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हिसाब-किताब

अदालतें पहले से तेज़ चल रही हैं, और मुक़दमों का ढेर फिर भी बढ़ रहा है

जुलाई 2026 में ज़िला अदालतों में हर दिन औसतन 94,386 मुक़दमे दायर हुए और 77,431 निपटे। 2018 के बाद निपटान दायर होने से तेज़ बढ़ा है। रेखा फिर भी पार नहीं हुई।

अदालतें पहले से तेज़ चल रही हैं, और मुक़दमों का ढेर फिर भी बढ़ रहा है

जुलाई 2026 में देश की ज़िला अदालतों में हर दिन औसतन 94,386 मुक़दमे दायर हुए।

उसी महीने हर दिन औसतन 77,431 निपटे।

बाक़ी 16,955 ढेर में जुड़ गए। रोज़।

ज़िला और अधीनस्थ अदालतों में इस समय 5,12,23,079 मुक़दमे लंबित हैं। हाई कोर्टों में 64,81,003 और सुप्रीम कोर्ट में 94,598। ये तीनों आँकड़े राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड से 30 अगस्त 2026 को पढ़े गए हैं।

तीनों को जोड़कर एक संख्या बना लेने का चलन है। वह जोड़ नहीं करना चाहिए, क्योंकि तीनों अलग अदालतें हैं और एक ही मुक़दमा एक से ज़्यादा स्तर पर गिना जा सकता है।

अब वह बात जो हर रिपोर्ट में उलटी छपती है

लंबित मुक़दमों की हर ख़बर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचती है: अदालतें धीमी हैं।

आँकड़ा इससे सहमत नहीं है।

2018 से 2025 के बीच ज़िला अदालतों में दायर होने वाले मुक़दमे 74.9 फ़ीसदी बढ़े। इसी दौरान निपटने वाले मुक़दमे 89.5 फ़ीसदी बढ़े।

निपटान ज़्यादा तेज़ी से बढ़ा। सिर्फ़ प्रतिशत में नहीं, गिनती में भी। दायर होने में 1.14 करोड़ की बढ़त हुई, निपटान में 1.19 करोड़ की।

हाई कोर्टों में भी यही हुआ। दायर होना 24.2 फ़ीसदी बढ़ा, निपटान 35.7 फ़ीसदी।

तो ढेर बढ़ता क्यों जा रहा है

क्योंकि दौड़ बराबरी से शुरू नहीं हुई थी।

2018 में ज़िला अदालतों में 1.53 करोड़ मुक़दमे दायर हुए और 1.33 करोड़ निपटे। उस साल का घाटा 19.36 लाख का था। 2025 में 2.67 करोड़ दायर हुए और 2.53 करोड़ निपटे, घाटा 14.33 लाख।

घाटा 26 फ़ीसदी कम हुआ। पर वह हर साल घाटा ही रहा।

अदालतें समस्या के क़रीब पहुँच रही हैं और फिर भी पीछे जा रही हैं। यह उलटा नहीं लगता जब आप एक बात याद रखें: जब तक निपटान दायर होने से एक भी कम है, ढेर बढ़ेगा।

सालदायरनिपटेनिपटान दर
20181,52,80,0561,33,44,23287.3%
20201,25,94,45577,87,03661.8%
20232,39,44,3922,32,17,37097.0%
20252,67,23,1312,52,90,21894.6%

2023 अब तक का सबसे अच्छा साल रहा, 97 फ़ीसदी। 2020 सबसे ख़राब, 61.8 फ़ीसदी, और उसकी वजह बताने की ज़रूरत नहीं।

दो साल जब रेखा पार हुई

हाई कोर्टों में 2019 में 21.80 लाख मुक़दमे दायर हुए और 23.49 लाख निपटे। निपटान दर 107.7 फ़ीसदी। उस साल हाई कोर्टों का ढेर घटा था।

सुप्रीम कोर्ट में यह दो बार हुआ, 2022 में और 2024 में। दोनों साल उसने आए हुए मुक़दमों से ज़्यादा निपटाए।

फिर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में दायर होने वाले मुक़दमे 19.4 फ़ीसदी उछल गए, 51,922 से 61,967। उसी साल उसका निपटान भी अब तक का सबसे ऊँचा रहा। फिर भी वह पीछे रह गया।

यह सुस्ती नहीं थी। यह माँग का झटका था।

"जजों को ज़्यादा मेहनत करनी चाहिए"

यह वाक्य हर बहस में आता है। इसका जवाब गणित है, नीयत नहीं।

ज़िला अदालतों में इस समय 21,026 जज काम कर रहे हैं। हर जज के हिस्से लगभग 2,436 लंबित मुक़दमे हैं। 2025 में हर जज ने औसतन 1,203 मुक़दमे निपटाए, यानी महीने के लगभग सौ।

2025 का घाटा 14,32,913 मुक़दमों का था। इसी औसत रफ़्तार से उसे रोकने के लिए लगभग 1,191 और जज चाहिए।

ज़िला अदालतों में इस समय 4,868 पद ख़ाली हैं।

1,191 बनाम 4,868ढेर रोकने के लिए जितने जज चाहिए, और जितने पद पहले से ख़ाली पड़े हैं

यानी ख़ाली पड़े पदों में उससे लगभग चार गुना क्षमता है जितनी ढेर बढ़ना रोकने के लिए ज़रूरी है। हाई कोर्टों में यह अनुपात और चौड़ा है, वहाँ लगभग 51 जज चाहिए और 319 पद ख़ाली हैं।

एक शर्त साफ़ कर देनी चाहिए। यह गणित मानकर चलता है कि नए जज मौजूदा औसत रफ़्तार से काम करेंगे और अड़चन सिर्फ़ जजों की संख्या है। दोनों मान्यताएँ हैं, नतीजे नहीं। पर इतना दिखता है कि दायर और निपटान के बीच का फ़ासला मंज़ूर और बैठे जजों के फ़ासले से छोटा है।

और एक बात जो पूरी चर्चा बदल देती है

जुलाई 2026 में ज़िला अदालतों ने जो 24 लाख मुक़दमे निपटाए, उनमें से 4,50,204 विवादित थे और 19,50,165 अविवादित।

यानी हर पाँच में से चार निपटान फ़ैसले नहीं थे।

वे समझौते थे, वापसी थीं, राज़ीनामे थे, लोक अदालत के आदेश थे। ऊपर जो निपटान वाली रेखा है, वह ज़्यादातर जजों के फ़ैसलों की रेखा नहीं है।

इसे जानने के बाद निपटान दर का मतलब बदल जाता है। 94.6 फ़ीसदी सुनने में अदालत की रफ़्तार लगती है। उसका बड़ा हिस्सा असल में यह है कि कितने लोग मुक़दमा लड़ने के बजाय बाहर निपटा लेते हैं।

इस साल दो महीने ऐसे भी रहे जब ज़िला अदालतों का ढेर बढ़ने के बजाय घटा। मार्च 2026 में 28,79,683 मुक़दमे दायर हुए और 36,28,259 निपटे, यानी ढेर 7.48 लाख कम हुआ। मई में भी यही हुआ।

दोनों महीनों में राष्ट्रीय लोक अदालत लगी थी। यह समय का मेल है, और इसे वजह कहने के लिए अलग सबूत चाहिए, जो अभी हमारे पास नहीं है।

अगर बिना किसी नए मुक़दमे के आज का ढेर निपटाना हो, तो 2025 की रफ़्तार से ज़िला अदालतों को लगभग दो साल लगेंगे। हाई कोर्टों को लगभग ढाई साल। सुप्रीम कोर्ट को पौने दो साल।

पर नए मुक़दमे रोज़ आते हैं। हर दिन 94,386।

यह आँकड़ा आता कहाँ से है

इस पूरे लेख के आँकड़े राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड से हैं, और उसकी एक ख़ासियत जान लेनी चाहिए।

यह कोई सालाना रिपोर्ट नहीं है। यह एक जीवित डैशबोर्ड है, जिसमें देश की ज़िला अदालतों और हाई कोर्टों के आँकड़े लगातार जुड़ते रहते हैं। जिस दिन आप उसे खोलेंगे, संख्या उस दिन की होगी।

इसका एक नतीजा यह है कि लंबित मुक़दमों का आँकड़ा हर जगह अलग छपा मिलता है, और अक्सर तीनों सही होते हैं, बस अलग-अलग तारीख़ों के।

दूसरा नतीजा यह है कि यह आँकड़ा उसी हद तक भरोसेमंद है जिस हद तक अदालतें उसमें अपनी प्रविष्टियाँ समय पर डालती हैं। जो मामला अदालत के रजिस्टर में निपट चुका है पर पोर्टल पर दर्ज नहीं हुआ, वह ढेर में गिना जाता रहेगा।

यही वजह है कि इस लेख में तारीख़ के साथ आँकड़े दिए गए हैं।

स्रोतराष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, ज़िला अदालतें, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट डेटा ग्रिड, न्याय विभाग, लोकसभा अतारांकित प्रश्न 3501

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।