तरफ़ से असगर अली कर्बलाई, सज्जाद कारगिली और ग़ुलाम रसूल। पूर्व सांसद थुप्स्तान छेवांग ने बैठक को सकारात्मक, सौहार्दपूर्ण और रचनात्मक बताया और कहा कि केंद्रशासित प्रदेश स्तर पर विधानसभा को लेकर आश्वासन मिले हैं। लाक्रूक ने असंतोष जताया। सोनम वांगचुक ने बैठक को पूरी तरह सफल मानने से इनकार किया, क्योंकि अनुच्छेद 371 के तहत संरक्षण का आश्वासन देने वाला मसौदा मिलने की उम्मीद थी और वह नहीं मिला। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस की स्थिति एक जैसी नहीं है, और यह अंतर इसी बैठक के बयानों में दिख गया।

371A से 371J तक: नौ राज्यों के लिए नौ अलग इंतज़ाम

संविधान के भाग 21 का पाठ पढ़िए तो हर खंड का काम अलग निकलता है। अनुच्छेद 371 महाराष्ट्र और गुजरात के लिए विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र और कच्छ के वास्ते अलग विकास बोर्ड और राज्यपाल का विशेष दायित्व रखता है। 371A नगालैंड में नगा प्रथागत क़ानून, धार्मिक तथा सामाजिक प्रथाओं और ज़मीन व उसके संसाधनों पर संसद के क़ानून को रोकता है। 371B असम में विधानसभा की एक समिति बनवाता है, 371C मणिपुर में पहाड़ी क्षेत्रों के विधायकों की समिति। 371D आंध्र प्रदेश में स्थानीय संवर्ग और नौकरी-शिक्षा में आरक्षण देता है, 371E एक वाक्य में कहता है कि संसद वहाँ विश्वविद्यालय बना सकती है। 371F सिक्किम की विधानसभा को कम से कम 30 सदस्यों की रखता है, 371G मिज़ोरम में नगालैंड जैसी रोक लगाता है और विधानसभा को कम से कम 40 की, 371H अरुणाचल में राज्यपाल को क़ानून-व्यवस्था का विशेष दायित्व देता है, 371-I गोवा के बारे में सिर्फ़ इतना कि विधानसभा 30 से कम सदस्यों की नहीं होगी, और 371J कर्नाटक के हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र के लिए विकास बोर्ड तथा आरक्षण की व्यवस्था करता है।

हर मौजूदा खंड एक विधानसभा मान कर चलता है

इन नौ में से एक भी विधायिका नहीं बनाता। 371B और 371C को समिति बनाने के लिए विधानसभा चाहिए। 371A और 371G को प्रस्ताव पास करने के लिए विधानसभा चाहिए। 371F, 371G, 371H और 371-I विधानसभा के आकार की न्यूनतम सीमा तय करते हैं, यानी विधानसभा का होना उनकी शर्त है। 371, 371D और 371J राष्ट्रपति के आदेश और राज्यपाल के विशेष दायित्व के रास्ते चलते हैं, और ये दोनों पद राज्य के ढाँचे के भीतर काम करते हैं। लद्दाख में विधानसभा नहीं है। इसलिए जो चीज़ प्रस्तावित है, उसकी कोई नज़ीर इन नौ में नहीं मिलती।

नगालैंड की शर्त, जो लद्दाख में लागू नहीं हो सकती

371A(1)(a) चार विषय गिनाता है: नगाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएँ, नगा प्रथागत क़ानून और प्रक्रिया, नगा प्रथागत क़ानून के अनुसार दीवानी और फ़ौजदारी न्याय का प्रशासन, तथा ज़मीन और उसके संसाधनों का स्वामित्व और हस्तांतरण। इन पर संसद का कोई अधिनियम नगालैंड में तब तक लागू नहीं होता जब तक नगालैंड विधानसभा प्रस्ताव पास करके ऐसा तय न करे। ताला विधानसभा के हाथ में है। लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी, तो यह प्रस्ताव किसके पास जाएगा, इस पर जो काग़ज़ अब तक सामने आया है वह चुप है।

विधानसभा के बिना विधायी शक्ति: यह चलेगी कैसे

संविधान में केंद्रशासित प्रदेश के लिए विधायिका बनाने का रास्ता अनुच्छेद 239A है, और उसका पाठ आज सिर्फ़ पुडुचेरी का नाम लेता है। गोवा, दमन और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 ने बाक़ी नाम हटा दिए थे। जम्मू-कश्मीर को विधानसभा 2019 के पुनर्गठन अधिनियम की धारा 13 से मिली, जो कहती है कि पुडुचेरी पर लागू 239A के प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर भी लागू होंगे। लद्दाख के लिए ऐसी कोई धारा उसी अधिनियम में नहीं रखी गई। 239A(2) यह भी कहता है कि ऐसे क़ानून को अनुच्छेद 368 के लिहाज़ से संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा।

अनुच्छेद 244A: संविधान में पहले से पड़ा एक ख़ाका

जो चीज़ लद्दाख के लिए नई बताई जा रही है, उसका एक ख़ाका संविधान में 1969 से पड़ा है। बाईसवें संशोधन से जुड़ा अनुच्छेद 244A संसद को अधिकार देता है कि वह असम के भीतर एक स्वायत्त राज्य बनाए और उसके लिए विधायिका, मंत्रिपरिषद, या दोनों गठित करे। खंड (2) कहता है कि क़ानून यह तय कर सकता है कि राज्य सूची या समवर्ती सूची के कौन से विषय उस विधायिका के पास होंगे। खंड (3) उस सूची पर ताला लगाता है: विषयों वाली बात बदलनी हो तो संसद के हर सदन में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई चाहिए। यह अनुच्छेद आज तक इस्तेमाल नहीं हुआ।

छठी अनुसूची और अनुच्छेद 371 में फ़र्क़ क्या है

अनुच्छेद 244(2) कहता है कि छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन पर लागू होगी। चार राज्यों के नाम पाठ में लिखे हैं; किसी केंद्रशासित प्रदेश का नाम नहीं है। अनुसूची का पैराग्राफ़ 3 ज़िला परिषदों को दस विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार देता है, जिनमें ज़मीन का आवंटन, आरक्षित वन से बाहर के जंगलों का प्रबंधन, झूम खेती का नियमन, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार और सामाजिक रीति शामिल हैं। पैराग्राफ़ 3(3) शर्त जोड़ता है कि ये क़ानून राज्यपाल के पास भेजे जाएँगे और उनकी सहमति तक निष्प्रभावी रहेंगे। अनुच्छेद 371 वाली व्यवस्था हर राज्य के लिए अलग बुनी गई है और ज़्यादातर कार्यकारी है।

अनुच्छेद 240 की सूची में लद्दाख का नाम नहीं है

दो सरकारी दस्तावेज़ यहाँ आपस में नहीं मिलते। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 58(2) कहती है कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 240 के तहत लद्दाख की शांति, प्रगति और सुशासन के लिए विनियम बना सकेंगे। पर अनुच्छेद 240(1) के मौजूदा पाठ में चार ही नाम हैं: अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, और पुडुचेरी। लद्दाख उसमें नहीं है, और 2019 के अधिनियम ने अनुच्छेद 240 में संशोधन भी नहीं किया। गृह मंत्रालय की प्रस्तुति में विषयों की सूची का आख़िरी वाक्य यही है कि अनुच्छेद 240 के तहत सुरक्षित बाक़ी विषय भी संस्था के पास होंगे।

2019 के बाद: पूरा प्रशासन एक धारा में

पुनर्गठन अधिनियम में लद्दाख के प्रशासन का पूरा भाग 4 एक ही धारा का है। धारा 58 की चार उपधाराएँ कहती हैं कि लद्दाख का प्रशासन राष्ट्रपति अनुच्छेद 239 के तहत नियुक्त उपराज्यपाल के माध्यम से करेंगे, राष्ट्रपति विनियम बना सकेंगे, ऐसा विनियम संसद के किसी अधिनियम को भी निरस्त या संशोधित कर सकेगा, और उपराज्यपाल की मदद के लिए सलाहकार केंद्र सरकार नियुक्त करेगी। उसी अधिनियम की धारा 10 लद्दाख को लोकसभा में एक सीट देती है। चौथी अनुसूची में राज्यसभा की सीटें सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर के नाम गईं, चार। लद्दाख के लिए राज्यसभा की एक भी सीट नहीं रखी गई।

लेह और कारगिल की परिषदें किस क़ानून से चलती हैं

लेह में लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद का विज़न दस्तावेज़ 2025 जारी करते तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मंच पर लद्दाखी पोशाक में परिषद के लोग; यह तस्वीर 11 जून 2005 की है, जब परिषद जम्मू-कश्मीर राज्य के 1997 के अधिनियम से चलती थी
तस्वीर: Prime Minister's Office GODL-India

नई संस्था जिन परिषदों के ऊपर बैठेगी, वे 1997 के एक राज्य अधिनियम से चलती हैं। लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद अधिनियम, 1997 को राज्यपाल की सहमति 8 अक्टूबर 1997 को मिली, पर उसकी धारा 1(3) कहती है कि वह 1 जून 1995 से लागू माना जाएगा। धारा 62 ने 1995 के पुराने अधिनियम को निरस्त किया, जो राष्ट्रपति का अधिनियम संख्या 1, 1995 था। परिषद में 26 सदस्य सीधे चुनाव से आते हैं और चार तक नामज़द होते हैं, प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यकों और महिलाओं में से। छपे पाठ में पदेन सदस्य अब भी उस ज़िले के विधायक और विधान परिषद सदस्य हैं।

परिषद के पास शक्ति है, पर क़ानून बनाने की नहीं

धारा 23 अट्ठाईस विषय गिनाती है, ज़मीन के आवंटन से लेकर शिक्षा, पर्यटन, अविभाजित जंगलों के प्रबंधन और क्षेत्र के पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी के संरक्षण तक। पर उसकी पहली पंक्ति यही कहती है कि परिषद के पास इन विषयों में कार्यकारी शक्तियाँ होंगी, और वे भी सरकार के किसी सामान्य या विशेष निर्देश के अधीन। क़ानून बनाने का अधिकार कहीं नहीं दिया गया। धारा 61 सिर्फ़ विनियम और उपविधि बनाने देती है, वह भी सरकार की पूर्व स्वीकृति से। नया प्रस्ताव इसी फ़ासले को पाटने की बात करता है।

परिषद के अपने कर, 1997 के रुपये में

पैसे वाला हिस्सा और साफ़ है। धारा 24 के तहत परिषद जो कर वसूलती है, वे राज्य की संचित निधि में जमा होते हैं, परिषद के अपने कोष में नहीं। जो कर वह ख़ुद लगा सकती है, उनकी अधिकतम सीमाएँ 1997 में लिखी गई थीं और छपे हुए पाठ में वैसी ही हैं: किसी व्यक्ति पर व्यवसाय कर 500 रुपये सालाना तक, सिनेमा या मनोरंजन स्थल पर 250 रुपये प्रतिदिन तक, पशु पर 20 रुपये सालाना तक, वाहन और ट्रैक्टर पर 100 रुपये सालाना तक। इन आँकड़ों को उनतीस साल में संशोधित नहीं किया गया।

केंद्र का तर्क: आबादी, राजस्व और बजट

लेह ज़िले के नांग गाँव में पथरीली ढलान पर बने कुछ मकान, पीछे बर्फ़ से ढकी चोटियाँ; यह तस्वीर 2009 की है, और लेह ज़िले की कुल आबादी उसकी वेबसाइट के मुताबिक़ 1,33,487 है
तस्वीर: calliopejen, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

केंद्र का कहना है कि आबादी कम और राजस्व सीमित होने के कारण पूरी विधानसभा के लिए संघीय बजट से पैसा नहीं दिया जा सकता। आँकड़े इस तरह हैं। ज़िला लेह की आधिकारिक वेबसाइट जनसंख्या 1,33,487 बताती है, ज़िला कारगिल की वेबसाइट जनगणना 2011 के मुताबिक़ 1,40,802। व्यय बजट 2026-27 में लद्दाख गृह मंत्रालय के तहत माँग संख्या 55 है, शुद्ध आकार 4,869.31 करोड़ रुपये, जिसमें 2,542.26 करोड़ राजस्व और 2,327.05 करोड़ पूँजीगत। इसी माँग में 'प्राप्तियाँ' वाली पंक्ति चारों स्तंभों में ख़ाली है, यानी 2024-25 के वास्तविक आँकड़े से 2026-27 के बजट अनुमान तक कोई प्राप्ति दर्ज नहीं है।

बजट की किताब में दो तरह के केंद्रशासित प्रदेश

अनुदान माँगों की सूची ख़ुद एक फ़र्क़ दिखाती है। माँग 52 से 56 तक अंडमान और निकोबार, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, लद्दाख और लक्षद्वीप हैं, जिनका पूरा प्रशासन केंद्र सीधे बजट में रखता है। माँग 57 से 59 तक दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी हैं, और उनके नाम के आगे 'को अंतरण' लिखा है, क्योंकि उनके अपने बजट हैं। पुडुचेरी के लिए 2026-27 में अंतरण 3,517.88 करोड़ रुपये है। लक्षद्वीप, जहाँ विधायिका नहीं है, 1,682.35 करोड़ रुपये पर चलता है। विधानसभा मिलने पर लद्दाख पहली श्रेणी से दूसरी में जाएगा।

संविधान संशोधन के लिए संसद में क्या-क्या चाहिए

अनुच्छेद 368(2) दो शर्तें रखता है: विधेयक हर सदन में उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत से पास हो, और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से कम के बहुमत से नहीं। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति। आधे राज्यों के विधानमंडलों का अनुमोदन सिर्फ़ पाँच श्रेणियों में चाहिए, जो परंतुक में गिनाई गई हैं और जिनमें राष्ट्रपति का चुनाव, कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, ऊपरी अदालतों वाले अध्याय, संघ-राज्य विधायी संबंध, सातवीं अनुसूची की सूचियाँ, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व और ख़ुद अनुच्छेद 368 आते हैं। अनुच्छेद 371 में नया खंड जोड़ना इनमें से किसी में नहीं आता।

371J का रास्ता: 7 सितंबर से 1 जनवरी तक

पिछली बार यह काम कैसे हुआ, उसका रिकॉर्ड मौजूद है। संविधान (118वाँ संशोधन) विधेयक, 2012 लोकसभा में 7 सितंबर 2012 को गृह मंत्री ने पेश किया। लोकसभा ने 18 दिसंबर 2012 को और राज्यसभा ने 19 दिसंबर 2012 को पास किया। राष्ट्रपति की स्वीकृति 1 जनवरी 2013 को मिली और राजपत्र में यह 2 जनवरी 2013 को छपा, विधायी विभाग के सचिव पी. के. मल्होत्रा के हस्ताक्षर से, संविधान (अट्ठानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2012 बनकर। पेश होने से स्वीकृति तक चार महीने से कम लगे। पर अधिनियम की धारा 1(2) में एक और क़दम है: यह उस तारीख़ से लागू होगा जो केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना से नियत करे।

371J देता क्या है, और वह लद्दाख के प्रस्ताव से कितना अलग है

राजपत्र में छपा 371J का पाठ छोटा है। राष्ट्रपति कर्नाटक के बारे में आदेश देकर राज्यपाल को हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र के लिए अलग विकास बोर्ड, विकास व्यय में धन के न्यायसंगत बँटवारे और नौकरी, शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण में न्यायसंगत अवसर की ज़िम्मेदारी सौंप सकते हैं। खंड (2) उसी आदेश में जन्म या अधिवास के आधार पर शैक्षिक संस्थानों की सीटों और सरकारी पदों में आरक्षण की छूट देता है। इस पूरे अनुच्छेद में क़ानून बनाने का अधिकार किसी को नहीं मिलता। लद्दाख के लिए जो प्रस्तावित है, उसका केंद्रीय हिस्सा यही अधिकार है।

मई और जुलाई की 'सैद्धांतिक सहमति' में क्या तय हुआ था

सैद्धांतिक सहमति मई और जुलाई 2026 की बातचीत में बनी बताई जाती है, पर सितंबर की बैठक के बाद जिन बयानों में तारीख़ ली गई वह एक ही है, 22 मई 2026 की उपसमिति बैठक। लद्दाख के लिए एक विशिष्ट शासन ढाँचा उसी में तय हुआ। लाक्रूक की शिकायत यही है कि 9 सितंबर को अधिकारियों ने वही दोहराया जो 22 मई में तय था, और अमल पर आश्वासन नहीं दिया। इस बार जो नया तय हुआ वह इतना है कि संस्था प्रत्यक्ष चुनाव से बनेगी, सितंबर 2025 की पुलिस फ़ायरिंग के पीड़ितों के लिए मुआवज़ा पैकेज दिया जाएगा, और अगली बैठक के लिए गृह मंत्रालय के अधिकारी ख़ुद लद्दाख जाएँगे।

24 सितंबर 2025 और मुआवज़े की बात

गोवा में एक मंच से बोलते सोनम वांगचुक, पीछे परदे पर 'आर्टिफ़िशियल ग्लेशियर' लिखा दिखता है; यह तस्वीर जनवरी 2017 की है, उस हिरासत से बरसों पहले की जिससे वे 14 मार्च 2026 को छूटे
तस्वीर: Sonam Wangchuk, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

मुआवज़े का ज़िक्र जिस दिन से जुड़ा है, वह लेह में हुई हिंसा का दिन है। 24 सितंबर 2025 को राज्य के दर्जे की माँग को लेकर हो रहे प्रदर्शन में पुलिस फ़ायरिंग से चार प्रदर्शनकारी मारे गए थे। सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 से राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत हिरासत में लिया गया और जोधपुर जेल भेजा गया। गृह मंत्रालय ने वह हिरासत तत्काल प्रभाव से वापस ली और 14 मार्च 2026 को वे रिहा हुए। प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुक़दमे वापस लेने की माँग अभी टली हुई है।

क़ानून-व्यवस्था और पुडुचेरी का हवाला

दोनों संगठन जो चीज़ माँग रहे हैं, उसका नाम उन्होंने ख़ुद ले लिया है। लाक्रूक ने कहा कि समग्र विषयों पर स्पष्टता नहीं है, जिसमें क़ानून-व्यवस्था भी है, जैसा पुडुचेरी में दिखता है, और सही शासन के लिए वह ज़रूरी है। तुलना का मतलब यह है कि गृह मंत्रालय के पास रहने वाले विषय चुनी हुई सरकार की निगरानी में आएँ। मंत्रालय ने इस पर फ़ैसला आगे की बातचीत तक टाल दिया। अनुच्छेद 240 का जो परंतुक पुडुचेरी पर लागू होता है, वह कहता है कि विधायिका की पहली बैठक की तारीख़ से राष्ट्रपति उस केंद्रशासित प्रदेश के लिए विनियम नहीं बनाएँगे।

मुख्य सचिव की भाषा: नाम अभी तय नहीं

लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने बैठक के अगले दिन कहा कि सहमति यह बनी है कि लद्दाख के लिए ऐसा ढाँचा गढ़ा जाएगा जो देश में कहीं मौजूद नहीं है, और उसमें एक विधायी निकाय बनेगा। उन्होंने जोड़ा कि यह राज्य तो नहीं ही होगा, विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश भी नहीं, बल्कि कोई और निकाय होगा जिसके पास कार्यकारी, विधायी और वित्तीय शक्तियाँ होंगी। नाम अभी तय नहीं है और इसीलिए बातचीत चल रही है। संसद में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत भी उन्होंने बताई।

19 सितंबर और उसके बाद की तारीख़ें

आगे की तारीख़ें अभी इतनी हैं। वांगचुक ने कहा है कि एक हफ़्ते में आश्वासन नहीं मिला तो 19 से 24 सितंबर तक आंदोलन होगा। गृह मंत्रालय के अधिकारियों की अगली बैठक अक्टूबर के पहले हफ़्ते में लद्दाख में तय है, और उसी में मसौदे पर बात होने की उम्मीद है। मुख्य सचिव ने कहा है कि मसौदा अक्टूबर तक तैयार हो जाने की उम्मीद है। संसद में अभी कोई संशोधन विधेयक पेश नहीं हुआ है, और जो प्रस्ताव 9 सितंबर को रखा गया वह प्रस्ताव ही है, कोई प्रवर्तनीय संवैधानिक प्रावधान नहीं।

स्रोतभारत का संविधान, पूर्ण पाठ (सरकारी पीडीएफ़): भाग 21 के अनुच्छेद 371 से 371J, अनुच्छेद 239A, 240, 244, 244A, 368 और छठी अनुसूची, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, 2 जनवरी 2013: संविधान (अट्ठानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2012, जिससे 371J जोड़ा गया, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 (2019 का अधिनियम 34), राजपत्र प्रति, 9 अगस्त 2019, लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद अधिनियम, 1997 (1997 का XXXI), जम्मू-कश्मीर राज्य विधानमंडल का अधिनियम, व्यय बजट 2026-27, अनुदान माँगों पर टिप्पणियाँ, माँग संख्या 55 (गृह मंत्रालय, लद्दाख), वित्त मंत्रालय, द न्यूज़ नाउ: गृह मंत्रालय और लद्दाख नेताओं की उपसमिति बैठक की रिपोर्ट, सितंबर 2026, डेली एक्सेल्सियर: बैठक में क्या तय हुआ और क्या टाला गया, नेताओं के बयान, सितंबर 2026, आउटलुक इंडिया: सोनम वांगचुक की 19 सितंबर से आंदोलन की चेतावनी और बैठक पर उनका बयान, द पैम्फलेट: पूर्व सांसद थुप्स्तान छेवांग का बयान कि बैठक सकारात्मक और रचनात्मक रही, इंडियन एक्सप्रेस, 10 सितंबर 2026: लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा का बयान, द फ़ेडरल: 17 नवंबर 2025 को लद्दाख के संगठनों का 29 पन्नों का प्रस्ताव, कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया (सेंटर फ़ॉर लॉ एंड पॉलिसी रिसर्च): अनुच्छेद 240 का मौजूदा पाठ, ज़िला लेह की आधिकारिक वेबसाइट: जनसंख्या के आँकड़े, ज़िला कारगिल की आधिकारिक वेबसाइट: जनगणना 2011 के आँकड़े, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च: संविधान (118वाँ संशोधन) विधेयक, 2012 की तारीख़ें, हिमाचल गार्डियन, 14 मार्च 2026: वांगचुक की रिहाई और लेह में मारे गए लोगों की संख्या, विकिपीडिया, लद्दाख आंदोलन: चार सूत्री माँग की सूची और आंदोलन का घटनाक्रम

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