चार हाई कोर्टों में चौदह जज नियुक्त, उनमें आठ की नियुक्ति दो साल से ज़्यादा की नहीं है
शनिवार, 19 सितंबर को विधि एवं न्याय मंत्रालय की विज्ञप्ति की तालिका में चौदह नाम हैं और तीसरे ख़ाने में दो अलग वाक्य। छह की नियुक्ति जज के रूप में है, आठ की अपर जज के रूप में। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 10 सितंबर को जो चार बयान जारी किए, उनमें से किसी में 'अपर' शब्द नहीं है।

शनिवार, 19 सितंबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 42 मिनट पर विधि एवं न्याय मंत्रालय ने जो विज्ञप्ति जारी की, उसमें एक तालिका है। तालिका के तीन ख़ाने हैं। बीच वाले ख़ाने में चौदह नाम हैं।
तीसरे ख़ाने में सिर्फ़ पाँच पंक्तियाँ हैं, और उन पाँच में दो वाक्य लौट-लौटकर आते हैं। एक वाक्य कहता है कि नियुक्ति न्यायाधीश के रूप में है। दूसरा कहता है, अपर न्यायाधीश के रूप में।
छह नाम पहले वाक्य के नीचे हैं। आठ दूसरे के नीचे।
यह वरिष्ठता का फ़र्क़ नहीं है। संविधान के दो अलग उपबंध हैं, दो अलग शर्तें हैं, और उनमें से एक के साथ एक तारीख़ आती है जिसके बाद पद अपने आप नहीं रहता।
विज्ञप्ति के तीसरे ख़ाने में दो अलग वाक्य हैं
विज्ञप्ति की पहली पंक्ति यही है: "राष्ट्रपति भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद निम्नलिखित न्यायिक अधिकारियों को उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश/अपर न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करती हैं"। इसके नीचे तालिका है और तालिका के बीच वाले ख़ाने का शीर्षक है, अनुशंसित व्यक्ति का नाम।
गिनती इस तरह है। दिल्ली हाई कोर्ट में निवेदिता अनिल शर्मा और निशा सहाय सक्सेना जज नियुक्त हुईं। उसी हाई कोर्ट में संजय शर्मा, भरत पराशर, अदिति चौधरी, दिनेश भट्ट और अरुण भारद्वाज अपर जज नियुक्त हुए। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट में यश पॉल बॉर्नी जज बने। झारखंड हाई कोर्ट में मनोज प्रसाद, अखिल कुमार और राम शर्मा, तीनों जज। कर्नाटक हाई कोर्ट में उषारानी, के. एस. भरत कुमार और नेराले वी. भवानी, तीनों अपर जज।
जोड़ छह और आठ का है। दिल्ली अकेले चौदह में से सात लेता है, और आठ अपर जजों में से पाँच।
विज्ञप्ति दो पंक्तियों में अपनी क़ानूनी बुनियाद बताती है और उनमें कोई अनुच्छेद नहीं है। वह सिर्फ़ इतना कहती है कि राष्ट्रपति संविधान से मिली शक्ति का इस्तेमाल कर रही हैं। कौन सी शक्ति, यह वहाँ नहीं लिखा। किस नाम के सामने कौन सा उपबंध लगा, यह तालिका के तीसरे ख़ाने से ही पढ़ना पड़ता है।
हिंदी शीर्षक में पाँच नाम गिनाए गए हैं: दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, झारखंड और कर्नाटक। तालिका में हाई कोर्ट चार ही हैं, क्योंकि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट एक ही अदालत है। उसी घोषणा की अंग्रेज़ी विज्ञप्ति, रिलीज़ आईडी 2312339, उसी दिन उसी 12:42 पर जारी हुई और उसके शीर्षक में चार ही अदालतें हैं। पाँचवाँ नाम हिंदी शीर्षक में ही जुड़ा है।
तीन काग़ज़, और हर एक का अपना काम
नियुक्ति के रास्ते में तीन अलग दस्तावेज़ होते हैं और तीनों एक ही चीज़ नहीं करते।
पहला, कॉलेजियम का संकल्प। सुप्रीम कोर्ट इसे अपनी वेबसाइट पर बयान के रूप में छापता है। वह सिफ़ारिश भर है।
दूसरा, नियुक्ति का अधिपत्र, जिसे अंग्रेज़ी में वारंट ऑफ़ अपॉइंटमेंट कहते हैं। अनुच्छेद 217 का खंड (1) कहता है कि हाई कोर्ट का हर जज राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले अधिपत्र से नियुक्त करेंगे। जज उसी से बनता है। 1998 के ज्ञापन का पैराग्राफ़ 15.1 इससे पहले का पड़ाव तय करता है: क़ानून मंत्री मुख्य न्यायाधीश की सिफ़ारिश प्रधानमंत्री के सामने रखेंगे और प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सलाह देंगे।

तीसरा, राजपत्र की अधिसूचना। पैराग्राफ़ 18 कहता है कि अधिपत्र पर राष्ट्रपति के दस्तख़त होते ही न्याय विभाग के सचिव मुख्य न्यायाधीश को सूचित करेंगे, नियुक्ति की घोषणा करेंगे और राजपत्र में ज़रूरी अधिसूचना जारी करेंगे।
शनिवार की विज्ञप्ति इन तीनों में से कोई नहीं है। वह घोषणा है। चारों अधिसूचनाएँ इस डेस्क ने नहीं पढ़ीं, क्योंकि न्याय विभाग की वेबसाइट के नियुक्ति वाले पन्ने सिर्फ़ एक ख़ाली ढाँचा लौटाते हैं। इसलिए इस रिपोर्ट में कोई अधिसूचना संख्या, कोई फ़ाइल संख्या और कोई राजपत्र संदर्भ नहीं छपा है।
अनुच्छेद 224 का खंड (1) दो साल की छत लगाता है
अपर जज की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 224 के खंड (1) से होती है। उसकी शर्तें नाप-तौलकर लिखी हैं। अगर किसी हाई कोर्ट के कामकाज में अस्थायी बढ़ोतरी हो, या वहाँ काम के बकाया की वजह से राष्ट्रपति को लगे कि जजों की संख्या फ़िलहाल बढ़नी चाहिए, तो राष्ट्रपति योग्य व्यक्तियों को उस अदालत का अपर जज नियुक्त कर सकते हैं, और उतनी अवधि के लिए जो वे तय करें, पर दो साल से ज़्यादा की नहीं।
उसी अनुच्छेद का खंड (3) एक और छत लगाता है। कोई अपर या कार्यकारी जज 62 साल की उम्र के बाद पद पर नहीं रहेगा। जिसकी उम्र नियुक्ति के समय साठ से ऊपर है, उसे पूरे दो साल मिलते ही नहीं।
खंड (2) एक तीसरी श्रेणी बनाता है, जो इस बैच में नहीं है। जब कोई जज छुट्टी या किसी और कारण से काम न कर सके, या उसे कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश बनाया जाए, तब उसकी जगह कार्यकारी जज नियुक्त होता है और स्थायी जज के लौटने तक रहता है। शनिवार की तालिका में कार्यकारी जज कोई नहीं है।
अधिपत्र दोनों तरह के जजों का एक ही है। अनुच्छेद 217 का खंड (1) कहता है कि हर जज उसी अधिपत्र से नियुक्त होगा, भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल और उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद। पद पर बने रहने की शर्त वहीं से अलग हो जाती है। वही खंड आगे कहता है कि अपर या कार्यकारी जज के मामले में अवधि वही होगी जो अनुच्छेद 224 में दी है, और बाक़ी हर मामले में जज 62 साल की उम्र तक पद पर रहेगा।
फ़र्क़ काग़ज़ों की एक फ़ेहरिस्त में भी दिखता है। 1998 के ज्ञापन का पैराग्राफ़ 17 कहता है कि नियुक्ति को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलते ही चुने गए व्यक्ति से दो प्रमाणपत्र लिए जाएँ, शारीरिक स्वस्थता का और जन्मतिथि का। पैराग्राफ़ 20 इसमें एक छूट जोड़ता है: अपर जज बनने वाले से चिकित्सा प्रमाणपत्र ज़रूरी नहीं। जन्मतिथि वाला प्रमाणपत्र छूट में नहीं है, और उसी से वह तारीख़ निकलती है जिस पर 62 साल की छत गिरती है।
छपे हुए संविधान में अनुच्छेद 217 और 224, दोनों जगह आज भी राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का नाम है, और असली पाठ पन्ने के नीचे पाद-टिप्पण में। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को वह संशोधन रद्द कर दिया था। यह ब्योरा इस साइट ने 15 सितंबर की रिपोर्ट में दर्ज किया है और उसे यहाँ दोहराने की ज़रूरत नहीं।
एक और फ़र्क़ है, जो आँकड़ों की तालिका में ही दिखता है। अपर जज का पद और अपर जज, दो अलग चीज़ें हैं। न्याय विभाग की 1 सितंबर 2026 की सूची में हाई कोर्टों के 1,122 स्वीकृत पदों में 275 अपर जजों के हैं। उसी सूची में आंध्र प्रदेश के सामने अपर रिक्ति के ख़ाने में शून्य से एक कम दर्ज है और पंजाब एवं हरियाणा के सामने शून्य से दो कम। उन दोनों अदालतों में अपर जज अपने स्वीकृत अपर पदों से ज़्यादा बैठे हैं। एक अपर जज स्थायी कुर्सी पर भी बैठाया जा सकता है।
दो साल पूरे होने पर तीन रास्ते हैं
दो साल ख़त्म होते ही अपर जज अपने आप स्थायी नहीं होता। 1998 के ज्ञापन में इसके लिए अलग पैराग्राफ़ हैं।
पैराग्राफ़ 13 बताता है कि किसी अपर जज को स्थायी जज बनाने की सिफ़ारिश भेजते समय हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को साथ में क्या भेजना होता है: उस जज के महीनेवार निपटारे के आँकड़े, उसके दिए फ़ैसले, विधि पत्रिकाओं में छपे मुक़दमों की संख्या, और उस पूरी अवधि में कुल कितने कार्यदिवस थे, जज कितने दिन अदालत में बैठे, और कितने दिन अनुपस्थित रहे। पैराग्राफ़ 21 कहता है कि जब किसी अपर जज पर नए कार्यकाल के लिए विचार हो, तब भी वही काग़ज़ भेजने होंगे।
इस तरह दो साल की अवधि एक मूल्यांकन अवधि भी है, और जिस काग़ज़ पर वह मूल्यांकन होता है उस पर हाज़िरी भी दर्ज है।
तीसरा रास्ता यह है कि दोनों में से कुछ न हो।
कलकत्ता हाई कोर्ट का 18 अगस्त 2026 का बयान दोनों चलते हुए रास्ते एक ही काग़ज़ पर दिखाता है। कॉलेजियम ने उस बैठक में एक अपर जज, जस्टिस बिस्वरूप चौधरी को स्थायी जज बनाने का प्रस्ताव मंज़ूर किया। उसी बयान में छह अपर जजों के नाम गिनाकर लिखा है कि उन्हें छह महीने के नए कार्यकाल के लिए फिर से अपर जज नियुक्त किया जाए। छह महीने, दो साल नहीं।
सरकार का अपना आँकड़ा इसी को दूसरी तरफ़ से नापता है। राज्यसभा में 19 मार्च 2026 को दिए गए उत्तर में विधि एवं न्याय मंत्रालय ने लिखा कि 1 मई 2014 से 28 फ़रवरी 2026 तक हाई कोर्टों में 1,164 नए जज नियुक्त हुए और 820 अपर जजों को स्थायी किया गया। उसी उत्तर में यह नहीं लिखा कि उस अवधि में कुल कितने अपर जज नियुक्त हुए थे। दोनों संख्याएँ दो अलग गिनतियाँ हैं, इसलिए इनसे स्थायी होने की दर नहीं निकलती, और यह रिपोर्ट वह दर नहीं निकालती।
जिस मुक़दमे की आधी सुनवाई हो चुकी हो, उसके लिए यह फ़र्क़ काग़ज़ी नहीं है। अवधि ख़त्म, और जज अदालत में नहीं बैठेगा। आधी सुनी हुई बहस दूसरी पीठ के सामने फिर शुरू होगी।
सिफ़ारिश के काग़ज़ में 'अपर' शब्द कहीं नहीं है
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर इन नामों के चार बयान छापे हैं, चारों एक ही तारीख़ के। हर बयान की पहली पंक्ति कहती है कि कॉलेजियम ने 10 सितंबर 2026 को हुई अपनी बैठक में प्रस्ताव मंज़ूर किया है।
चारों बयानों में सिफ़ारिश एक ही शब्द के लिए है। दिल्ली वाले बयान में नामों के ऊपर लिखा है, दिल्ली हाई कोर्ट के जजों के रूप में नियुक्ति। कर्नाटक वाले में, कर्नाटक हाई कोर्ट के जजों के रूप में। झारखंड वाले में और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख वाले में भी यही। चारों में से किसी में अपर जज का ज़िक्र नहीं है।

यह कॉलेजियम की लिखने की आदत नहीं है। उसी रजिस्टर में 18 अगस्त 2026 के दो बयान हैं जिनके शीर्षक में अपर जज शब्द है, एक कलकत्ता का और एक पंजाब एवं हरियाणा का, और दोनों के भीतर भी वही शब्द है। जहाँ कॉलेजियम को अपर जज कहना होता है, वह कहता है।
यानी चौदह को छह और आठ में बाँटने का काम सिफ़ारिश के बाद हुआ।
तारीख़ों का फ़ासला भी अब गिना जा सकता है। कॉलेजियम की बैठक 10 सितंबर को हुई और नियुक्ति 19 सितंबर को। नौ दिन। यह आँकड़ा इसलिए मायने रखता है कि 30 जुलाई 2026 को राज्यसभा के पटल पर रखे मंत्रालय के बयान में लिखा है कि हर पड़ाव पर लगने वाला समय बताया नहीं जा सकता, और पाँच महीनों में छह बार यही पूछा गया था। एक अंतराल अब रिकॉर्ड पर है।
दिल्ली वाले बयान में आठ नाम हैं और शनिवार की विज्ञप्ति में दिल्ली के सात। आठवाँ नाम गुरविंदर पाल सिंह का है। पंद्रह सिफ़ारिशों में से चौदह की नियुक्ति की अपनी कहानी है और वह इस रिपोर्ट का विषय नहीं; यहाँ विषय वे चौदह हैं जिनकी नियुक्ति हुई।
एक छोटा फ़र्क़ काग़ज़ों के बीच और है। कॉलेजियम के बयान में नाम के साथ रोमन अंक एक लगा है और विज्ञप्ति में सिर्फ़ संजय शर्मा।
दिल्ली के सात, और पंद्रह ख़ाली अपर पद
न्याय विभाग हर महीने की पहली तारीख़ की स्थिति छापता है। 19 सितंबर तक उपलब्ध सबसे नई सूची 1 सितंबर 2026 की है।
उसमें दिल्ली हाई कोर्ट के 60 स्वीकृत पद हैं: 45 स्थायी और 15 अपर। कार्यरत जज 44 हैं और सभी स्थायी पदों पर। अपर जज एक भी नहीं। स्थायी पद एक ख़ाली था और अपर पद पूरे पंद्रह।
यह तस्वीर तीन महीने से वैसी की वैसी है। 1 जुलाई, 1 अगस्त और 1 सितंबर, तीनों सूचियों में दिल्ली के सामने वही छह संख्याएँ छपी हैं। 1 जुलाई वाली सूची में हर अदालत के सामने रिक्ति फ़ीसदी में भी छपी है, और दिल्ली के सामने 27 दर्ज है।
अब उसी अदालत का काम देखिए। 19 मार्च 2026 को राज्यसभा में रखी गई तालिका में दिल्ली हाई कोर्ट के लंबित मुक़दमे साल दर साल इस तरह हैं: 2021 में 1,02,025, 2022 में 1,06,050, 2023 में 1,13,368, 2024 में 1,18,662, 2025 में 1,24,951 और 9 मार्च 2026 को 1,25,962। हर साल पिछले साल से ज़्यादा। 2021 से अब तक बढ़त 23,937 मुक़दमों की है, यानी लगभग 23 फ़ीसदी, और 2026 के पहले सवा दो महीने में ही एक हज़ार से ऊपर जुड़ चुके थे।
अनुच्छेद 224 के खंड (1) में दो आधार हैं। पहला, कामकाज में अस्थायी बढ़ोतरी। दूसरा, काम का बकाया। दिल्ली की यह तालिका पहले आधार से मेल नहीं खाती और दूसरे से पूरी तरह खाती है।
एक बात इस रिपोर्ट से बाहर रह जाती है। दिल्ली को दो स्थायी जज मिले हैं जबकि 1 सितंबर की सूची में स्थायी रिक्ति एक थी। 1 और 19 सितंबर के बीच कोई कुर्सी ख़ाली हुई या नहीं, यह अगली मासिक सूची बताएगी। अधिसूचना पढ़े बिना यह भी तय नहीं होता कि किस पद पर किसे बैठाया गया। सात नियुक्तियों के बाद दिल्ली की कार्यरत संख्या 44 से 51 हो जाती है, स्वीकृत 60 के मुक़ाबले।
झारखंड के तीन स्थायी, कर्नाटक के तीन अपर
चार अदालतों की 1 सितंबर 2026 वाली स्थिति एक साथ रखिए।
| हाई कोर्ट | स्वीकृत (स्थायी + अपर) | कार्यरत | ख़ाली स्थायी | ख़ाली अपर | 19 सितंबर की नियुक्तियाँ |
|---|---|---|---|---|---|
| दिल्ली | 45 + 15 = 60 | 44 | 1 | 15 | 2 स्थायी, 5 अपर |
| जम्मू-कश्मीर और लद्दाख | 19 + 6 = 25 | 12 | 7 | 6 | 1 स्थायी |
| झारखंड | 20 + 5 = 25 | 13 | 7 | 5 | 3 स्थायी |
| कर्नाटक | 47 + 15 = 62 | 54 | 6 | 2 | 3 अपर |
झारखंड में सात स्थायी कुर्सियाँ ख़ाली थीं और तीनों नियुक्तियाँ स्थायी हुईं। कर्नाटक में स्थायी कुर्सियाँ छह ख़ाली थीं, अपर सिर्फ़ दो, और तीनों नियुक्तियाँ अपर जज की हुईं।

1998 के ज्ञापन में इस पर दो पैराग्राफ़ हैं। पैराग्राफ़ 20 कहता है कि अपर जज का पद बनाने के लिए राज्य सरकार को पहले केंद्र सरकार से मंज़ूरी लेनी होगी, और उसके बाद प्रक्रिया स्थायी जज वाली ही रहेगी। पैराग्राफ़ 22 इससे छोटा और सीधा है: हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अपर जज की सिफ़ारिश तब नहीं करनी चाहिए जब उस हाई कोर्ट में स्थायी जज की कुर्सी ख़ाली हो।
कर्नाटक के लिए कॉलेजियम की सिफ़ारिश जज के लिए है। पैराग्राफ़ 22 की शर्त मुख्य न्यायाधीश की सिफ़ारिश पर लगती है, और सिफ़ारिश में वह शब्द है ही नहीं जिस पर शर्त लगनी थी।
चारों में सबसे ख़ाली अदालत को सबसे कम मिला। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के 25 स्वीकृत पदों पर 1 सितंबर को 12 जज थे और 13 कुर्सियाँ ख़ाली। 1 जुलाई की सूची में उसके सामने रिक्ति 52 फ़ीसदी छपी है, जो उस दिन देश की कुल रिक्ति के 30 से बाईस अंक ऊपर थी। वहाँ एक नियुक्ति हुई, और वह स्थायी है। उसी अदालत के लंबित मुक़दमे 19 मार्च 2026 को रखी गई तालिका में 2021 के 47,371 से घटकर 9 मार्च 2026 को 43,190 दर्ज हैं, यानी चार साल में कमी।
तो श्रेणी किस काग़ज़ पर तय हुई? यह डेस्क नहीं बता सकती। चारों अधिसूचनाएँ अपठनीय हैं और विज्ञप्ति सिर्फ़ नतीजा छापती है। कर्नाटक की 1 सितंबर वाली पंक्ति में अपर पद दो ख़ाली थे और अपर जज तेरह बैठे थे, इसलिए तीन नई नियुक्तियाँ उन दो पदों में समाती भी नहीं; आंध्र और पंजाब वाली पंक्तियाँ बताती हैं कि ऐसा होने पर ख़ाने में ऋण चिह्न आ जाता है।
चौदहों न्यायिक सेवा से आए हैं
विज्ञप्ति चौदहों को न्यायिक अधिकारी कहती है। संविधान का अनुच्छेद 217 का खंड (2) हाई कोर्ट के जज के लिए दो ही रास्ते रखता है: कम से कम दस साल तक भारत में न्यायिक पद पर रहा हो, या कम से कम दस साल तक किसी हाई कोर्ट का अधिवक्ता रहा हो। पहला रास्ता ज़िला अदालतों की सेवा से आता है, दूसरा वकालत से।
दोनों के बीच अनुपात कहीं लिखा है या नहीं, इसका जवाब ख़ुद एक काग़ज़ में है। 1998 के ज्ञापन के अनुलग्नक एक (ii) में उन बिंदुओं की सूची है जिन्हें हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नाम भेजते समय ध्यान में रखेगा। उस सूची का बिंदु 10 बार और सेवा के जजों के बीच, तथा अपीलीय और मूल पक्ष के जजों के बीच, परंपरागत अनुपात बनाए रखने की ज़रूरत बताता है। बीस पन्ने के उस ज्ञापन में यह अनुपात कितना है, यह कहीं नहीं लिखा।
सुप्रीम कोर्ट के अपने रजिस्टर से 2026 की गिनती की जा सकती है। इस साल 1 जनवरी से 19 सितंबर तक हाई कोर्टों में नई नियुक्ति के लिए कॉलेजियम के सत्रह बयान छपे हैं। उनमें कुल 90 नाम हैं। 53 अधिवक्ता हैं और 37 न्यायिक अधिकारी। इस गिनती में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति, तबादले, अपर जजों को स्थायी करने की सिफ़ारिशें और अनुच्छेद 224क के तदर्थ जज शामिल नहीं हैं। और यह गिनती सिफ़ारिशों की है; नियुक्ति की अपनी गिनती न्याय विभाग की अधिसूचनाओं में है, जो पढ़ी नहीं जा सकीं।
कॉलेजियम ख़ुद भी यह भेद दर्ज करता है जब उसे करना हो। मद्रास हाई कोर्ट के लिए 18 मई 2026 के बयान में उन्नीस नाम चार अलग प्रस्तावों में बँटे हैं और हर समूह के साथ लिखा है कि वे न्यायिक अधिकारी हैं या अधिवक्ता। उसी बयान में हर प्रस्ताव की अपनी तारीख़ भी छपी है, 4 नवंबर, 21 नवंबर, 7 दिसंबर और 10 दिसंबर 2025। 10 सितंबर के चारों बयानों में प्रस्ताव की कोई तारीख़ नहीं है, सिर्फ़ बैठक की।
पंद्रह सिफ़ारिशें, पंद्रह न्यायिक अधिकारी। इस बैच में वकालत से कोई नहीं आया।
चौदह और तीन सौ चार
1 सितंबर 2026 को देश के 25 हाई कोर्टों में 1,122 स्वीकृत पदों पर 818 जज काम कर रहे थे और 304 कुर्सियाँ ख़ाली थीं। उन 304 में 159 स्थायी पद हैं और 145 अपर।
शनिवार की चौदह नियुक्तियाँ 159 में से 6 और 145 में से 8 भरती हैं। अगर 1 और 19 सितंबर के बीच कोई कुर्सी ख़ाली न हुई हो, तो रिक्ति 290 रह जाती है और कार्यरत संख्या 832 हो जाती है।
वह शर्त हल्की नहीं है। 1 अगस्त और 1 सितंबर की सूचियों के बीच कार्यरत जज 781 से 818 हुए, यानी 37 की बढ़त। उस महीने की छह अधिसूचनाओं से नियुक्तियाँ 42 हुई थीं, जो गिनती इस साइट ने 15 सितंबर को छापी थी। उन 37 में स्थायी जज सिर्फ़ चार बढ़े, 684 से 688, और अपर जज तैंतीस, 97 से 130। इस बैच का अनुपात उलटा है: चौदह में छह स्थायी हैं।
इस रिपोर्ट के बाहर चार चीज़ें रह गई हैं। चारों अधिसूचनाओं की संख्या और उनके राजपत्र संदर्भ, क्योंकि न्याय विभाग की वेबसाइट वे पन्ने नहीं दे रही। इन चौदह में से किसी ने शपथ ली या नहीं। हर अपर जज के अधिपत्र में लिखी दो साल वाली आख़िरी तारीख़। और नियुक्तियों के बाद की रिक्ति की स्थिति, जो न्याय विभाग की अगली मासिक सूची में छपेगी।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, प्रविष्टि तिथि 19 सितंबर 2026, दोपहर 12:42: चौदह न्यायिक अधिकारियों की जज और अपर जज के रूप में नियुक्ति, हिंदी विज्ञप्ति, रिलीज़ आईडी 2312364, पत्र सूचना कार्यालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, 19 सितंबर 2026, दोपहर 12:42: उसी घोषणा की अंग्रेज़ी विज्ञप्ति, रिलीज़ आईडी 2312339, जिसका शीर्षक चार हाई कोर्ट गिनाता है, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, 10 सितंबर 2026 की बैठक का बयान: दिल्ली हाई कोर्ट के लिए आठ न्यायिक अधिकारियों के नाम, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, 10 सितंबर 2026: कर्नाटक हाई कोर्ट के लिए तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, 10 सितंबर 2026: झारखंड हाई कोर्ट के लिए तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, 10 सितंबर 2026: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के लिए एक न्यायिक अधिकारी का नाम, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, 18 अगस्त 2026: कलकत्ता हाई कोर्ट के एक अपर जज को स्थायी करने और छह अपर जजों को छह महीने का नया कार्यकाल देने की सिफ़ारिश, सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम संकल्पों की सूची, जिससे 2026 के सभी बयान लिए गए हैं; इस पृष्ठ पर सबसे नया बयान 10 सितंबर 2026 का है, न्याय विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में जजों की स्वीकृत संख्या, कार्यरत संख्या और रिक्तियाँ, 1 सितंबर 2026 की स्थिति, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 अगस्त 2026 की स्थिति, न्याय विभाग: रिक्ति विवरण, 1 जुलाई 2026 की स्थिति, जिसमें हर हाई कोर्ट के सामने रिक्ति का प्रतिशत भी छपा है, न्याय विभाग: हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों और जजों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण की प्रक्रिया का ज्ञापन, 1998, बीस पन्ने; पैराग्राफ़ 13, 15.1, 17, 18, 20, 21, 22 और अनुलग्नक एक (ii), विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय: भारत का संविधान, अनुच्छेद 217 और 224 तथा उनके पाद-टिप्पण, न्याय विभाग: बजट सत्र 2026 के राज्यसभा उत्तरों का संकलन, जिसमें 19 मार्च 2026 के प्रश्न 3153 का उत्तर और हर हाई कोर्ट की लंबित मुक़दमों की तालिका है